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रिव्यू: सामाजिक समरसता की बकरी

हरियाणा फ़िल्म महोत्सव 2025 में विशेष स्क्रीनिंग के दौरान प्रदर्शित हुई फ़िल्म 'बकरी' (Bakri) ने दर्शकों से भरपूर सराहना प्राप्त की है। हरियाणा की प्रमुख फ़िल्म निर्माण कंपनियों में शुमार 'ओम कौशिक प्रोडक्शन' के बैनर तले निर्मित यह फ़िल्म प्रादेशिक सिनेमा के उच्च मानकों को स्थापित करने वाली श्रृंखला में एक और सशक्त और महत्वपूर्ण जोड़ है। '1600 मीटर', 'तोता', 'मेवात', 'बैड बॉयज़ भिवानी', 'बहू काले की', 'गिंडी', 'ऑपरेशन मेवात', 'चिड़िया', 'ढाणी', 'ज़िला महेंद्रगढ़' और 'पायल' जैसी सफल कृतियों के बाद ओम कौशिक प्रोडक्शन ने इस फ़िल्म के माध्यम से एक बार फिर अपनी कलात्मक उत्कृष्टता का परिचय दिया है।

फ़िल्म के निर्देशन की बागडोर आर.जे. भारद्वाज ने संभाली है, और बतौर निर्देशक उनकी यह पहली फ़िल्म होने के बावजूद मानवीय संवेदनाओं और मूल्यों को लेकर उनकी गहरी समझ हर दृश्य में स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। विशेष रूप से वह मार्मिक दृश्य, जहाँ कसाई बकरी को लेकर चले जाते हैं और बकरी के झुंड में मुख्य पात्र बेबस खड़ा रह जाता है, दर्शकों के हृदय को गहराई से छू जाता है। फ़िल्म की सबसे बड़ी विशेषताओं में से एक इसमें 'अहिरवाटी' बोली का प्रयोग है, जो हरियाणवी सिनेमा में अमूमन बहुत कम देखने को मिलता है।

हरिओम कौशिक द्वारा लिखित यह कहानी एक साधारण किंतु अत्यंत भावुक और आत्मीय कथानक पर आधारित है। कथा का केंद्रबिंदु एक पाँच वर्षीय मासूम बालक और उसकी बकरी के बीच का अटूट प्रेम, आत्मीयता और उसकी निष्पाप ज़िद है। फ़िल्म दर्शाती है कि कैसे वह बालक अपने घर में बकरी को रखने के लिए अड़ जाता है, जबकि उसकी दादी (बिमला आर्या) सामाजिक मान्यताओं व व्यवस्था के कारण इसके सख्त ख़िलाफ़ होती हैं। सामाजिक समरसता, मानवीयता और प्राणी-प्रेम के धागों से बुनी यह फ़िल्म समाज के उस वर्ग के लिए एक आवश्यक संदेश प्रस्तुत करती है जो आज भी जातिगत वैषम्य और ऊँच-नीच की संकीर्ण धारणाओं से ग्रसित हैं। लेखक हरिओम कौशिक ने इसे बड़े ही सजीव और मार्मिक रूप में उकेरा है, जिसे निर्देशक आर.जे. भारद्वाज ने हर एक दृश्य पर बारीक ध्यान देते हुए और कहानी के साथ गहरा तालमेल बिठाते हुए सटीक स्क्रीन-प्रेजेंस दी है।

कलाकारों के अभिनय और प्रदर्शन के धरातल पर बाल कलाकार दिविज कौशिक (सोनू) ने अद्भुत प्रतिभा का प्रदर्शन किया है। उनकी आँखों का तैरता दर्द, मासूमियत और बकरी के घर लौटने पर छलकती भावुकता दर्शकों को गहराई से द्रवित कर देती है। बिमला आर्या ने दादी की भूमिका को अत्यंत जीवंतता और प्रभावशीलता के साथ निभाया है; विशेष रूप से शुरुआती दृश्यों में बकरी के प्रति उनका प्रतिरोध और चेहरे के भाव अत्यंत प्रामाणिक लगते हैं। पहली बार पर्दे पर आए सुरेश यादव ने पिता के किरदार को सशक्त रूप से प्रस्तुत किया है। इसके अतिरिक्त राजकुमार सैनी (गाँव के ताऊ), मनोज यादव (डॉक्टर) और भोला के किरदार में गाँव की चुगलख़ोर औरत का स्वाभाविक अभिनय ग्रामीण जनजीवन की वास्तविक छवि प्रस्तुत करता है।

तकनीकी मोर्चे पर जुगनू कश्यप का छायांकन (Cinematography) अत्यंत दर्शनीय है। मुख्य पात्र का अपने घर की छत पर होना और नीचे से दादी का आवाज़ लगाना—जैसे दृश्यों को कैमरे में जिस सुंदरता और दृष्टिकोण के साथ कैद किया गया है, वह कहानी को एक विजुअल निखार देता है। पियूष गौतम द्वारा किया गया परिधान-विन्यास (Costume Design) ग्रामीण वातावरण, सादगी और यथार्थ के पूर्णतः अनुकूल है।

ध्वनि और संगीत संयोजन के अंतर्गत तरुण शर्मा का पार्श्व संगीत (Background Music) कथात्मक आवेगों को सघनता प्रदान करता है और कहानी के भावनात्मक पक्ष को ऊँचा उठाता है। यद्यपि ध्वनि रिकॉर्डिंग और साउंड-मिक्सिंग के कुछ सूक्ष्म हिस्सों में थोड़ी शिथिलता महसूस होती है जहाँ आवाज़ों का संतुलन थोड़ा प्रभावित हुआ, किंतु यह साधारण सी कमी फ़िल्म के समग्र सिनेमाई प्रभाव को कम नहीं करती। डिजिटल संसंजन और कलर ग्रेडिंग में मोहित मोर ने प्रकाश और रंगों का समायोजन संतुलित रखा है, हालाँकि इसमें आंशिक सुधार की गुंजाइश बनी रहती है।

निष्कर्षतः, 'बकरी' हरियाणा की ग्रामीण जीवनशैली, पारिवारिक रिश्तों के ताने-बाने और मानवीय संवेदनाओं को बेहद सरलता और सुंदरता के साथ उकेरने वाली एक मर्मस्पर्शी फ़िल्म है। आर.जे. भारद्वाज का कुशल निर्देशन, हरिओम कौशिक का संवेदनशील लेखन, कलाकारों का सहज अभिनय और बेहतरीन तकनीकी शिल्प मिलकर इसके अंतिम दृश्यों में दर्शकों को भावुक कर देते हैं। यह फ़िल्म हरियाणा सिनेमा के इतिहास में एक महत्वपूर्ण और स्मरणीय योगदान के रूप में दर्ज होती है, जो हर आयु वर्ग के दर्शकों के लिए एक अनिवार्य पारिवारिक सिनेमाई अनुभव है।