हरियाणा की पृष्ठभूमि पर बनी देशभक्ति, परिवार और संघर्ष की कहानी
फिल्म 'फौजा' (Fouja) वर्ष 2023 में प्रदर्शित हिंदी भाषा की एक बहुचर्चित एक्शन-ड्रामा फिल्म है, जिसका निर्देशन प्रमोद कुमार पुनहाना ने किया है तथा इसका निर्माण अजीत डालमिया (समीक्षा फिल्म्स) के बैनर तले हुआ है। यह फिल्म भारतीय सेना, सैनिक परिवारों के त्याग, देशभक्ति, कर्तव्य-निष्ठा और आत्म-सम्मान जैसे गंभीर विषयों को केंद्र में रखकर रची गई है। 70वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों में इस फिल्म ने तीन शीर्ष पुरस्कार (स्वर्ण एवं रजत कमल) अर्जित कर न केवल हरियाणवी सिनेमा बल्कि संपूर्ण भारतीय प्रादेशिक सिनेमा के इतिहास में एक नया स्वर्णिम अध्याय जोड़ा है।
फिल्म की पटकथा प्रवेश राजपूत और आकाश सिंह द्वारा संयुक्त रूप से लिखी गई है। कथा का ताना-बाना एक ऐसे गांव और परिवार के इर्द-गिर्द बुना गया है, जिसकी सात पीढ़ियां भारतीय सेना में अपनी सेवाएं देते हुए देश के लिए अपने प्राण न्योछावर कर चुकी हैं। परिवार के मुखिया (पवन मल्होत्रा) स्वयं शारीरिक अक्षमता के कारण सेना में भर्ती होने से वंचित रह गए थे, इसलिए वे अपने अधूरे स्वप्न को पूरा करने की उम्मीद अपने बेटे (कार्तिक डम्मू) से लगाते हैं। शुरुआत में बेटा एक गैर-जिम्मेदार, दिशाहीन और अनुशासनहीन युवक के रूप में दिखाया गया है, जिसे अपने परिवार की इस गौरवशाली सैन्य विरासत का कोई मोल समझ नहीं आता। किंतु, जैसे-जैसे परिस्थितियां बदलती हैं, उसे अपने पिता के त्याग, वेदना और राष्ट्र-सेवा के वास्तविक अर्थ का बोध होता है। इसके बाद उसका आंतरिक रूपांतरण शुरू होता है और वह स्वयं को कठोर सैन्य प्रशिक्षण के लिए समर्पित कर देता है। कहानी में केवल पारिवारिक भावनाएं ही नहीं हैं; इसमें ग्रामीण राजनीति, भू-माफिया द्वारा परिवार की जमीन हड़पने की साजिश और स्थानीय संघर्ष को भी समानांतर रूप से पिरोया गया है, जो कथा को एक यथार्थवादी तनाव और रोमांच प्रदान करता है।
फिल्म का अभिनय पक्ष अत्यंत परिपक्व और प्रभावशाली है। पवन मल्होत्रा ने एक असहाय किंतु संकल्पी पिता की भूमिका में अविस्मरणीय अभिनय किया है। एक पिता की वेदना, राष्ट्र के प्रति अटूट निष्ठा और बेटे के प्रति कठोरता व प्रेम के द्वंद्व को उन्होंने अपनी आँखों और देह-भाषा से जीवंत कर दिया। कार्तिक डम्मू ने एक लापरवाह युवक से अनुशासित फौजी बनने की यात्रा को बहुत स्वाभाविक तरीके से पर्दे पर उतारा है। ऐश्वर्या सिंह मुख्य महिला पात्र के रूप में कहानी को भावनात्मक संतुलन देती हैं, जबकि जोगी मलंग, हरिओम कौशिक, नवीन, जान्हवी सिंह सांगवान, नीवा मलिक और संदीप शर्मा जैसे सह-कलाकारों ने अपने-अपने चरित्रों से ग्रामीण आभामंडल को प्रामाणिकता प्रदान की है।
