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सतरंगी

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‘पगड़ी: द ऑनर’ के बाद हरियाणवी सिनेमा को राष्ट्रीय स्तर पर एक और बड़ी पहचान दिलाने वाली फिल्मों में ‘सतरंगी’ का नाम महत्वपूर्ण रूप से सामने आता है। 63वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों में सम्मान प्राप्त करने वाली इस फिल्म ने यह साबित किया कि हरियाणवी सिनेमा की ताकत केवल ग्रामीण परिवेश और लोकजीवन को पर्दे पर दिखाने में नहीं, बल्कि रिश्तों की उन संवेदनशील कहानियों को कहने में भी है, जिनसे समाज का हर वर्ग अपने स्तर पर जुड़ सकता है।

संदीप शर्मा के निर्देशन में बनी ‘सतरंगी’ हरियाणवी सिनेमा के उस दौर की महत्वपूर्ण फिल्मों में शामिल है, जिसने पारिवारिक रिश्तों और सामाजिक संवेदनाओं को केंद्र में रखकर एक अलग तरह की कहानी कहने का प्रयास किया।

हंस विद्या मूवीज के बैनर तले बनी इस फिल्म की निर्माता पूनम देशवाल थीं। फिल्म की कहानी स्वयं निर्देशक ने लिखी, जबकि स्क्रीनप्ले और संवाद के लिए महिपाल सैनी का सहयोग लिया गया। फिल्म का केंद्रीय विचार एक पिता और बेटी के रिश्ते के इर्द-गिर्द बुना गया है। कहानी उस भावनात्मक प्रश्न को सामने रखती है, जिसके बारे में समाज में बहुत कम बात होती है—जब बेटी अपने पिता का घर छोड़कर विदा होने वाली हो, तो उसके बाद उस पिता का क्या होगा जो अकेला रह जाएगा?

फिल्म में बेटी अपने विवाह के समय इसी चिंता से गुजरती है। उसे पता चलता है कि उसका भाई अपने पिता के साथ विश्वासघात कर चुका है। ऐसे में वह अपने भविष्य से अधिक अपने पिता के वर्तमान और आने वाले जीवन को महत्व देती है। वह अपनी शादी को कुछ समय के लिए टाल देती है और पिता के साथ रहने का निर्णय करती है। लेकिन उसका उद्देश्य केवल उनके साथ रहना नहीं है। वह चाहती है कि उसके विवाह के बाद भी उसका पिता अकेला न रहे। इसी सोच के साथ वह अपने पिता के लिए जीवन का एक नया साथी तलाशने और उनकी शादी करवाने का निर्णय लेती है।

यही विचार ‘सतरंगी’ को सामान्य पारिवारिक फिल्म से अलग बनाता है। भारतीय समाज में अक्सर बेटी को पिता की जिम्मेदारी के रूप में देखा जाता है, लेकिन यह फिल्म उस दृष्टिकोण को उलट देती है। यहाँ बेटी स्वयं अपने पिता की चिंता करती है, उनके अकेलेपन को समझती है और उनकी जिंदगी को दोबारा संवारने का प्रयास करती है।

फिल्म के पीछे की प्रेरणा भी सामाजिक अनुभवों से जुड़ी रही। फिल्मकार ने ऐसे कई वास्तविक प्रसंग देखे थे, जहाँ पत्नी की मृत्यु या तलाक के बाद अकेले रह गए पुरुषों को समाज अलग नजर से देखने लगता है। कई बार परिवार के भीतर रिश्तों में अविश्वास पैदा हो जाता है और बुजुर्ग पुरुषों को अनेक सामाजिक और पारिवारिक परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है। इन्हीं अनुभवों ने फिल्मकार को यह सोचने के लिए प्रेरित किया कि इस विषय पर एक ऐसी कहानी कही जाए, जो दर्शक को केवल भावुक न करे, बल्कि उसे सोचने के लिए भी मजबूर करे।

‘सतरंगी’ का मूल संदेश इसी मानवीय संवेदना में छिपा है कि बेटी केवल विदा होने वाली संतान नहीं, बल्कि अपने माता-पिता के जीवन की जिम्मेदार साथी भी हो सकती है। फिल्म पिता-पुत्री के रिश्ते को एक नए दृष्टिकोण से देखने का अवसर देती है और यह सवाल उठाती है कि माता-पिता की भावनात्मक जरूरतों को समझना केवल बेटों की जिम्मेदारी क्यों माना जाए?

