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जानलेवा इश्क

हरियाणा में प्रादेशिक सिनेमा को एक पेशेवर और उच्च स्तरीय पहचान दिलाने के लिए पटकथा की गुणवत्ता और मौलिक लेखन का संवर्धन अत्यंत आवश्यक है। मालती फिल्म्स एंटरटेनमेंट द्वारा निर्मित एवं डिजिटल प्लेटफॉर्म 'स्टेज' पर प्रदर्शित वेब फिल्म जानलेवा इश्क़' इस दिशा में एक मानक स्थापित करती है। पूर्व में 'कॉलेज कांड' और 'फौजा' जैसे बहुचर्चित प्रोजेक्ट्स दे चुके लेखक प्रवेश राजपूत ने इस फिल्म की मूल कहानी रची है, जबकि सचिन बांगड़ ने अपनी प्रभावी पटकथा और संवादों से इसमें प्राण फूंक दिए हैं। 'दुजवर' और 'पुनर्जन्म' जैसी रहस्यमयी तथा विचारोत्तेजक कृतियों के माध्यम से अपनी पहचान बना चुके सचिन बांगड़ ने यहाँ भी एक सामान्य से प्रतीत होने वाले प्रेम-प्रसंग को अपराध, सस्पेंस और सामाजिक विषमताओं के ऐसे गहन ताने-बाने में पिरोया है कि दर्शक अंत तक चकित रह जाता है।

कहानी का कथानक हरियाणा पुलिस की तेज़तर्रार और निष्ठावान महिला निरीक्षक कविता राठी (अर्चना राव) द्वारा की जा रही एक हत्या की तफ्तीश से प्रारंभ होता है। पड़ताल के दौरान प्रेम, जातिगत भेदभाव, सामाजिक हैसियत और अंतर्निहित अपराध की परतें उधड़ती हैं। संजू (विक्रम मलिक) और पूजा (ऐश्वर्या आर्य) बचपन के साथी हैं जो एक ही गाँव में साथ पढ़ते हुए डॉक्टर बनने का स्वप्न देखते हैं और परस्पर प्रेम में बंध जाते हैं। किंतु सामाजिक संरचना में संजू का एक निर्धन व कथित निचली जाति से होना तथा पूजा का एक प्रभावशाली राजनेता (रमेश कुंडू) की पुत्री होना इस रिश्ते के आड़े आ जाता है। समय के चक्र के साथ परिस्थितियां उन्हें पृथक कर देती हैं, और इसी बीच अमित (मनीष बलराज) एक अपराधी व डीलर के रूप में सामने आता है। यह कहानी भावना, सामाजिक यथार्थ और थ्रिलर का एक अनोखा संगम पेश करती है।

फिल्म की सबसे बड़ी ताकत इसकी पटकथा संरचना है। शुरुआती 24 मिनट तक सब कुछ अत्यंत सहज और सामान्य गति से चलता है, किंतु तत्पश्चात पटकथा ऐसा तीव्र मोड़ लेती है कि दर्शक अंत तक अपनी सीट से बंधा रहता है। सचिन बांगड़ के लिखे संवाद न केवल चुटीले हैं बल्कि ठेठ हरियाणवी माटी की महक लिए हुए हैं; निरीक्षक कविता राठी के मुख से निकले संवाद—“थोड़ा कहा, घणा समझा” और “तीतर का भी मोर बना दे थाने में”—चरित्रों की प्रामाणिकता और देसी तेवर को निखारते हैं।

बॉलिवुड के प्रतिष्ठित निर्माण संस्थानों के साथ काम कर चुके निर्देशक हेमंत आर. प्रदीप का हरियाणवी सिनेमा में यह प्रथम पदार्पण है, और उन्होंने अपने कुशल निर्देशन से यह सिद्ध कर दिया है कि वे दर्शकों की नब्ज़ बखूबी पहचानते हैं। नहर में संजू का शव फेंकने वाला क्लाइमेक्स दृश्य निर्देशन, छायांकन और अभिनय के अद्भुत समन्वय का उदाहरण है। हेमंत ने हर पात्र को उसकी आवश्यकतानुसार उचित स्क्रीन-स्पेस दिया है। स्टेज और चौपाल जैसे ओटीटी प्लेटफॉर्म्स को अपनी लाइब्रेरी बढ़ाने के स्थान पर इस प्रकार के व्यावसायिक और उच्च-स्तरीय प्रोजेक्ट्स को प्राथमिकता देनी चाहिए।

