'छोरियां छोरों से कम नहीं होती'
17 मई 2019 को रिलीज हुई ‘छोरियां छोरों से कम नहीं होती’ एक हरियाणवी-हिंदी ड्रामा फिल्म है, जो हरियाणा की सामाजिक पृष्ठभूमि में पिता और बेटी के रिश्ते तथा बेटियों के प्रति समाज की पारंपरिक सोच को केंद्र में रखती है। राजेश अमरलाल बब्बर के निर्देशन में बनी इस फिल्म का निर्माण Zee Studios और The Satish Kaushik Entertainment के बैनर तले किया गया। लगभग 1 घंटा 54 मिनट की यह फिल्म अपने विषय के स्तर पर उस सोच को चुनौती देने का प्रयास करती है, जिसमें बेटे को परिवार का भविष्य और बेटी को केवल परिवार की जिम्मेदारी समझा जाता रहा है।
फिल्म की कहानी जयदेव चौधरी और उसकी बेटी बिनीता के रिश्ते से शुरू होती है। जयदेव को इस बात का मलाल है कि उसके घर बेटा नहीं है। दूसरी ओर उसकी बेटी बिनीता का सपना IPS अधिकारी बनने का है। लेकिन उसका यह सपना केवल व्यक्तिगत लक्ष्य नहीं बनता, बल्कि धीरे-धीरे परिवार और समाज की उस मानसिकता से टकराने लगता है जो लड़कियों की महत्वाकांक्षाओं को सीमित करने की कोशिश करती है। बिनीता को अपने लक्ष्य की राह में परिवार, समाज और रूढ़िवादी सोच का सामना करना पड़ता है, लेकिन वह पीछे हटने के बजाय संघर्ष करती है और अपने सपने को पूरा करने की दिशा में आगे बढ़ती है।
फिल्म की कहानी का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यही है कि बिनीता केवल अपने पिता को यह साबित नहीं करना चाहती कि वह किसी बेटे से कम नहीं है, बल्कि वह उस सामाजिक सोच को चुनौती देती है जिसमें बेटियों की क्षमता को उनके लिंग के आधार पर कमतर आँका जाता है। फिल्म धीरे-धीरे पिता के दृष्टिकोण में भी बदलाव लाती है और दर्शक को यह सोचने के लिए मजबूर करती है कि संतान की पहचान बेटा या बेटी होने से नहीं, बल्कि उसके व्यक्तित्व, मेहनत और उपलब्धियों से होनी चाहिए।
फिल्म में सतीश कौशिक ने जयदेव चौधरी की भूमिका निभाई। उनके साथ रश्मि सिंह सोमवंशी ने बिनीता चौधरी का किरदार निभाया, जबकि अन्निरुद्ध दवे विकास की भूमिका में दिखाई दिए। फिल्म में मोहन कांत, बलदेव सिंह, प्रकाश घई, गौतम सौगत, कुलदीप सिंह, संजय रामफल, जगबीर राठी, विश्व दीपक त्रिखा और जानवी सांगवान सहित अन्य कलाकारों ने भी महत्वपूर्ण भूमिकाएँ निभाईं। विशेष रूप से सतीश कौशिक जैसे अनुभवी कलाकार की उपस्थिति ने पिता के चरित्र को भावनात्मक आधार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
फिल्म का विषय भले ही गंभीर सामाजिक प्रश्न उठाता है, लेकिन इसकी प्रस्तुति पूरी तरह उपदेशात्मक नहीं रखी गई। हरियाणा के ग्रामीण और सामाजिक परिवेश के बीच कहानी आगे बढ़ती है और इसी वातावरण में बेटी के संघर्ष को रखा गया है। यही स्थानीय परिवेश फिल्म को हरियाणवी दर्शकों के करीब लाने का प्रयास करता है।
गीत-संगीत में हरियाणवी रंग और आधुनिकता
‘छोरियां छोरों से कम नहीं होती’ का संगीत फिल्म की कहानी के साथ-साथ उसके सांस्कृतिक वातावरण को भी आगे बढ़ाता है। फिल्म के संगीत में राहुल जैन, काशी, रिचर्ड, शांतनु दत्ता और म्यूजिक नशा/असलम काईफ जैसे संगीतकारों का योगदान रहा। फिल्म के गीतों में हरियाणवी लोक रंग के साथ आधुनिक संगीत का मिश्रण देखने को मिलता है। ‘रे ताऊ’ गीत के बोल रश्मि बिरया ने लिखे, जिसे विधि देशवाल और सुप्रिया पाठक ने गाया और इसका संगीत शान साय ने तैयार किया। इसी तरह ‘बन्ने रे जबसे’ के गीतकार भी रश्मि बिरया रहे, जबकि इसे राहुल जैन और सोनिया शर्मा ने आवाज दी और संगीत राहुल जैन ने दिया।
‘गुलाल-ए-इश्क़’ के बोल नौशाद सदर खान ने लिखे, जिसे राहुल जैन ने गाया और संगीत भी उन्होंने ही तैयार किया। ‘बेटी हूं मैं तेरी’ गीत के बोल रश्मि बिरया के थे, जिसे राहुल जैन और सोहम नायक ने गाया और संगीत राहुल जैन का रहा। यह गीत फिल्म के केंद्रीय भाव—बेटी और पिता के रिश्ते—से सीधे जुड़ता है।