फिल्म की शूटिंग जींद, कालवा गाँव और करनाल में की गई। शूटिंग केवल 16 दिनों में पूरी की गई, लेकिन सीमित समय के बावजूद फिल्मकार ने लोकेशन और तकनीकी गुणवत्ता के साथ समझौता न करने का प्रयास किया। ग्रामीण परिवेश को कहानी के अनुरूप वास्तविक रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश फिल्म की दृश्यात्मक पहचान का हिस्सा रही।

फिल्म की शूटिंग से जुड़ा कालवा गाँव का एक प्रसंग अपने आप में दिलचस्प है। एक शादी के दृश्य के लिए पूरे दिन आर्ट डिपार्टमेंट ने सेट तैयार किया था। रात में शूटिंग होनी थी, लेकिन जैसे ही शूटिंग शुरू होने वाली थी, गाँव के कई लोग वहाँ इकट्ठा हो गए और उन्होंने सेट को तोड़ना शुरू कर दिया। फिल्मकार के लिए यह स्थिति अचानक और चौंकाने वाली थी। बाद में बातचीत से पता चला कि गाँव के लोगों को गलतफहमी हो गई थी कि फिल्म में उसी गाँव के एक लड़के और लड़की की शादी दिखाई जा रही है। हरियाणा के सामाजिक परिवेश में इसे लेकर उनकी आपत्ति थी। फिल्मकार ने उन्हें समझाया कि कहानी में लड़का रोहतक का और लड़की जींद की है तथा एक ही गाँव में शूटिंग केवल लोकेशन की सुविधा के कारण की जा रही है। वास्तविक कहानी में दोनों अलग-अलग स्थानों से हैं।

समझाने के बाद गाँव वालों को अपनी गलती का एहसास हुआ और उन्होंने स्वयं यह पूछना शुरू किया कि जो नुकसान हुआ है, उसे किस तरह ठीक किया जाए। यह प्रसंग फिल्म की शूटिंग से जुड़ी एक घटना भर नहीं था, बल्कि हरियाणा के ग्रामीण समाज की संवेदनशीलता, सामाजिक सोच और अपने परिवेश के प्रति जुड़ाव को भी सामने लाता है। फिल्मकार के लिए यह अनुभव लंबे समय तक याद रहने वाला रहा।

‘सतरंगी’ की कास्टिंग भी अपने आप में रोचक रही। फिल्मकार के अनुसार कुछ पात्र पहले से ही उनके मन में थे, लेकिन माँ के किरदार के लिए उपयुक्त कलाकार की तलाश जींद में जाकर पूरी हुई। एक मित्र के सुझाव पर गीता अग्रवाल का नाम सामने आया और मुलाकात के बाद उन्हें इस भूमिका के लिए उपयुक्त माना गया। फिल्म में यशपाल शर्मा ने पिता की भूमिका निभाई। उनके बेटे के किरदार के लिए भी कास्टिंग में उनका सुझाव महत्वपूर्ण रहा। फिल्म की एक विशेष बात यह रही कि लगभग 90 प्रतिशत कलाकार नए कलाकार थे। इन कलाकारों के लिए कैमरे के सामने काम करना पहली बार का अनुभव था, लेकिन उन्होंने अपने किरदारों को प्रभावी ढंग से निभाने का प्रयास किया। फिल्म में 84 वर्ष की एक बुजुर्ग महिला को दादी के किरदार में शामिल करना भी फिल्म की कास्टिंग का विशेष हिस्सा रहा। इस भूमिका के लिए फिल्मकार ने अपनी नानी को चुना। इससे फिल्म के पारिवारिक वातावरण में एक स्वाभाविकता आई और वास्तविक रिश्तों की गर्माहट भी दिखाई दी।

कलाकारों की बात करें तो यशपाल शर्मा, नर्गिस नंदल, सागर सैनी, नवीन ओहल्यान और महावीर गुढ़ू सहित कलाकारों ने फिल्म में महत्वपूर्ण भूमिकाएँ निभाईं। सचिन शोकीन ने कास्टिंग की जिम्मेदारी संभाली। नए कलाकारों और अनुभवी कलाकारों का यह संयोजन फिल्म के लिए एक अलग अनुभव लेकर आया।

फिल्म के संगीत पक्ष में रोहित शर्मा का योगदान रहा, जबकि गीतों के बोल कृष्ण भारद्वाज ने लिखे। फिल्म से जुड़े गीतों में ‘तू चाँद मेरा’, ‘हैप्पी बर्थडे टू यू पापा जी’, ‘मेरे नाम की रिंगटोन’ और ‘जीणा दुबहर होज्या मानस का’ जैसे गीत शामिल रहे। इन गीतों ने कहानी के भावनात्मक वातावरण को सहारा देने का प्रयास किया और फिल्म के पारिवारिक स्वरूप को बनाए रखा। एक फिल्म समीक्षक के दृष्टिकोण से देखें तो ‘सतरंगी’ की सबसे बड़ी ताकत उसका विषय है। पिता और बेटी के रिश्ते को केंद्र में रखकर कहानी कहना और बेटी को पिता के भविष्य की चिंता करते हुए दिखाना एक संवेदनशील और अपेक्षाकृत कम देखे जाने वाला विचार है। फिल्म में भावनात्मक क्षण हैं और इसका उद्देश्य स्पष्ट रूप से दर्शक को रिश्तों के दूसरे पहलू पर सोचने के लिए प्रेरित करना है।

