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‘लाइसेंस’

24 अप्रैल 2026 को सिनेमाघरों में प्रदर्शित हुई हरियाणवी फिल्म ‘लाइसेंस’ ने उस समय विशेष ध्यान आकर्षित किया, जब लगभग तीन वर्षों के अंतराल के बाद कोई हरियाणवी फिल्म बड़े पर्दे पर दर्शकों के सामने आई। प्रसिद्ध हरियाणवी गायक और कलाकार मासूम शर्मा की यह पहली मुख्य भूमिका वाली फिल्म थी। फिल्म का निर्माण शकुंतलम फिल्म्स और मासूम शर्मा ने किया, जबकि निर्देशन की जिम्मेदारी रणजीत चौहान ने संभाली। फिल्म के छायांकन निर्देशक विकास के. शर्मा रहे और कास्टिंग निर्देशक शमशेर सिंह थे। इस फिल्म को केवल एक नई रिलीज के रूप में नहीं, बल्कि हरियाणवी सिनेमा में दोबारा थिएटर संस्कृति को मजबूत करने की दिशा में किए गए एक महत्वपूर्ण प्रयोग के रूप में भी देखा जा सकता है।

‘लाइसेंस’ की सबसे बड़ी विशेषताओं में इसकी कास्टिंग और कलाकारों का अभिनय रहा। फिल्म की रीढ़ मासूम शर्मा साबित होते हैं। उनके संवाद बोलने का ढंग और स्वाभाविक हरियाणवी उच्चारण दर्शकों को बार-बार कहानी से जोड़ता है। ग्रामीण परिवेश से निकले उनके किरदार में एक सहजता दिखाई देती है, जो फिल्म की प्रामाणिकता को मजबूत करती है। यशपाल शर्मा का अभिनय फिल्म के सबसे मजबूत पक्षों में से एक है। उन्होंने अपने किरदार को बेहद संतुलित और प्रभावशाली ढंग से निभाया है। उनके अभिनय को देखने के बाद यह स्पष्ट महसूस होता है कि रंगमंच के लंबे अनुभव ने उनकी प्रस्तुति को कितना सधा हुआ बनाया है। विशेष रूप से हरियाणवी भाषा बोलने का उनका स्वाभाविक अंदाज उनके किरदार को विश्वसनीय बनाता है।

अभिमन्यु यादव धर्मा के किरदार में प्रभावशाली दिखाई देते हैं। ‘मलाल’ में रणजीत चौहान ने उनसे जिस गहराई और तीव्रता के साथ अभिनय करवाया था, उसकी संभावनाएँ ‘लाइसेंस’ में भी दिखाई देती हैं। हालांकि, यदि धर्मा के चरित्र की परतों को और विस्तार दिया जाता, तो यह भूमिका और अधिक मजबूत तथा यादगार बन सकती थी। इसके बावजूद अभिमन्यु यादव सीमित अवसर में भी अपनी छाप छोड़ने में सफल रहते हैं। रमन नासा की अभिनय क्षमता और पंजाबी भाषा पर उनकी पकड़ स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। मानवी भारद्वाज का अभिनय भी प्रभावशाली है और उनके प्रदर्शन में निरंतरता बनी रहती है। सतीश जॉर्जी कश्यप हमेशा की तरह इस फिल्म में भी दर्शकों पर अपनी पकड़ बनाए रखते हैं।

मनीष कुमार अपने किरदार में अच्छा काम करते हैं, हालांकि उनके संवादों में पंजाबी भाषा का प्रयोग कुछ स्थानों पर पूरी तरह स्वाभाविक नहीं लगता। यदि उनके पात्र के लिए बागपत या बड़ौत क्षेत्र की स्थानीय भाषा का प्रयोग किया जाता, तो किरदार का क्षेत्रीय स्वरूप और अधिक प्रामाणिक हो सकता था। राखी लोचब मासूम शर्मा की पत्नी की भूमिका में दिखाई देती हैं। फिल्म के आरंभिक हिस्से में उनका अभिनय कुछ स्थानों पर कमजोर प्रतीत होता है, लेकिन कहानी के आगे बढ़ने के साथ वह दर्शकों से जुड़ने में सफल होती हैं। ‘धाकड़ छोरियां’ के बाद इसे उनके बेहतर प्रदर्शनों में गिना जा सकता है। विशेष रूप से चरम दृश्य में उनका आत्महत्या का प्रसंग अत्यंत भावुक कर देने वाला है। उस दृश्य में उन्होंने जिस पीड़ा और संवेदना को व्यक्त किया है, वह दर्शकों को भीतर तक प्रभावित करती है और यहीं उनका किरदार पूरी तरह जीवंत हो उठता है।