फिल्म का तकनीकी पक्ष बेहद समृद्ध है, जिससे साफ झलकता है कि सीमित संसाधनों के बावजूद निर्माण टीम का विजन बिल्कुल स्पष्ट था। शशांक विराग, जय अहलावत और शशि द्वारा ARRI कैमरों पर किया गया छायांकन विजुअल क्वालिटी को अंतरराष्ट्रीय स्तर का सिनेमाई रूप देता है। अरावली की प्राकृतिक पहाड़ियों, हेली मंडी, जटोली गांव, भोंडसी, पटौदी रेलवे स्टेशन और सुल्तानपुर लेक जैसे वास्तविक स्थानों पर की गई शूटिंग दृश्य भाषा को बेहद यथार्थवादी बनाती है। यह पूरी फिल्म मात्र 35 दिनों की रिकॉर्ड अवधि में फिल्माई गई, जो कार्यकारी निर्माता विकास बरवाल, एसोसिएट डायरेक्टर अनमोल दर्शन, लाइन प्रोड्यूसर जयंत कटारिया और पूरी प्रोडक्शन टीम (कुलदीप सिंह एवं मोनू गुर्जर) के कुशल नियोजन का प्रमाण है। विशाल मान, मनदीप दहिया, पवन कौशिक और उनकी आर्ट टीम (आरजे भारद्वाज, विकास भारद्वाज, एमी चाहर आदि) ने सेट और ग्रामीण परिवेश को इतना वास्तविक रखा है कि कहीं भी कृत्रिमता नहीं झलकती। मंजू शर्मा द्वारा डिजाइन की गई कॉस्ट्यूम और दीपशिखा-बिंटू का मेकअप किरदारों की ग्रामीण पृष्ठभूमि से पूरी तरह मेल खाता है।
युग भूषाल के संगीत निर्देशन और नौशाद सदर खान के लिखे गीतों ने फिल्म की आत्मा को छूने का काम किया है। सलमान अली की बुलंद आवाज में गाया गया गीत "सरफरोशी" और "उड़ान", सोमवीर कथूरवाल, सलमान अली व समीक्षा श्रीवास्तव का "तेरी गली", तथा हिमांशु कोहली व सुधीर यदुवंशी का "अंगारे" कहानी के भावनात्मक आवेगों को गहरा आयाम देते हैं। सोमवीर कथूरवाल और नौशाद सदर खान द्वारा गाया गया "सलामी" गीत फिल्म का मुख्य आकर्षण है, जो देशभक्ति का जज्बा जगाता है।
फिल्म 'फौजा' ने 70वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों (National Film Awards) में तीन प्रमुख श्रेणियों में पुरस्कार जीतकर इतिहास रचा। प्रमोद कुमार पुनहाना को उनकी पहली ही फिल्म में उत्कृष्ट निर्देशन के लिए प्रतिष्ठित 'स्वर्ण कमल' (Swarna Kamal - Best Debut Film) से सम्मानित किया गया। पवन मल्होत्रा को पिता के कालजयी और भावनात्मक अभिनय के लिए 'रजत कमल' (Rajat Kamal - Best Supporting Actor) प्रदान किया गया, और नौशाद सदर खान को फिल्म के प्रेरणादायक गीत *"सलामी"* के लिए 'रजत कमल' (Rajat Kamal - Best Lyrics) राष्ट्रीय पुरस्कार मिला।
'फौजा' केवल एक सैन्य-आधारित एक्शन-ड्रामा फिल्म नहीं है, बल्कि यह एक पिता के अधूरे स्वप्न, एक बेटे के आत्म-परिवर्तन और मातृभूमि के प्रति सर्वस्व न्योछावर करने की एक कालजयी गाथा है। प्रामाणिक लोकेशन्स, ARRI कैमरों का उम्दा इस्तेमाल, कसा हुआ स्क्रीनप्ले, मर्मस्पर्शी संगीत और पवन मल्होत्रा का राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता अभिनय इसे भारतीय प्रादेशिक सिनेमा का एक ऐसा मील का पत्थर बनाते हैं, जिसे हर सिनेमाप्रेमी को अवश्य देखना चाहिए।