फिल्म की कमजोरी इसके विपणन और दर्शकों तक पहुँच में दिखाई देती है। कहानी में भावनात्मक क्षमता होने के बावजूद फिल्म व्यापक दर्शक वर्ग तक उस स्तर पर नहीं पहुँच सकी, जिसकी उम्मीद एक राष्ट्रीय स्तर पर सम्मान प्राप्त करने वाली फिल्म से की जा सकती थी। व्यावसायिक दृष्टि से भी फिल्म अपेक्षित सफलता हासिल नहीं कर पाई। यही वह बिंदु है जहाँ हरियाणवी सिनेमा की एक पुरानी समस्या फिर दिखाई देती है—अच्छी कहानी और पुरस्कारों से आगे बढ़कर किसी फिल्म को दर्शकों तक पहुँचाने के लिए मजबूत वितरण और प्रचार व्यवस्था भी उतनी ही आवश्यक है। फिर भी ‘सतरंगी’ की उपलब्धि को केवल बॉक्स ऑफिस के आधार पर नहीं देखा जा सकता। राष्ट्रीय स्तर पर सम्मान मिलना इस बात का प्रमाण था कि हरियाणवी भाषा में कही गई एक पारिवारिक और सामाजिक कहानी भी देश के सबसे प्रतिष्ठित फिल्म पुरस्कारों तक पहुँच सकती है।

फिल्म को सिनेमाघरों में रिलीज किया गया, लेकिन इसके प्रदर्शन के लिए पर्याप्त स्क्रीन उपलब्ध नहीं हो सकीं। शुरुआत में फिल्म को 36 स्क्रीन मिलने की बात कही गई थी, लेकिन अंतिम रूप से इसे केवल 19 स्क्रीन ही मिल पाईं। सीमित स्क्रीन के कारण फिल्म की दर्शकों तक पहुँच प्रभावित हुई। यह स्थिति उस दौर के हरियाणवी सिनेमा की एक बड़ी चुनौती को भी सामने लाती है—फिल्म बन जाने के बाद उसे पर्याप्त सिनेमाघरों और दर्शकों तक पहुँचाना भी उतना ही महत्वपूर्ण था। ‘सतरंगी’ जैसे विषयपरक और राष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित फिल्म के लिए सीमित स्क्रीन मिलना उसकी व्यावसायिक संभावनाओं को प्रभावित करने वाला एक महत्वपूर्ण कारण माना जा सकता है।

हरियाणा सरकार की ओर से फिल्म को ₹10 लाख की सहायता मिलने का उल्लेख भी इस दौर में राज्य सरकार द्वारा हरियाणवी फिल्मों को प्रोत्साहित करने की दिशा में उठाए जा रहे कदमों को दर्शाता है। ऐसी सहायता उस समय के निर्माताओं के लिए केवल आर्थिक सहयोग नहीं, बल्कि क्षेत्रीय सिनेमा के प्रति संस्थागत विश्वास का संकेत भी थी। ‘सतरंगी’ का महत्व इस बात में है कि यह हरियाणवी सिनेमा को एक ऐसे विषय की ओर ले जाती है, जहाँ न खेत कहानी का केंद्र हैं, न केवल गाँव की परंपरा—बल्कि एक पिता का अकेलापन और एक बेटी की संवेदना कहानी का केंद्र बनती है। यही संवेदनशीलता इसे अपने समय की अन्य फिल्मों से अलग करती है।

यदि ‘पगड़ी: द ऑनर’ ने हरियाणवी सिनेमा को राष्ट्रीय मंच पर सामाजिक रूढ़ियों और सम्मान की अवधारणा के माध्यम से पहचान दिलाई, तो ‘सतरंगी’ ने उसी राष्ट्रीय मंच पर पारिवारिक रिश्ते, बेटी की जिम्मेदारी और पिता के अकेलेपन जैसी भावनात्मक संवेदनाओं को स्थान दिया। इस दृष्टि से ‘सतरंगी’ हरियाणवी सिनेमा के उस बदलते दौर की प्रतिनिधि फिल्म है, जिसमें कहानीकार अपनी मिट्टी से जुड़े रहते हुए भी ऐसे विषयों की तलाश कर रहे थे, जिनकी संवेदना केवल हरियाणा तक सीमित न रहकर हर परिवार तक पहुँच सके।