Cinematic Haryana हरियाणा प्रदेश की पहली हरियाणवी सिनेमा वेबसाइट

ज़िद

‘ज़िद’ एक ऐसी हरियाणवी फिल्म है, जो कुरुक्षेत्र और करनाल क्षेत्र की ‘नैली बोली’ और वहां के नए कलाकारों को सामने लाने की कोशिश करती है। फिल्म को देखने के बाद सबसे पहले जो बात सामने आती है, वह है इसकी नीयत—स्थानीय भाषा, स्थानीय कलाकार और स्थानीय परिवेश को पर्दे पर जगह देना। हालांकि तकनीकी और कहानी के स्तर पर फिल्म में कई कमियां नजर आती हैं, लेकिन एक नए प्रोजेक्ट के तौर पर इसकी कोशिश को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

फिल्म की कहानी दो भाइयों के बीच चल रही लड़ाई और बहस के इर्द-गिर्द घूमती है, लेकिन सबसे बड़ी कमी यही है कि उनके बीच संघर्ष की असली वजह को फिल्म प्रभावी ढंग से स्थापित नहीं कर पाती। राइटर और डायरेक्टर जोगिया विकी कहानी के इस मूल सवाल को दर्शकों तक स्पष्ट रूप से पहुंचाने में सफल नहीं होते कि आखिर ‘ज़िद’ किस बात की है। नतीजा यह होता है कि फिल्म देखने के बाद इस सवाल का जवाब दर्शक को खुद तलाशना पड़ता है। कहानी में भावनात्मक टकराव मौजूद है, लेकिन उसे पर्याप्त गहराई और स्पष्टता के साथ पेश करने की जरूरत थी।

कास्टिंग फिल्म का बेहद महत्वपूर्ण हिस्सा है और ‘ज़िद’ में कुछ जगहों पर यही कमजोरी साफ दिखाई देती है। किसी छोटे से छोटे किरदार की चूक भी पूरे प्रोजेक्ट के प्रभाव को कम कर सकती है, फिर चाहे उसका स्क्रीन टाइम सिर्फ कुछ सेकंड का ही क्यों न हो। फिल्म में कुछ किरदार ऐसे हैं जहां चयन और निर्देशन दोनों पर थोड़ा और ध्यान दिया जा सकता था।

थिएटर कलाकार अमित चौहान ने बबलू का किरदार निभाया है, जो कहानी का मुख्य विलेन है। अमित का प्रदर्शन कुल मिलाकर ठीक है और पहली फिल्म के लिहाज से उनकी कोशिश दिखाई देती है। हालांकि उनके किरदार को जिस तरह लिखा और प्रस्तुत किया गया है, वहां निर्देशक उनसे और बेहतर काम ले सकते थे। बबलू को केवल बाइक पर घूमते हुए दिखाने के बजाय उसके काले कारनामों और उसके प्रभाव को ज्यादा प्रभावी तरीके से दिखाया जाता तो किरदार में ज्यादा वजन आता। अमित के लुक और व्यक्तित्व का भी निर्देशक बेहतर इस्तेमाल कर सकते थे। इसके बावजूद अमित की कोशिश को सराहा जाना चाहिए, क्योंकि यह उनका पहला प्रोजेक्ट है।

उमा शंकर अपने किरदार में पूरी तरह फिट नजर आते हैं। उनकी मौजूदगी और अभिनय में किरदार के प्रति पकड़ दिखाई देती है।

बबलू की मां का किरदार निभाने वाली प्रगति कुछ दृश्यों में अच्छा काम करती हैं, लेकिन एक-दो जगह उनका अभिनय जरूरत से ज्यादा दिखाई देता है और वहां किरदार से बाहर जाने का एहसास होता है। इसी तरह राहुल की मां का किरदार निभाने वाली संगीता भी कुछ दृश्यों में ठीक लगती हैं, लेकिन कुछ जगह उनका अभिनय किरदार की सहजता से बाहर जाता हुआ नजर आता है। इन हिस्सों में थोड़ा संयम और बेहतर निर्देशन अभिनय को और प्रभावी बना सकता था।

राहुल की बहन का रिश्ता तुड़वाने वाले पंडित का किरदार फिल्म के कमजोर किरदारों में शामिल है। अभिनय के स्तर पर यह किरदार प्रभावित नहीं करता और डबिंग के दौरान भी लिप-सिंक कई जगह सही नहीं बैठती। ऐसे छोटे किरदार भी फिल्म की विश्वसनीयता पर असर डालते हैं। निर्देशक को शूटिंग और डबिंग, दोनों चरणों में इस तरह की चीजों पर अधिक ध्यान देना चाहिए था। केवल यह सोचकर कि किरदार कुछ सेकंड का है, उसमें समझौता करना फिल्म के लिए नुकसानदायक हो सकता है।

जोगिया विकी के निर्देशन की बात करें तो कमियों के बावजूद उन्होंने फिल्म को अंत तक संभालने की कोशिश की है। कुछ हिस्सों में निर्देशन अच्छा है और फिल्म को पूरा करने की उनकी मेहनत दिखाई देती है। खासकर नए कलाकारों के साथ काम करना और स्थानीय परिवेश को कहानी का हिस्सा बनाना एक सकारात्मक पहल है। हालांकि कहानी की बुनियाद, किरदारों की मोटिवेशन और कुछ दृश्यों की लंबाई पर ज्यादा काम किया जाता तो फिल्म का प्रभाव काफी बढ़ सकता था।

