मोमाकू (मोटर, माचिस और कटर)
Kable One पर रिलीज़ हुई हरियाणवी फिल्म **'मोमाकू' (मोटर, माचिस और कटर)** तकनीकी और रचनात्मक रूप से पिछले 5 वर्षों में आई सबसे मजबूत और बेहतरीन फिल्मों में से एक है। लगभग 6 साल पहले आई हरियाणा की पहली वेब सीरीज़ 'कैंप वनवास' तकनीकी रूप से काफी कमजोर थी और उसका स्क्रीनप्ले भी दिशाहीन था। लेकिन उस असफलता के बाद लेखक और निर्देशक कुलदीप कुनाल ने जिस तरह का काम किया है, वह काबिले तारीफ है। उन्होंने 'मोमाकू' का स्क्रीनप्ले इतनी कसावट के साथ लिखा है कि फिल्म की शुरुआत से लेकर अंत तक दर्शकों का ध्यान एक पल के लिए भी नहीं भटकता।
कहानी तीन आर्थिक तंगी से जूझ रहे आदमियों के इर्द-गिर्द घूमती है, जो एक ATM मशीन चुराकर खेतों के बीच बने एक ट्यूबवेल के कमरे में छिपा देते हैं। उनका मुख्य मकसद किसी भी तरह ATM को तोड़कर पैसे निकालना होता है। लेकिन जैसे-जैसे रात गहराती है, उनके बीच लालच, डर, शक और आपसी अविश्वास तेजी से बढ़ने लगता है। ATM खोलने की तमाम कोशिशें नाकाम साबित होती हैं और धीरे-धीरे हालात बेहद अराजक और हास्यास्पद मोड़ लेने लगते हैं। अंत में उनकी यही हड़बड़ी और लालच उन्हें एक ऐसे अप्रत्याशित अंजाम तक ले जाता है, जिसकी उन्होंने सपने में भी कल्पना नहीं की होती। फिल्म की 80 प्रतिशत शूटिंग बेहद सीमित जगहों पर हुई है—जैसे गाँव का जोहड़, वहाँ हो रहा जागरण और खेत का कमरा—लेकिन इसके बावजूद कहानी की पकड़ और अंत में दिखाई गई मार्मिकता दर्शकों के दिल को छू लेती है।
तकनीकी मोर्चे पर फिल्म बहुत ऊंचे स्तर की है, जिससे साफ पता चलता है कि कैमरों के चलने से पहले कागज़ पर बहुत बारीकी से पेपरवर्क किया गया था। शोएब सिद्दीकी और ज़ोहन सिद्दीकी की सिनेमैटोग्राफी (DOP) बेहद प्रोफेशनल और कमाल की है। गाँव, जोहड़ और जागरण के दूर से लिए गए वाइड एंगल शॉट्स और ड्रोन फोटोग्राफी फिल्म को एक ग्रैंड लुक देते हैं। इसके अलावा खेत के कमरे जैसी छोटी और सीमित जगह में भी हर दृश्य को खूबसूरती से फिल्माया गया है। फिल्म की लाइटिंग व्यवस्था हर सीन में बेहद प्रभावशाली है, और DI (कलर ग्रेडिंग) फिल्म के पूरे विज़ुअल अनुभव को और अधिक सुंदर बना देती है।
फिल्म की एडिटिंग और साउंड डिज़ाइनिंग इसकी सबसे बड़ी ताकतों में से एक हैं। जागरण के गानों और खेत के कमरे के दृश्यों के बीच जिस तरह के ट्रांज़िशन इस्तेमाल किए गए हैं, वे बहुत ध्यान से तैयार किए गए हैं। साउंड डिज़ाइनर आयुष बहल और फॉली वर्क में हिमांशु शेखर ने छोटी-छोटी आवाज़ों पर बारीकी से ध्यान दिया है; आयशर ट्रैक्टर में ATM ले जाने के साउंड से लेकर बाकी जगहों तक साउंड कहीं भी लाउड या असंतुलित नहीं लगता। जागरण के दौरान चलने वाले भजन और परिस्थितियां एक-दूसरे के साथ बिल्कुल सटीक बैठती हैं, जिसमें सोमवीर कथूवाल का गाया गीत विशेष रूप से बहुत सुंदर और असरदार लगता है।
कास्टिंग के मामले में भी फिल्म कहीं से भी कमजोर नजर नहीं आती। यशपाल शर्मा, जतिन सरना, तुषार दत्त, गौरव शर्मा, अपूर्वा अरोड़ा, सोनू रोंझिया, श्रीकांत वर्मा, बलजिंदर कौर, मुकेश मुसाफिर और सतीश कश्यप—हर एक कलाकार ने अपने किरदार में जान फूंक दी है। यशपाल शर्मा की एक्टिंग हमेशा की तरह बेहतरीन है। आर्ट डायरेक्टर सनी मैसन ने खेत के कमरे का सेट और जागरण का माहौल इतना स्वाभाविक और वास्तविक तैयार किया है कि कहीं भी कृत्रिमता या ओवर-द-टॉप फील नहीं आता।
हालाँकि बलजिंदर कौर के बेटे की बहू का अस्पताल वाला एक छोटा सा दृश्य थोड़ा ओवर-ड्रमैटिक लगता है, लेकिन इसके अलावा पूरी फिल्म तकनीकी और भावनात्मक रूप से बेहद संतुलित है। प्रोड्यूसर सतेंद्र सहरावत और निर्देशक कुलदीप कुनाल ने बजट की सीमाओं को तोड़कर और सही पैसा लगाकर यह साबित कर दिया है कि हरियाणा में भी ऐसी विश्वस्तरीय फिल्में बन सकती हैं। अब काफी कुछ इस बात पर निर्भर करेगा कि OTT प्लेटफॉर्म Kable One इसका प्रचार-प्रसार किस तरह करता है, लेकिन कंटेंट के मामले में यह एक ऐसी शानदार और बांधकर रखने वाली फिल्म है जिसे देखते समय आप एक पल के लिए भी पलक झपकाना नहीं चाहेंगे।