Cinematic Haryana हरियाणा प्रदेश की पहली हरियाणवी सिनेमा वेबसाइट

ढाणी

ढाणी रिव्यू | एक ऐसी कहानी जो बहुत कुछ बयां करती है "ढाणी" सिर्फ एक शीर्षक नहीं, बल्कि अपने भीतर कई अनकही कहानियां समेटे हुए है। एक सुनसान जगह, जहां आसपास कोई बस्ती नहीं, सिर्फ एक अकेला घर... यही इस फिल्म का सबसे बड़ा किरदार बन जाता है। यह कहानी केवल सस्पेंस नहीं रचती, बल्कि भाई-बहन के रिश्ते की गहराई, साहस और नारी शक्ति को भी बेहद प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करती है।

"ढाणी में लोकेशन सिर्फ़ कहानी का मंच नहीं है, बल्कि वह खुद कहानी का सबसे बड़ा किरदार है। उस जगह का वातावरण, उसका सन्नाटा, उसकी संस्कृति और उसका भूगोल पात्रों के फैसलों, रिश्तों और भावनाओं को आकार देते हैं। अगर इस लोकेशन को हटा दिया जाए, तो कहानी भी वैसी नहीं रहेगी।"

ओम कौशिक Films के बैनर तले बनी यह फिल्म तकनीकी रूप से बेहद मजबूत कही जा सकती है। पूरी कहानी एक ही रात के घटनाक्रम में घटित होती है। फिल्म की कहानी एक लड़की के इर्द-गिर्द घूमती है। उसके माता-पिता शादी में गए होते हैं और उसका भाई दोस्तों के साथ पार्टी करने बाहर गया होता है। इसी दौरान 4 लड़के चोरी करने के इरादे से उसके घर में घुस जाते हैं। एक तरफ वह लड़की अकेली होती है और दूसरी तरफ वे चार चोर। पूरी फिल्म इन दोनों के बीच होने वाले संघर्ष और घटनाओं पर आधारित है।

फिल्म का निर्देशन अनमोल दर्शन ने किया है। उन्होंने हर दृश्य को बड़े संतुलित और प्रभावी तरीके से प्रस्तुत किया है। फिल्म की सबसे मजबूत कड़ी इसका स्क्रीनप्ले है, जो शुरुआत से अंत तक दर्शकों को बांधे रखता है। फ़िल्म की कहानी प्रवेश राजपूत और अन्नू ने लिखी है।

अगर अभिनय की बात करें तो फिल्म की कास्ट भले ही सीमित है, लेकिन हर कलाकार ने अपने किरदार के साथ पूरा न्याय किया है। हरिओम कौशिक, अनुप रांगा, रोहित फोगाट, मीना मलिक, कृष्ण मलिक और चंदन सभी ने अच्छा काम किया है।

हरिओम कौशिक की हरियाणा के सबसे बेहतरीन अभिनेताओं में गिनती होती है, लेकिन खलनायक की उनकी भूमिका विशेष छाप छोड़ती है, बेड बॉयज भिवानी के घोड़ा गैंगस्टर का किरदार हो, या फिर ढाणी के गैंग के मुखिया का वो हरियाणा में यादगार खलनायक के रूप में जाने जाएगे, उनके कॉस्ट्यूम से लेकर मेकअप पर अच्छा काम किया है जो कैरेक्टर को और बेहतर करने में मदद करता है। क्रिएटर होने के साथ उसी फिल्म में अभिनय करना मुश्किल काम है लेकिन बेहतर सिनेमा उनके द्वारा परोसा गया ।