डीओपी का काम फिल्म के कुछ हिस्सों में खास तौर पर ध्यान खींचता है। नहर पर किया गया ड्रोन शॉट बेहद खूबसूरत है और सिनेमैटिक तरीके से फिल्म को एक अलग स्तर देता है। ऐसे शॉट देखकर लगता है कि टीम के पास विजुअल्स को बेहतर बनाने की क्षमता है। हालांकि आखिरी लड़ाई वाले लोकेशन सीक्वेंस में कैमरा वर्क उतना प्रभावी नहीं रहता और वहां एक्शन की ऊर्जा को कैमरा पूरी तरह पकड़ नहीं पाता।

फिल्म का बैकग्राउंड स्कोर इसके मजबूत पक्षों में से एक है। सारंगी और फ्लूट का इस्तेमाल काफी प्रभावी तरीके से किया गया है। कई जगह बैकग्राउंड म्यूजिक दृश्य के भाव को बेहतर तरीके से उभारता है और सुनकर लगता है कि इसे तैयार करने वाले व्यक्ति को अपने काम का अच्छा अनुभव है। फिल्म के गाने भी कुल मिलाकर अच्छे हैं और स्थानीय माहौल के साथ जुड़ते हैं।

एडिटिंग की जिम्मेदारी सोमवीर प्रजापत ने संभाली है। एक-दो दृश्यों को छोड़ दिया जाए तो एडिटिंग ठीक है। हालांकि स्क्रीनप्ले और एडिटिंग के स्तर पर कुछ दृश्यों को और कसने की जरूरत थी। खेत में शराब वाला लंबा दृश्य और अंत में लड़ाई वाला सीक्वेंस अपनी अवधि के हिसाब से जरूरत से ज्यादा लंबे लगते हैं। इन दृश्यों को छोटा और अधिक प्रभावी रखा जाता तो फिल्म की गति बेहतर होती।

स्क्रीनप्ले ‘ज़िद’ का एक ऐसा हिस्सा है जिस पर सबसे ज्यादा काम किए जाने की जरूरत थी। कुछ दृश्यों में कहानी आगे बढ़ने के बजाय रुकती हुई महसूस होती है। लंबे दृश्यों में संवाद और घटनाओं का प्रभाव भी कम होने लगता है। फिल्म की मूल कहानी में संभावनाएं हैं, लेकिन उसे ज्यादा कसाव, स्पष्टता और बेहतर चरित्र-निर्माण की जरूरत थी।

इन तमाम तकनीकी और कहानी संबंधी कमियों के बावजूद फिल्म में कुछ ऐसी बातें हैं जो इसे देखने लायक बनाती हैं। सबसे अच्छी बात यह है कि इसे परिवार के साथ बैठकर देखा जा सकता है। फिल्म में गालियों का इस्तेमाल नहीं है, जो आज के समय में एक सकारात्मक बात है। कुरुक्षेत्र-करनाल क्षेत्र की बोली का इस्तेमाल फिल्म को अपनी अलग पहचान देता है। स्थानीय भाषा का यह टच उन दर्शकों को खास तौर पर पसंद आ सकता है जो इस बोली और परिवेश से जुड़े हुए हैं।

फिल्म में थोड़ी-बहुत कॉमेडी भी है, जो कहानी के बीच हल्का माहौल बनाने का काम करती है। बबलू का डायलॉग—“जब साँप मारण आली लाठी ने घुन खा जावअ तो वो किसी काम नहीं रहती”—ऐसा संवाद है जिसे दर्शक याद रख सकते हैं और शायद सोशल मीडिया पर इस्तेमाल भी करना चाहें।

कुल मिलाकर ‘ज़िद’ तकनीकी रूप से एक कमजोर फिल्म जरूर है, लेकिन इसे केवल उसकी कमियों के आधार पर खारिज करना भी उचित नहीं होगा। यह कुरुक्षेत्र, करनाल और आसपास की बोली-बानी तथा नए कलाकारों को मंच देने की कोशिश करती है। खास बात यह है कि स्टेज हरियाणा जैसे ओटीटी प्लेटफॉर्म पर इस क्षेत्र के कलाकारों की मौजूदगी अभी भी सीमित दिखाई देती है। ऐसे में जब नए कलाकार और फिल्ममेकर अपना पहला प्रोजेक्ट लेकर सामने आते हैं, तो उन्हें अवसर और प्रोत्साहन मिलना भी जरूरी है।

‘सिनेमैटिक हरियाणा’ की तरफ से फिल्म देखने की वजह फिल्म को तकनीकी रूप से बेहतरीन बताना नहीं है, बल्कि नए कलाकारों और नए प्रयास को देखना और समझना है। पहली फिल्म में गलतियां होना स्वाभाविक है। ‘ज़िद’ की कमियां साफ दिखाई देती हैं, लेकिन इन्हीं कमियों से अगली फिल्म के लिए सीख भी निकाली जा सकती है।

निर्देशक जोगिया विकी और पूरी टीम से उम्मीद है कि आने वाले प्रोजेक्ट्स में कहानी की स्पष्टता, स्क्रीनप्ले की कसावट, कास्टिंग, अभिनय निर्देशन, डबिंग और तकनीकी बारीकियों पर और ज्यादा ध्यान दिया जाएगा। अगर ऐसा होता है तो यही टीम आने वाले समय में इससे कहीं बेहतर काम कर सकती है।

अगर आप हरियाणवी सिनेमा, खासकर कुरुक्षेत्र-करनाल क्षेत्र की बोली और नए कलाकारों को देखना चाहते हैं, तो ‘ज़िद’ को एक बार जरूर देखा जा सकता है। यह परफेक्ट फिल्म नहीं है, लेकिन एक शुरुआत जरूर है—और हर अच्छी शुरुआत की तरह इसमें सुधार की गुंजाइश भी उतनी ही बड़ी है।