‘डीजे वाले बाबू’
हरियाणवी सिनेमा के नए दौर में ‘डीजे वाले बाबू’ ऐसी फिल्म के रूप में सामने आती है, जिसमें गाँव की मिट्टी, प्रेम, संघर्ष, अपराध, राजनीति और मनोरंजन को एक साथ पिरोने का प्रयास किया गया है। फिल्म का निर्देशन मंदीप बेनीपाल ने किया, जबकि निर्देशन टीम में गौरव के. आर. बरगोता और आसिफ खान ने महत्वपूर्ण सहयोग दिया। फिल्म में मुख्य भूमिकाएँ गुलजार छनिवाला और माही गौर ने निभाईं। लगभग दो घंटे छब्बीस मिनट की यह फिल्म 14 अक्टूबर 2022 को सिनेमाघरों में प्रदर्शित हुई और बाद में 16 दिसंबर 2022 से चौपाल मंच पर दर्शकों के लिए उपलब्ध हुई।
फिल्म की कहानी शिवा नाम के एक ग्रामीण युवक के इर्द-गिर्द घूमती है। शिवा गाँव से शहर की ओर बढ़ने वाला एक डीजे संचालक है, जिसके जीवन में प्रेम की भी अपनी जगह है और अपने भविष्य को लेकर कई सपने भी हैं। लेकिन परिस्थितियाँ धीरे-धीरे उसे ऐसे मोड़ पर ले जाती हैं, जहाँ उसका जीवन प्रेम और सामान्य ग्रामीण जीवन से निकलकर संघर्ष, अपराध और राजनीति के जाल में उलझ जाता है। घटनाएँ तेजी से बदलती हैं और एक समय ऐसा आता है जब शिवा जेल पहुँच जाता है। जेल जाने के बाद उसके सामने धीरे-धीरे उन घटनाओं की असली तस्वीर सामने आने लगती है, जिनमें वह फँस चुका है। उसे एहसास होता है कि उसके साथ जो कुछ हुआ, वह केवल व्यक्तिगत परिस्थितियों का परिणाम नहीं था, बल्कि उसके पीछे राजनीतिक स्वार्थ और एक बड़ी साजिश भी काम कर रही थी। वह समझता है कि उसे एक राजनेता ने अपने हितों के लिए मोहरे की तरह इस्तेमाल किया है। यहीं से फिल्म प्रेम और व्यक्तिगत संघर्ष की कहानी से आगे बढ़कर अपराध, राजनीति, षड्यंत्र और आत्म-संघर्ष की कहानी बन जाती है।
फिल्म की कहानी में हरियाणा और पंजाब के ग्रामीण परिवेश की झलक दिखाई देती है। इसके निर्माण में वास्तविक स्थानों का उपयोग किया गया, जिससे कहानी को कृत्रिम परिवेश के बजाय जमीन से जुड़ा हुआ रूप देने का प्रयास किया गया। फिल्म की शूटिंग पंजाब के राजपुरा तथा हरियाणा के अंबाला, पंचकूला और कुरुक्षेत्र सहित विभिन्न स्थानों पर की गई। पूरी फिल्म का फिल्मांकन लगभग 38 दिनों में पूरा किया गया। सीमित समय में शूटिंग पूरी करने के लिए कलाकारों और तकनीकी दल ने लगातार मेहनत की। फिल्म के छायांकन की जिम्मेदारी विकास सिन्हा ने संभाली और दृश्यांकन के लिए ए.आर.आर.आई. एलेक्सा कैमरा प्रणाली का उपयोग किया गया। संपादन ओंकार भाखरी ने किया।
‘डीजे वाले बाबू’ के निर्माण की एक दिलचस्प बात इसकी कलाकार चयन प्रक्रिया भी रही। शुरुआत में निर्माताओं की योजना पंजाब के कलाकारों को लेकर फिल्म बनाने की थी, लेकिन बाद में यह विचार सामने आया कि कहानी के स्थानीय वातावरण को अधिक स्वाभाविक बनाने के लिए हरियाणा के कलाकारों को भी अवसर दिया जाना चाहिए। इसके बाद रोहतक, भिवानी और करनाल जैसे शहरों में कलाकारों के लिए ऑडिशन आयोजित किए गए। इन ऑडिशनों के माध्यम से हरियाणा के अलग-अलग क्षेत्रों से प्रतिभाओं को खोजा गया और उन्हें फिल्म का हिस्सा बनाया गया। यह प्रक्रिया इस बात का उदाहरण बनी कि क्षेत्रीय सिनेमा में स्थानीय कलाकारों को अवसर देकर कहानी और उसके परिवेश को अधिक विश्वसनीय बनाया जा सकता है।
