Cinematic Haryana हरियाणा प्रदेश की पहली हरियाणवी सिनेमा वेबसाइट

रंगीली

हरियाणवी सिनेमा में संवेदनशील कहानियों की कमी नहीं, कमी अक्सर उन्हें प्रभावी सिनेमाई भाषा देने की होती है। 2016 में सतरंगी जैसी फिल्म से पहचान बना चुके निर्देशक संदीप शर्मा की रंगीली भी एक ऐसे विषय को उठाती है जिसमें भावनात्मक और सामाजिक स्तर पर काफी संभावनाएं हैं। कहानी एक ऐसे पिता हिम्मत सिंह और उसके दो बेटों की है, जो अपनी आंखों की रोशनी खोने के बाद जिंदगी के सबसे कठिन दौर से गुजरते हैं। समस्या यह है कि जिस कहानी में गहरी संवेदना और मजबूत सिनेमाई संभावना मौजूद है, फिल्म उसका पूरा लाभ उठाने में बार-बार चूकती दिखाई देती है।

फिल्म का मूल विचार निश्चित तौर पर असर पैदा करने वाला है। बच्चों की दृष्टि चले जाने के बाद पिता का टूटना, उन्हें संभालना और दोबारा जिंदगी से जोड़ने की कोशिश करना कहानी का मजबूत पक्ष है। राम और लक्ष्मण का ट्रेन की आवाज की ओर आत्महत्या के इरादे से बढ़ना और हिम्मत का उन्हें रोककर गले लगा लेना फिल्म के उन दृश्यों में है जहां कहानी सचमुच दर्शक को पकड़ती है। लेकिन समस्या यह है कि ऐसे प्रभावशाली क्षण लगातार नहीं आते। पटकथा कई जगह अपने ही भावनात्मक वजन के नीचे धीमी पड़ जाती है। घटनाएं कभी अचानक सामने आती हैं तो कभी उनके बीच जरूरी नाटकीय पुल गायब दिखाई देता है। कई दृश्यों को देखकर लगता है कि कहानी को आगे बढ़ाने के बजाय सिर्फ समय पूरा किया जा रहा है। थोड़ी सख्त स्क्रिप्ट और निर्मम एडिटिंग इस फिल्म को काफी अधिक प्रभावी बना सकती थी।

संदीप शर्मा हिम्मत सिंह के किरदार में ईमानदार कोशिश करते हैं। पिता की बेबसी, चिंता और बच्चों को संभालने की बेचैनी उनके अभिनय में दिखाई देती है, लेकिन कई दृश्यों में प्रस्तुति इतनी भावुक और नाटकीय हो जाती है कि किरदार की स्वाभाविकता पीछे छूट जाती है। वीरू चौधरी का नेत्र विशेषज्ञ वाला किरदार अपेक्षाकृत सहज और विश्वसनीय लगता है। हरिओम कौशिक कोच विकास की भूमिका में अपनी मौजूदगी दर्ज कराते हैं। राहुल लाडवाल, रजत सोंगरा, गायत्री कौशल, अर्चना सुहासिनी, नवीन सिंह और मुस्कान सिंह समेत बाकी कलाकार भी अपनी-अपनी भूमिकाओं को निभाने की कोशिश करते हैं। लेकिन कई जगह कलाकारों को भावनाएं महसूस कराने के बजाय उन्हें सीधे प्रदर्शित करने की ओर धकेला गया लगता है। नतीजा यह कि कुछ दृश्य संवेदनशील होने के बजाय जरूरत से ज्यादा नाटकीय लगने लगते हैं।

वी. एम. बेचैन के संवाद हरियाणवी परिवेश की जमीन से जुड़े हैं, लेकिन कई जगह संवाद लेखन फिल्म की स्वाभाविकता पर भारी पड़ता है। भावनात्मक दृश्यों में पात्र जिस तरह बोलते हैं, वह कई बार वास्तविक बातचीत से ज्यादा लिखे हुए संवाद जैसा महसूस होता है। कुछ संवाद असर छोड़ते हैं, लेकिन कुछ इतने स्पष्ट और नाटकीय हैं कि दर्शक को भावना महसूस करने के बजाय यह याद दिलाते हैं कि उसे भावना महसूस करनी चाहिए। संवादों में थोड़ी कटौती, सहजता और मौन के लिए जगह होती तो कई दृश्य ज्यादा ताकतवर बन सकते थे।

डीओपी राहुल ग्रासिया का कैमरा फिल्म की कमजोरियों को छिपाने के बजाय कई जगह और उजागर कर देता है। जींद का रानी तालाब और शहर के दूसरे लोकेशन शॉट्स फिल्म को एक स्थानीय पहचान देते हैं और ड्रोन शॉट्स लोकेशन स्थापित करने में मदद करते हैं। लेकिन इसके बाद सिनेमैटोग्राफी कई जगह असमंजस में फंस जाती है। जरूरत से ज्यादा ज़ूम इन और ज़ूम आउट, अनावश्यक लो-एंगल और कमजोर क्लोज-अप यह सवाल खड़ा करते हैं कि कैमरा कहानी को महसूस कर रहा है या सिर्फ दृश्य रिकॉर्ड कर रहा है। कुछ फ्रेम इतने बनावटी लगते हैं कि पात्र की भावनात्मक स्थिति से ध्यान हटकर कैमरे की मौजूदगी पर चला जाता है। खासकर संवेदनशील दृश्यों में कैमरा जितना संयमित और अदृश्य होना चाहिए, यहां वह कई बार खुद को दिखाने लगता है। बेहतर फ्रेमिंग, नियंत्रित कैमरा मूवमेंट और शॉट चयन में स्पष्ट उद्देश्य फिल्म की दृश्य भाषा को काफी परिपक्व बना सकता था।

एडिटिंग भी फिल्म की गति को संभालने में पूरी तरह सफल नहीं होती। बी. रामपाल और पुष्पेन्द्र सूर्यवंशी की एडिटिंग में कई जगह कसावट की कमी महसूस होती है। कुछ दृश्य जरूरत से ज्यादा लंबे हैं, जबकि कुछ घटनाओं के बीच संक्रमण इतना तेज या असहज है कि कहानी की लय टूट जाती है। भावनात्मक सिनेमा में गति सिर्फ फिल्म को छोटा या बड़ा करने का मामला नहीं होती; सही जगह रुकना और सही जगह काटना ही प्रभाव पैदा करता है। _रंगीली_ कई मौकों पर इसी संतुलन को हासिल नहीं कर पाती।

डीआई और कलर ग्रेडिंग फिल्म के दृश्यात्मक स्तर को वह अतिरिक्त गहराई नहीं दे पाते जिसकी कहानी मांग करती है। अलग-अलग दृश्यों के रंग और टोन में अधिक सुसंगति की जरूरत महसूस होती है। कई फ्रेम ऐसे हैं जिन्हें बेहतर कलर ट्रीटमेंट और कंट्रास्ट से कहीं ज्यादा सिनेमाई बनाया जा सकता था। कहानी भावनात्मक रूप से अंधेरे और उम्मीद के बीच चलती है, लेकिन विजुअल ट्रीटमेंट उस भावनात्मक यात्रा को उतनी मजबूती से प्रतिबिंबित नहीं कर पाता।

बैकग्राउंड म्यूजिक भी फिल्म की बड़ी कमजोरियों में गिना जा सकता है। शुरुआती संगीत ठीक प्रभाव पैदा करता है, लेकिन कई भावनात्मक दृश्यों में स्कोर जरूरत से ज्यादा भावुक होने की कोशिश करता है। कुछ जगह बैकग्राउंड म्यूजिक इतना टीवी धारावाहिक जैसा महसूस होता है कि दृश्य की गंभीरता कम हो जाती है। संवेदनशील कहानी में संगीत को आंसू निकालने की कोशिश करने के बजाय भावनाओं के लिए जगह बनानी चाहिए। यहां कई बार संगीत दृश्य पर भरोसा करने के बजाय दृश्य को भावुक बनाने की जिम्मेदारी खुद उठा लेता है।

कृष्ण भारद्वाज के गीत ग्रामीण और पारिवारिक माहौल के अनुरूप हैं। "बाबू भाह करवा दे", संदीप शर्मा का "बाबू ओ बाबू" और सुखवीर वर्मा का "बाबा जी मन्ने बहू दिवा दे" कहानी के परिवेश से जुड़े हुए लगते हैं। लेकिन गीत फिल्म की कथा में ऐसा अतिरिक्त प्रभाव पैदा नहीं कर पाते जिससे वे याद रह जाएं। कुछ गीतों की प्रस्तुति और कहानी में उनकी जगह को अधिक स्वाभाविक बनाया जा सकता था।

_रंगीली_ की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि इसकी कहानी फिल्म से ज्यादा मजबूत नजर आती है। विषय में भावनात्मक ताकत है, पात्रों में संघर्ष है और कहानी के पास दर्शक को भीतर तक छूने के पर्याप्त मौके हैं, लेकिन पटकथा, निर्देशन और तकनीकी प्रस्तुति उन मौकों को लगातार पूरी ताकत से भुना नहीं पाती। फिल्म कई बार भावुक करने के करीब पहुंचती है, लेकिन फिर कमजोर संक्रमण, जरूरत से ज्यादा नाटकीय प्रस्तुति या असंगत तकनीकी चुनाव उस प्रभाव को तोड़ देते हैं।

फिल्म को सबसे ज्यादा जरूरत थी कसावट की—पटकथा में, संवादों में, एडिटिंग में और कैमरे के इस्तेमाल में। डीओपी स्तर पर अनावश्यक ज़ूम और लो-एंगल शॉट्स से लेकर कमजोर क्लोज-अप और असमान फ्रेमिंग तक, सिनेमैटोग्राफी कई जगह फिल्म की भावनात्मक भाषा को मजबूत करने के बजाय उसे कमजोर करती है। वहीं बैकग्राउंड स्कोर और कुछ अभिनय दृश्यों में अतिरिक्त नाटकीयता फिल्म को वास्तविक संवेदना से दूर ले जाती है।

इसके बावजूद _रंगीली_ को पूरी तरह खारिज करना आसान नहीं है। फिल्म जिस विषय को उठाती है, वह महत्वपूर्ण है और परिवार, दिव्यांगता, संघर्ष, निराशा तथा उम्मीद जैसे मुद्दों को सामने लाने की इसकी कोशिश ईमानदार दिखाई देती है। कलाकारों की मेहनत और कहानी का भावनात्मक आधार कई जगह फिल्म को संभालता है। लेकिन एक मजबूत विषय अपने आप मजबूत फिल्म नहीं बनाता। _रंगीली_ में अच्छी फिल्म बनने की पर्याप्त सामग्री मौजूद है, मगर उसे बेहतर पटकथा, ज्यादा अनुशासित निर्देशन और कहीं अधिक परिपक्व तकनीकी ट्रीटमेंट की जरूरत थी। यह फिल्म उम्मीद की बात तो करती है, लेकिन खुद अपनी सिनेमाई संभावनाओं के स्तर तक पहुंचने के लिए जिस मजबूती की जरूरत थी, वहां कई बार लड़खड़ा जाती है।