निशा शर्मा का विशेष कार्यबल अर्थात् एसटीएफ का किरदार भी प्रभावशाली ढंग से सामने आता है। उन्होंने भूमिका में आवश्यक कठोरता, स्थिरता और संयम बनाए रखा, जिससे उनका पात्र विश्वसनीय प्रतीत होता है। एसटीएफ दल में देवेन ने भी अपने हिस्से की भूमिका को उचित ढंग से निभाया। आकाश चावरिया अपने किरदार में भोजपुरी भाषा के प्रभाव को सहजता से प्रस्तुत करते हैं, जबकि सुरेन सरकार का प्रदर्शन भी संतोषजनक रहता है। राजकुमार धनकड़ की उपस्थिति फिल्म की उल्लेखनीय खूबियों में से एक है। जैसे ही वह पर्दे पर आते हैं, दर्शकों का ध्यान स्वतः उनकी ओर आकर्षित होता है। उनके अभिनय में आत्मविश्वास और सहजता दिखाई देती है।

फिल्म में सपना चौधरी और के.डी. की लगभग पाँच मिनट की गीत प्रस्तुति भी है, जिसने फिल्म में ऊर्जा और ताजगी का संचार किया। दर्शकों की सकारात्मक प्रतिक्रिया इस छोटे से प्रदर्शन में भी दिखाई देती है। कुल मिलाकर, रणजीत चौहान की कास्टिंग संतुलित और नियंत्रित दिखाई देती है। कोई भी पात्र अनावश्यक रूप से कहानी की सीमा से बाहर जाता हुआ महसूस नहीं होता और यही बात फिल्म को जमीन से जुड़ा हुआ स्वर देती है।

तकनीकी पक्ष, छायांकन और संगीत

‘लाइसेंस’ के तकनीकी पक्ष की बात करें तो विकास के. शर्मा का छायांकन विशेष रूप से उल्लेखनीय है। उनके द्वारा तैयार किए गए दृश्य-संयोजन और फ्रेम फिल्म के ग्रामीण परिवेश को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करते हैं। दृश्यों की संरचना में सिनेमाई दृष्टि दिखाई देती है और यही फिल्म के दृश्य पक्ष को मजबूत बनाती है। नीरज रोहिला ने ध्वनि अभिकल्पना का कार्य संभाला, जबकि पृष्ठभूमि संगीत डीपॉन (Dpon Dash) ने तैयार किया। ध्वनि के स्तर पर फिल्म कुछ स्थानों पर अपेक्षित प्रभाव पैदा नहीं कर पाती, लेकिन संवादों और अन्य तकनीकी पक्षों के सहयोग से यह कमी काफी हद तक संभल जाती है।

‘लाइसेंस’ का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष उसका सिनेमाघरों तक पहुँचना रहा। लगभग तीन वर्षों के बाद किसी हरियाणवी फिल्म का बड़े पर्दे पर प्रदर्शित होना अपने आप में हरियाणवी फिल्म उद्योग के लिए उत्साहजनक घटना थी। ऐसे समय में, जब दर्शकों की देखने की आदतें तेजी से डिजिटल और ओटीटी माध्यमों की ओर बढ़ रही थीं, निर्माता और पूरी टीम द्वारा सिनेमाघरों के लिए फिल्म तैयार करना एक साहसिक निर्णय था। यह प्रयास इस दृष्टि से भी महत्वपूर्ण था कि हरियाणवी सिनेमा के लिए थिएटर संस्कृति को फिर से मजबूत किया जाए।