फिल्म में गुलजार छनिवाला और माही गौर मुख्य भूमिकाओं में दिखाई दिए। इनके साथ आशीष दुग्गल, आतिश वशिष्ठ, आशीष नेहरा, बलविंदर बुलेट, हरजीत वालिया, जोगिंदर कुंडू, कुशिका गुप्ता, मुकेश तिवारी, सुमन सेन, उर्मिला कौशिक और वैभव मेहंदीरेटा सहित कई कलाकारों ने अभिनय किया। आशीष नेहरा ने सूरज की भूमिका निभाई, । इन कलाकारों के माध्यम से फिल्म ने ग्रामीण समाज के अलग-अलग चरित्रों और उनके आपसी संबंधों को सामने लाने का प्रयास किया।
फिल्म की कहानी और लेखन की जिम्मेदारी गौरव के. आर. बरगोता और राजू वर्मा ने संभाली। निर्देशन में मंदीप बेनीपाल के साथ गौरव के. आर. बरगोता और आसिफ खान का सहयोग रहा। छायांकन विकास सिन्हा ने किया और संपादन ओंकार भाखरी ने संभाला। ध्वनि से जुड़े कार्यों में हिमांशु कुमार और डीजे नरेंद्र कुमार का योगदान रहा। तकनीकी दल के विभिन्न विभागों ने मिलकर फिल्म को अंतिम रूप दिया और ग्रामीण परिवेश को पर्दे पर जीवंत करने का प्रयास किया।
‘डीजे वाले बाबू’ को केवल एक प्रेम या मनोरंजन प्रधान फिल्म के रूप में देखना इसके विषय को सीमित करना होगा। फिल्म के केंद्र में शिवा का संघर्ष है, लेकिन उसके माध्यम से यह दिखाने का प्रयास किया गया है कि किस प्रकार एक सामान्य ग्रामीण युवक परिस्थितियों, अपराध और राजनीति के ऐसे जाल में फँस सकता है, जिसका निर्माण उसके आसपास मौजूद शक्तियाँ करती हैं। प्रेम, पारिवारिक और सामाजिक परिवेश के साथ राजनीतिक षड्यंत्र को जोड़ना फिल्म को एक अलग कथा-विस्तार देता है।
एक फिल्म समीक्षक के दृष्टिकोण से देखें तो ‘डीजे वाले बाबू’ की सबसे उल्लेखनीय विशेषता इसका स्थानीय परिवेश और स्थानीय प्रतिभाओं को महत्व देना है। हरियाणा के अलग-अलग शहरों में किए गए ऑडिशन और वास्तविक लोकेशनों पर किया गया फिल्मांकन इसे क्षेत्रीय सिनेमा की उस प्रवृत्ति से जोड़ता है, जिसमें कहानी को उसकी अपनी मिट्टी से जोड़कर प्रस्तुत करने का प्रयास किया जा रहा था। हालांकि फिल्म की कथा में प्रेम, अपराध, राजनीति और मनोरंजन जैसे कई तत्व एक साथ आते हैं, फिर भी इसका मूल आकर्षण शिवा की यात्रा और उसके सामने आने वाली परिस्थितियों में दिखाई देता है।
‘डीजे वाले बाबू’ हरियाणवी सिनेमा के उस दौर की प्रतिनिधि फिल्मों में गिनी जा सकती है, जब क्षेत्रीय फिल्मकार अपनी कहानियों को बड़े पर्दे के साथ-साथ नए डिजिटल माध्यमों तक ले जाने का प्रयास कर रहे थे। सिनेमाघरों में प्रदर्शन के बाद चौपाल जैसे डिजिटल मंच पर पहुँचना भी इसी बदलते दौर का संकेत था। स्थानीय कलाकारों, हरियाणा-पंजाब के वास्तविक परिवेश, आधुनिक छायांकन तकनीक और ग्रामीण जीवन से जुड़ी कहानी के माध्यम से फिल्म ने हरियाणवी सिनेमा के बदलते स्वरूप में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई।