भाई साहब
‘भाई साहब’ एक ऐसी हरियाणवी फिल्म है, जो परिवार, दबदबे, पुरानी दुश्मनी, साजिश और बदले की आग को एक साथ लेकर चलने की कोशिश करती है। हरियाणा के एक गाँव की पृष्ठभूमि में रची गई कहानी एक ऐसे परिवार से शुरू होती है, जहाँ एक लड़की को बचपन से ही अपने भाइयों की तुलना में कम प्यार और सम्मान मिलता है। यही उपेक्षा धीरे-धीरे उसके भीतर बदले की आग को जन्म देती है और कहानी परिवार के खिलाफ रची गई साजिश और पुराने राज़ों के खुलासे तक पहुँचती है।
कहानी का बेस खराब नहीं है। सपना लाठर ने एक ऐसा आइडिया चुना है, जिसमें पारिवारिक रिश्तों और बदले की भावना के जरिए एक अच्छी फिल्म खड़ी की जा सकती थी। समस्या आइडिया में कम और उसके डेवलपमेंट में ज्यादा है। कहानी को जिस गहराई, मजबूती और नयापन की जरूरत थी, वह स्क्रीनप्ले में पूरी तरह दिखाई नहीं देता।
फिल्म की सबसे बड़ी परेशानी यही है कि यह कई पुराने फिल्मी फॉर्मूलों पर बहुत ज्यादा निर्भर दिखाई देती है। दबंग परिवार, पुरानी दुश्मनी, अवैध कारोबार, साजिश और बदले की कहानी—इन सब चीजों से दर्शक पहले ही काफी परिचित हैं। इन विषयों को दोहराना अपने आप में समस्या नहीं है, लेकिन उन्हें पेश करने का तरीका नया होना चाहिए। ‘भाई साहब’ यहाँ कुछ हद तक पीछे रह जाती है।
खासकर हरियाणवी सिनेमा के संदर्भ में यह बात और महत्वपूर्ण हो जाती है। अवैध कारोबार और ‘दो नंबर’ के धंधे जैसे विषय दर्शक लंबे समय से फिल्मों में देखते आ रहे हैं। अब सिर्फ इन विषयों को जोड़कर कहानी बना देना पर्याप्त नहीं है। दर्शक को नया किरदार, नया संघर्ष, नया ट्रीटमेंट और ऐसी कहानी चाहिए जो उसे शुरुआत से अंत तक बांधकर रख सके। ‘भाई साहब’ में इसी स्तर पर सबसे ज्यादा काम किए जाने की जरूरत थी। अमित सैनी रोहतकिया की यह पहली फिल्म है और उनके प्रदर्शन को एक शुरुआत के तौर पर देखा जा सकता है।
अभिनय पूरी तरह निराश नहीं करता, लेकिन स्क्रीन पर किरदार की बॉडी लैंग्वेज और व्यक्तित्व में वह धार नजर नहीं आती जिसकी ऐसे किरदार से उम्मीद की जाती है। उनके अभिनय में संभावनाएँ हैं, लेकिन आगे के प्रोजेक्ट्स में स्क्रीन प्रेजेंस और बॉडी लैंग्वेज पर ज्यादा काम करना जरूरी होगा।
सपना लाठर का अभिनय फिल्म के बेहतर हिस्सों में शामिल है। उन्होंने अपने किरदार को संभालने की अच्छी कोशिश की है और कई जगह उनका प्रदर्शन प्रभाव छोड़ता है। उनकी एक्टिंग में किरदार की भावनाओं को सामने लाने की कोशिश दिखाई देती है। बाकी कलाकारों की कास्टिंग भी ठीक-ठाक है, हालांकि कई किरदारों को स्क्रीनप्ले में और मजबूती मिलती तो कलाकारों का प्रदर्शन भी ज्यादा उभरकर सामने आता।
अरमान अहलावत का काम इस फिल्म में उम्मीद के मुताबिक प्रभावशाली नहीं रहा। उनके किरदार और अभिनय पर अपेक्षित स्तर का काम दिखाई नहीं देता। कई जगह उनकी एक्टिंग बनावटी महसूस होती है और किरदार के भावों को पर्दे पर उतारने में वह पूरी तरह सफल नहीं हो पाते।
कैमरा वर्क की बात करें तो फिल्म पूरी तरह कमजोर नहीं है। कुछ शॉट्स अच्छे हैं और नाइट शूट्स में सिनेमैटोग्राफी खास तौर पर ठीक नजर आती है। कई जगह विजुअल्स माहौल बनाने में मदद करते हैं, लेकिन पूरी फिल्म में सिनेमैटोग्राफी का स्तर एक जैसा नहीं रह पाता। कुछ सीन्स में फ्रेमिंग और विजुअल ट्रीटमेंट को और बेहतर किया जा सकता था। फिल्म का बैकग्राउंड म्यूजिक जरूर निराश करता है। कुछ जगह BGM ठीक बैठता है, लेकिन कई सीन्स में ऐसा लगता है जैसे हम किसी हिंदी टीवी सीरियल का बैकग्राउंड स्कोर सुन रहे हों। जिस तरह का तनाव और ड्रामा कहानी में दिखाने की कोशिश की गई है, उसके लिए ज्यादा प्रभावशाली और सिनेमाई BGM की जरूरत थी। कई जगह म्यूजिक कहानी को ऊपर उठाने के बजाय उसकी गति और प्रभाव को और कमजोर करता है। टेक्निकल स्तर पर भी फिल्म कोई बहुत मजबूत छाप नहीं छोड़ती। निर्देशक जीतू जी की मेहनत और कोशिश साफ दिखाई देती है, लेकिन फिल्म को तकनीकी रूप से और ज्यादा मजबूत बनाने की जरूरत थी। सबसे बड़ी कमी फिर वही सामने आती है—कहानी के लिए पर्याप्त पेपरवर्क और स्क्रीनप्ले डेवलपमेंट का अभाव। कुल मिलाकर ‘भाई साहब’ में एक फिल्म बनने की क्षमता वाला आइडिया जरूर था, लेकिन उस आइडिया को पूरी ताकत के साथ पर्दे पर उतारा नहीं जा सका। फिल्म देखने के बाद सबसे ज्यादा यही महसूस होता है कि अगर कहानी पर थोड़ा और समय दिया जाता, किरदारों को बेहतर तरीके से लिखा जाता और पुराने फॉर्मूलों से बाहर निकलकर ट्रीटमेंट तैयार किया जाता, तो इसका असर कहीं ज्यादा मजबूत हो सकता था। हरियाणवी सिनेमा आज जिस दौर से गुजर रहा है, उसमें सिर्फ स्थानीय रंग और दबंग किरदार काफी नहीं हैं। अब कहानी में ऐसा कंटेंट चाहिए जो दर्शक को नया अनुभव दे। ‘भाई साहब’ उस दिशा में एक प्रयास जरूर है, लेकिन अभी इसे एक पूरी तरह पकी हुई फिल्म कहने के लिए कुछ और मेहनत की जरूरत महसूस होती है।