व्यावसायिक स्तर पर फिल्म ने शुरुआत से ही दर्शकों का ध्यान खींचा। अपने शुरुआती दो-तीन दिनों में फिल्म ने ₹7 करोड़ से अधिक का कारोबार किया और उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार इसका कुल जीवनकाल कारोबार ₹15 करोड़ के पार पहुँच गया। इन आँकड़ों ने इसे हरियाणवी सिनेमा की सबसे सफल फिल्मों की सूची में महत्वपूर्ण स्थान दिलाया। हालांकि किसी क्षेत्रीय फिल्म की सफलता को केवल बॉक्स ऑफिस के आँकड़ों से मापना पर्याप्त नहीं है, फिर भी ‘लाइसेंस’ के मामले में यह आँकड़ा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि फिल्म ने हरियाणवी दर्शकों को फिर से सिनेमाघरों की ओर आकर्षित करने में सफलता प्राप्त की। एक फिल्म समीक्षक के दृष्टिकोण से ‘लाइसेंस’ को हरियाणवी सिनेमा में एक महत्वपूर्ण प्रयोग और वापसी के संकेत के रूप में देखा जा सकता है। फिल्म में कुछ कमियाँ हैं, विशेष रूप से ध्वनि और कुछ किरदारों के विस्तार के स्तर पर, लेकिन इसके बावजूद इसका प्रयास महत्वपूर्ण है। मासूम शर्मा की स्वाभाविक हरियाणवी संवाद-अदायगी, यशपाल शर्मा का सधा हुआ अभिनय, अभिमन्यु यादव की प्रभावी उपस्थिति, राखी लोचब का भावनात्मक चरम दृश्य और विकास के. शर्मा का मजबूत छायांकन फिल्म को उसकी अपनी पहचान देते हैं।

फिल्म ‘लाइसेंस’ की शूटिंग लगभग 22 दिनों में पूरी की गई थी। फिल्म के लिए RED कैमरा का उपयोग किया गया, जिसने इसके दृश्यों को बेहतर सिनेमाई रूप देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। फिल्म की शूटिंग हरियाणा और चंडीगढ़ के अलग-अलग वास्तविक स्थानों पर की गई। प्रमुख शूटिंग स्थलों में जींद के पिंडारा, रोहतक के भालोट और चंडीगढ़ शामिल रहे। वास्तविक लोकेशनों पर फिल्मांकन किए जाने से फिल्म के ग्रामीण परिवेश और कहानी को एक स्वाभाविक तथा जमीन से जुड़ा रूप मिला। विशेष रूप से पिंडारा और भालोट जैसे स्थानों ने हरियाणवी परिवेश को पर्दे पर वास्तविक रूप में प्रस्तुत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि ‘लाइसेंस’ ने यह साबित किया कि हरियाणवी दर्शक आज भी अपनी भाषा और अपने परिवेश की कहानी को बड़े पर्दे पर देखने के लिए तैयार है, बशर्ते फिल्म उनके साथ भावनात्मक और सांस्कृतिक रूप से जुड़ सके। तीन वर्षों के अंतराल के बाद थिएटर में लौटना और फिर व्यावसायिक सफलता प्राप्त करना हरियाणवी फिल्म उद्योग के लिए केवल एक फिल्म की उपलब्धि नहीं, बल्कि उस उद्योग में नए आत्मविश्वास का संकेत भी है।

इस अर्थ में ‘लाइसेंस’ 2015–2025 के दशक के बाद उभरते हरियाणवी सिनेमा की उस नई दिशा का प्रतिनिधित्व करती है, जिसमें स्थानीय भाषा, लोकप्रिय कलाकार, आधुनिक तकनीक, संगीत और व्यावसायिक दृष्टिकोण को एक साथ लेकर आगे बढ़ने का प्रयास दिखाई देता है। यह फिल्म आने वाले समय के लिए यह सवाल भी छोड़ती है कि यदि हरियाणवी सिनेमा अपनी कहानियों और तकनीकी गुणवत्ता पर लगातार काम करता रहा, तो क्या वह क्षेत्रीय दर्शकों से आगे निकलकर राष्ट्रीय स्तर पर भी अपनी स्थायी पहचान बना सकता है।