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बाहें

योगेश कौशिक द्वारा लिखित फिल्म 'बाहे' एक अत्यंत संवेदनशील पारिवारिक कथा है, जो दो भाइयों—राम और राजे—के मध्य फैले त्याग, अटूट विश्वास और अंततः मिलने वाले छल की त्रासदी को बड़े पर्दे पर साकार करती है। बड़ा भाई राम अपने अनुज के स्वर्णिम भविष्य के लिए अपने सर्वस्व का उत्सर्ग करता है, उसे सुशिक्षित कर जीवन के उच्च सोपान पर प्रतिष्ठित करने का हर संभव यत्न करता है; किंतु वही छोटा भाई अंततः कृतघ्नता का परिचय देते हुए विश्वासघात का मार्ग चुनता है। बड़े भाई की पुत्री के असामयिक निधन जैसी हृदयविदारक घटनाओं के माध्यम से यह फिल्म आधुनिक पारिवारिक विघटन और सामाजिक यथार्थ के कटु सत्यों को उजागर करती है। लेखक का कलात्मक विज़न अत्यंत स्पष्ट और विचारणीय है; भावनात्मक धरातल पर उनका लेखन गहरा प्रभाव छोड़ता है। यद्यपि पटकथा में कई स्थानों पर बिखराव और असंबद्धता की अनुभूति होती है, जिससे कथा का समग्र प्रभाव थोड़ा शिथिल पड़ जाता है।

निर्देशन के मोर्चे पर आनंद सोलंकी कथा के अंतर्निहित भावनात्मक आवेगों को पूरी गरिमा और गहराई के साथ उभारने में आंशिक रूप से ही सफल रहे हैं। प्रस्तुतीकरण और तकनीकी निष्पादन में कई स्थल शिथिल प्रतीत होते हैं, जहाँ कुछ अनावश्यक दृश्यों का समावेश फिल्म के मूल गांभीर्य को न्यून करता है। युवा महोत्सव जैसे व्यापक आभामंडल वाले दृश्यों में जिस विशाल कैनवास और भव्यता की अपेक्षा थी, उसका अभाव खलता है; वहीं क्लाइमेक्स दृश्य को भी अधिक मर्मस्पर्शी और नाटकीय गहनता के साथ प्रस्तुत किया जा सकता था। इसके अतिरिक्त, निर्देशक और छायाकार के मध्य जिस सुव्यवस्थित कलात्मक तालमेल की आवश्यकता थी, उसकी कमी पर्दे पर स्पष्ट परिलक्षित होती है।

शुभ संधू का छायांकन (Cinematography) उनकी पूर्ववर्ती कृतियों की तुलना में थोड़ा साधारण जान पड़ता है। राम की भुजा कटने जैसे चरम नाटकीय और तीव्र संवेदनशील दृश्यों में जिस प्रकार के क्लोज़-अप शॉट्स और गहन विजुअल-ट्रीटमेंट की आवश्यकता थी, उन्हें अत्यंत सामान्य ढंग से फिल्माया गया है। कई स्थानों पर कैमरा एंगल और दृश्य-संयोजन कथात्मक संवेदना को ऊँचा उठाने के बजाय साधारण स्तर पर ही छोड़ देते हैं। इसके विपरीत, फिल्म का सर्वाधिक सशक्त और प्रामाणिक पक्ष इसके संवाद-लेखन में समाहित है। परिस्थिति और पात्रों के अंतर्द्वंद्व के अनुरूप लिखे गए संवाद दर्शकों के मर्म को छूते हैं; उदाहरण स्वरूप—“साझा और जॉइंट शील्ड का काम एक जैसा होता है”—जैसा संवाद पात्रों की जीवन-दृष्टि और कथा के मूल दर्शन को अत्यंत प्रभावशाली ढंग से अभिव्यक्त करता है।

अभिनय-कला के धरातल पर जगबीर राठी ने अपने अभिनय-यात्रा का सर्वश्रेष्ठ और अत्यंत सधा हुआ प्रदर्शन दिया है। पूर्व की फिल्मों में जहाँ उनका अभिनय कहीं-कहीं पात्र के दायरे से छिटकता हुआ प्रतीत होता था, वहीं इस कृति में उन्होंने स्वयं को पूरी तरह से नियंत्रित और चरित्र-निष्ठ रखा है। अदिति राव का अभिनय इस फिल्म की एक बड़ी उपलब्धि बनकर उभरता है; उनके चेहरे के सूक्ष्म भाव, पीड़ा और आंतरिक संघर्ष की अभिव्यक्ति दर्शकों को सहज ही भावुक कर देती है। कपिल कठुरवाल ने भी अधिकांश दृश्यों में अपने पात्र के साथ पूर्ण न्याय करते हुए एक सराहनीय उपस्थिति दर्ज कराई है।

फिल्म का संगीतमय पक्ष काफी सकारात्मक अनुभव देता है। जगबीर राठी, सोमवीर कठुरवाल, शालिनी इस्सर और याचना का गायन कथा के मूड के साथ न्याय करता है, तथा तरुण हरितास व अशोक वर्मा का संगीत संयोजन गीतों की मूल संवेदना को निखारता है। किंतु, इसके विपरीत पार्श्व संगीत (Background Music) काफी निराश करता है। महत्वपूर्ण और दुखांत दृश्यों में BGM का प्रभाव अत्यंत क्षीण है; कतिपय स्थानों पर 'स्टॉक म्यूज़िक' का सीधा प्रयोग दर्शकों के भावनात्मक तादात्म्य को खंडित करता है। करुण और मर्मस्पर्शी दृश्यों में यदि एक सघन पार्श्व संगीत रचा जाता, तो फिल्म का प्रभाव कई गुना संवर्धित हो सकता था।

कला निर्देशन और संपादन (Editing) के स्तर पर भी सूक्ष्म परिमार्जन की व्यापक संभावनाएँ दिखाई देती हैं। कुछ सेट कथा के ग्रामीण या सहज परिवेश की तुलना में अनावश्यक रूप से भड़कीले और भव्य लगते हैं, वहीं दृश्यों के बीच का समयांतराल और ट्रांजिशन कई जगह प्रवाह को बाधित करता है। लिप-सिंक जैसी तकनीकी त्रुटियाँ भी दृश्य-अनुभव में बाधा उत्पन्न करती हैं। इन तमाम शिल्पगत एवं तकनीकी कमियों के बावजूद, 'बाहे' अपने उद्देश्यपूर्ण कथ्य, मर्मस्पर्शी संवादों और कलाकारों के उत्कृष्ट अभिनय के बल पर प्रादेशिक सिनेमा में एक अर्थपूर्ण उपस्थिति दर्ज कराती है। लेखक ने एक प्रासंगिक पारिवारिक विषय को ईमानदारी से प्रस्तुत किया है, जो आज के बिखरते रिश्तों की नग्न सच्चाई को सामने लाती है और प्रत्येक सिनेमाप्रेमी के लिए कम से कम एक बार देखने योग्य कृति बन जाती है।