फिल्म में ‘इंस्टाग्राम’ गीत भी शामिल रहा, जिसके गीतकार रश्मि बिरया हैं और इसे गजेंद्र फोगाट, विकास कुमार तथा हसन नाजिम ने गाया। इसका संगीत म्यूजिक नशा/असलम काईफ ने तैयार किया। वहीं ‘छोरी पड़ रही से’ के बोल डॉ. सागर ने लिखे और इसे विकास कुमार तथा कविता सांगवान ने गाया। संगीत कबीर और म्यूजिक नशा का रहा। इस तरह फिल्म का संगीत एक ओर हरियाणवी लोक-संवेदना को बनाए रखता है, वहीं दूसरी ओर आधुनिक धुनों और समकालीन गायकी के माध्यम से नई पीढ़ी के दर्शकों तक पहुँचने का प्रयास करता है।
फिल्म की अवधि लगभग 1 घंटा 54 मिनट रही और इसे मुख्य रूप से हरियाणा, दिल्ली-NCR और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के चुनिंदा मल्टीप्लेक्स और सिंगल-स्क्रीन सिनेमाघरों में प्रदर्शित किया गया। लेकिन फिल्म को व्यापक स्तर पर सिनेमाघरों में प्रदर्शन का अवसर नहीं मिल सका। सीमित थियेट्रिकल रिलीज के कारण इसका दर्शक वर्ग भी सीमित रहा। बाद में फिल्म को डिजिटल माध्यम पर दर्शकों तक पहुँचाने के लिए ZEE5 पर उपलब्ध कराया गया।
राष्ट्रीय सम्मान और व्यावसायिक यात्रा
‘छोरियां छोरों से कम नहीं होती’ का सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव उसका 67 वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों में सर्वश्रेष्ठ हरियाणवी फिल्म के रूप में सम्मानित होना रहा। यह उपलब्धि उस दौर में हरियाणवी सिनेमा के लिए महत्वपूर्ण थी, क्योंकि इससे एक बार फिर यह साबित हुआ कि हरियाणवी परिवेश में कही गई सामाजिक कहानी राष्ट्रीय स्तर के मंच पर अपनी पहचान बना सकती है।
एक फिल्म समीक्षक के रूप में देखा जाए तो फिल्म की सबसे बड़ी ताकत उसका विषय और संदेश है। बेटियों की शिक्षा, उनके सपनों और परिवार में उनके महत्व को लेकर फिल्म एक जरूरी सवाल उठाती है। विशेष रूप से हरियाणवी सामाजिक परिवेश में पिता और बेटी के रिश्ते को इस दृष्टि से देखना कि बेटी भी परिवार का भविष्य हो सकती है, फिल्म को सामाजिक रूप से प्रासंगिक बनाता है। सतीश कौशिक का अभिनय फिल्म के भावनात्मक पक्ष को मजबूती देता है और बिनीता का संघर्ष कहानी को आगे बढ़ाता है।
हालांकि, फिल्म की अपनी सीमाएँ भी हैं। कहानी का संदेश प्रभावी होने के बावजूद इसकी सिनेमाई प्रस्तुति हर जगह उतनी मजबूत नहीं दिखाई देती, जितनी इसके विषय में संभावनाएँ थीं। कुछ स्थानों पर कहानी अपेक्षाकृत परिचित सामाजिक-ड्रामा के ढाँचे में चली जाती है। फिर भी फिल्म की मूल भावना स्पष्ट रहती है—बेटियों को अवसर दिया जाए और उनकी क्षमता को केवल इसलिए कम न आँका जाए कि वे बेटियाँ हैं। व्यावसायिक दृष्टि से फिल्म को वह सफलता नहीं मिल सकी जिसकी उम्मीद एक राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त फिल्म से की जा सकती थी। सीमित सिनेमाघर रिलीज के कारण फिल्म बड़े दर्शक वर्ग तक नहीं पहुँच पाई और हरियाणा के बॉक्स ऑफिस पर भी लंबे समय तक टिक नहीं सकी। यही स्थिति हरियाणवी सिनेमा की उस समय की एक बड़ी चुनौती को सामने लाती है—अच्छी कहानी और राष्ट्रीय सम्मान मिलने के बावजूद फिल्मों के लिए पर्याप्त स्क्रीन, मजबूत प्रचार और व्यापक वितरण व्यवस्था का अभाव उनकी व्यावसायिक क्षमता को सीमित कर देता था। फिर भी ‘छोरियां छोरों से कम नहीं होती’ को केवल उसके बॉक्स ऑफिस प्रदर्शन से आँकना उचित नहीं होगा। फिल्म ने उस समय एक ऐसे विषय को केंद्र में रखा, जिसकी सामाजिक जरूरत आज भी बनी हुई है। एक बेटी का सपना, पिता की सोच में बदलाव और समाज की रूढ़ियों के विरुद्ध उसका संघर्ष—ये तीनों बातें फिल्म को हरियाणवी सिनेमा के उस दौर से जोड़ती हैं, जब क्षेत्रीय फिल्मों में केवल मनोरंजन से आगे बढ़कर सामाजिक विषयों को गंभीरता से उठाने का प्रयास हो रहा था।
इस फिल्म की राष्ट्रीय उपलब्धि यह बताती है कि हरियाणवी सिनेमा लगातार अपनी विषय-वस्तु का विस्तार कर रहा था। ‘पगड़ी: द ऑनर’, ‘सतरंगी’ और अब ‘छोरियां छोरों से कम नहीं होती’ जैसी फिल्मों के माध्यम से राष्ट्रीय स्तर पर हरियाणवी फिल्मों की पहचान बनने लगी थी। भले ही इन फिल्मों की व्यावसायिक यात्रा हमेशा उतनी मजबूत नहीं रही, लेकिन इनकी विषय-वस्तु और राष्ट्रीय सम्मान ने हरियाणवी सिनेमा के लिए एक नए आत्मविश्वास की नींव जरूर रखी।