सपर चहल के लिए यह पहली फ़िल्म है जिसमें वह मुख्य भूमिका में नज़र आती है , और उन्होंने अपने अभिनय से गहरी छाप छोड़ी है। उनके चेहरे के भाव ही कई बार बिना संवाद के बहुत कुछ कह जाते हैं। पूरी फ़िल्म में एक भी पल ऐसा महसूस नहीं होता कि वह अपने किरदार से बाहर आए हों। सपर चहल का काम देखकर यही लगता है कि उन्होंने अपने पहले लीड रोल में बेहद अच्छा प्रदर्शन किया है। मनीष कुमार को नज़रअंदाज़ करना आसान नहीं है। हरियाणा के बेहतरीन प्रोफेशनल अभिनेताओं में उनकी गिनती होती है। इस फ़िल्म में उन्होंने एक कॉमिक किरदार निभाया है, लेकिन उसी किरदार के भीतर छिपी हवस अंततः उसकी मौत का कारण बनती है। मनीष कुमार ने इस बदलाव को बेहद प्रभावशाली ढंग से पर्दे पर उतारा है।

अनूप रंगा को लंबे समय तक एक कॉमेडी अभिनेता के रूप में देखा गया, लेकिन Bad Boys Bhiwani और ढाणी जैसी फ़िल्मों से उन्होंने यह साबित कर दिया कि वह सिर्फ़ हास्य भूमिकाओं तक सीमित नहीं हैं। इस फ़िल्म में उनका किरदार कहानी का सबसे बड़ा खलनायक बनकर उभरता है। उन्होंने अपने अभिनय से इस नकारात्मक चरित्र की क्रूरता, लालच और चालाकी को पूरी सच्चाई के साथ पर्दे पर उतारा है

हालांकि, चंदन के दोस्तों की भूमिका निभाने वाले कलाकार अपने किरदारों में पूरी तरह प्रभाव नहीं छोड़ पाए। भले ही उनका स्क्रीन टाइम कम था, लेकिन थोड़ी और मजबूती दिखाई जा सकती थी।

फिल्म की असली जान इसका बैकग्राउंड म्यूजिक और साउंड डिजाइन है, जिसे DIPON DAS ने तैयार किया है। जहां-जहां सस्पेंस बनता है, वहां बैकग्राउंड स्कोर दर्शकों को कहानी से जोड़े रखता है। हरियाणवी सिनेमा में दीपोन दास हमेशा की तरह इस बार भी शानदार काम करते नजर आते हैं।

तकनीकी रूप से फिल्म का सबसे मजबूत पक्ष इसकी सिनेमैटोग्राफी है। विकास के. शर्मा ने एक बार फिर साबित किया है कि वे तकनीकी रूप से बेहद परिपक्व सिनेमैटोग्राफर हैं। मलाल, ओपरी हवा और लाइसेंस के बाद “ ढाणी” में भी उन्होंने हर फ्रेम को खूबसूरती से कैमरे में कैद किया है। खासकर वह दृश्य, जब रात के समय चारों चोर घर का गेट खोलकर अंदर प्रवेश करते हैं। पीछे से लिया गया मिड-वाइड शॉट दृश्य को बेहद सिनेमैटिक बनाता है और एक अनुभवी डीओपी की पहचान भी देता है।

हालांकि, एक दृश्य में जहां चारों चोर कोमल को मारते हैं, वहां उनके चेहरे के भाव पूरी तरह नहीं दिखाए गए। यदि थप्पड़ के बाद उनके एक्सप्रेशन भी दर्शाए जाते, तो उस दृश्य का भावनात्मक प्रभाव और अधिक गहरा हो सकता था। इसके अलावा विकास के. शर्मा का काम शानदार है।

कॉस्ट्यूम डिजाइन भी फिल्म के अनुरूप है। हर कलाकार की वेशभूषा उसके किरदार और परिवेश के हिसाब से बिल्कुल सटीक लगती है।

कुल मिलाकर "ढाणी" हरियाणवी सिनेमा की एक तकनीकी रूप से मजबूत फिल्म है। एक सुनसान घर की पृष्ठभूमि में बुनी गई यह कहानी साहस, हिम्मत, भाई-बहन के अटूट रिश्ते और नारी सशक्तिकरण का प्रभावशाली संदेश देती है। यदि आप सस्पेंस और कंटेंट आधारित सिनेमा देखना पसंद करते हैं, तो यह फिल्म निश्चित रूप से देखने लायक है।