कलाकारों का चयन और उनका अभिनय फिल्म को यथार्थवादी धरातल प्रदान करता है। निरीक्षक कविता राठी के रूप में अर्चना राव ने अत्यंत प्रभावशाली और जीवंत अभिनय किया है; ऐसा प्रतीत होता है कि इस प्रकार के सशक्त चरित्रों में वे पूरी तरह रच-बस जाती हैं। ऐश्वर्या आर्य (पूजा), विक्रम मलिक (संजू), मनीष बलराज (अमित), अजय शर्मा (हवलदार दीपक), रमेश कुंडू (पूजा के पिता), श्याम वशिष्ठ (पूजा के चाचा) और कौशल भारद्वाज (संजू के पिता) ने अपने-अपने दायित्वों का निर्वहन पूरी निष्ठा से किया है।

तकनीकी मोर्चे पर यह फिल्म प्रादेशिक सिनेमा के लिए नए मापदंड स्थापित करती है। शुभम सैनी का छायांकन (Cinematography) असाधारण है; विशेष रूप से नहर वाले सीन्स और रात्रिकालीन दृश्यों (Night Shots) में प्रकाश, कैमरा फ्रेमिंग और विजुअल एम्बियंस का संतुलन देखने योग्य है। हिम्मत सिसोदिया और सालिक द्वारा किया गया संपादन (Editing) तथा डिजिटल इमेजिंग (DI/Color Grading) अत्यंत सराहनीय है—रात में पूजा और अमित के बातचीत वाले दृश्य (1:07 मिनट) में रंग-सुधार इतना सूक्ष्म है कि दृश्य जीवंत हो उठता है।

परवीन चौहान द्वारा रचित व गाया गया गीत “यारा ओ यारा रे” वाद्ययंत्रों और बाँसुरी के सुमधुर मिश्रण के साथ एक गभीर छाप छोड़ता है। सहज रंधावा द्वारा तैयार किया गया पार्श्व संगीत (Background Music) यूट्यूब के रेडीमेड साउंड्स पर निर्भर रहने के बजाय दृश्य-दर-दृश्य मौलिक रूप से रचा गया है, जो सस्पेंस को सघन बनाता है। अनिरुद्ध की ध्वनि रिकॉर्डिंग (Sound Recording) भी सटीक रही है।

फिल्म का प्रकाश-संयोजन (Lighting) इसकी सबसे बड़ी तकनीकी शक्ति है। मेजर, राम, श्याम और मोहन की लाइटिंग टीम ने छाया और प्रकाश के खेल को अत्यंत तकनीकी दक्षता से प्रस्तुत किया है। रात के 1:30 बजे ई-रिक्शा में शव ले जाने वाले दृश्य में सड़क की बत्तियों और रिक्शा चालक के चेहरे पर पड़ती हल्की रोशनी का तालमेल यह सिखाता है कि सिनेमा में उजाले और अंधेरे का प्रयोग किस प्रकार कथा-वाचन के लिए किया जाता है। इसके अतिरिक्त, कला निर्देशक ने पूजा के घर के सेट-डिज़ाइन (सफेद सोफ़े, दीवारों का रंग) से लेकर संजू के घर के ग्रामीण माहौल तक सूक्ष्म बारीकियाँ उकेरी हैं। रज़िया सुल्तान का परिधान-विन्यास (Costume Design) भी किरदारों की सामाजिक स्थिति और देह-भाषा के पूर्णतः अनुकूल है।

संक्षेप में, 'जानलेवा इश्क़' वर्ष 2025 में स्टेज प्लेटफॉर्म पर प्रदर्शित तकनीकी रूप से सबसे सुदृढ़ और परिपक्व हरियाणवी फिल्म मानी जा सकती है। कसी हुई पटकथा, उत्कृष्ट छायांकन, संतुलित लाइटिंग और अर्चना राव के बेजोड़ अभिनय से सुसज्जित यह फिल्म प्रादेशिक थ्रिलर सिनेमा के क्षितिज को नया विस्तार देती है और इसके आगामी सीज़न/भाग के लिए एक उत्सुकता छोड़ जाती है।