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चंद्रावल (1984)

हरियाणवी सिनेमा के इतिहास में यदि किसी एक फिल्म को मील का पत्थर कहा जाए, तो वह निस्संदेह “चंद्रावल” (1984) है। यह फिल्म केवल एक सफल फिल्म नहीं थी, बल्कि हरियाणवी संस्कृति, लोकभाषा और लोकजीवन को पूरे उत्तर भारत में पहचान दिलाने वाली एक सांस्कृतिक क्रांति थी। बहुरानी के बाद एक नए सपने की शुरुआत

“बहुरानी” के बाद देवी शंकर प्रभाकर पूरी तरह संतुष्ट नहीं थे। उनका मानना था कि सहयोगियों के हस्तक्षेप के कारण वे अपनी सोच के अनुरूप फिल्म नहीं बना पाए। इसके बाद उन्होंने संकल्प लिया कि एक ऐसी फिल्म बनाई जाए जो पूरे हरियाणा में एक नई पहचान स्थापित करे।

इसी सोच से जन्म हुआ “चंद्रावल” का , फिल्म की कहानी और पटकथा स्वयं देवी शंकर प्रभाकर ने लिखी। फिल्म का निर्माण ऊषा शर्मा ने किया। गहन शोध के बाद बनी चंद्रावल

फिल्म बनाने से पहले देवी शंकर प्रभाकर और ऊषा शर्मा ने महीनों तक हरियाणा के विभिन्न क्षेत्रों—विशेष रूप से यमुनानगर, हिसार और गाड़िया लुहार समुदाय—पर गहन अध्ययन किया। उन्होंने उनकी वेशभूषा, रहन-सहन, संस्कृति और जीवनशैली को नजदीक से समझा। शोध के दौरान एक गाड़िया लुहार लड़की को लोकगीत गाते हुए सुना गया, जिसके बोल थे—”जिज्जा तू काला…”। यही पंक्ति बाद में हरियाणवी सिनेमा के सबसे लोकप्रिय गीतों में से एक बनी—”जिज्जा तू काला, मैं गोरी घणी…” शानदार कलाकार और तकनीकी टीम

फिल्म में उस दौर के बेहतरीन कलाकारों ने अभिनय किया, जिनमें प्रमुख थे—ऊषा शर्मा जगत सिंह जाखड़ अनुप लाठर राजू मान लीला सैनी रामपाल बल्हारा।

फिल्म में जाट युवक और गाड़िया लुहार समुदाय की युवती की प्रेम कहानी को बेहद संवेदनशीलता से प्रस्तुत किया गया। फिल्म का निर्देशन जयंत प्रभाकर ने किया। निर्देशक के रूप में यह उनकी पहली फिल्म थी और इसी फिल्म ने उन्हें हरियाणा में विशेष पहचान दिलाई।

आज के समय में जहां फिल्मों की शूटिंग महीनों चलती है, वहीं “चंद्रावल” की शूटिंग मात्र 18 दिनों में पूरी की गई। शूटिंग अक्टूबर माह में हुई थी। उस समय वैनिटी वैन जैसी सुविधाएं उपलब्ध नहीं थीं। कलाकार पहाड़ियों के पीछे जाकर कपड़े बदला करते थे। ऊषा शर्मा कई बार दो-दो घाघरे और दो-दो कुर्तियां एक साथ पहन लेती थीं ताकि जल्दी कॉस्ट्यूम बदल सकें।50-50 गज के भारी लहंगे पहनकर अभिनय करना उस दौर की कठिन परिस्थितियों और कलाकारों के समर्पण को दर्शाता है। वास्तविक गाड़िया लुहार बने फिल्म का हिस्सा फिल्म में दिखाई देने वाले गाड़िया लुहार अधिकांशतः वास्तविक समुदाय से लिए गए थे, जो पंचकूला क्षेत्र के आसपास रहते थे। निर्माताओं ने उनकी बैलगाड़ियों को भी किराए पर लिया था। उस समय एक गाड़ी का लगभग 1000 रुपये प्रति दिन। भुगतान किया गया था। फिल्म के सेट पर उनकी भोजन व्यवस्था भी की जाती थी। ऊषा शर्मा का संघर्ष और समर्पण

“चंद्रावल” के निर्माण में ऊषा शर्मा का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण रहा। उन्होंने अपनी लगभग पूरी व्यक्तिगत बचत इस फिल्म में लगा दी थी।

सेट पर कलाकारों के लिए भोजन उनके घर से बनकर आता था। मेकअप भी कई बार स्वयं कलाकार ही किया करते थे। सीमित संसाधनों के बावजूद फिल्म निर्माण में कोई कमी नहीं छोड़ी गई। संगीत जिसने इतिहास बना दिया

फिल्म का संगीत प्रसिद्ध संगीतकार जेपी कौशिक ने दिया।गीतकार थे—देवी शंकर प्रभाकर & मनफूल सिंह डांगी जबकि गीतों को स्वर दिए—दिलराज कौर विजय मजूमदार भाल सिंह बल्हारा. फिल्म के लगभग सभी गीत लोकप्रिय हुए और आज भी नई पीढ़ी उन्हें बड़े उत्साह से सुनती है। हरियाणा की पहली व्यावसायिक सुपरहिट फिल्म 1984 में प्रदर्शित हुई “चंद्रावल” हरियाणवी सिनेमा की तीसरी फिल्म थी, लेकिन यह पहली ऐसी फिल्म बनी जिसने व्यावसायिक रूप से अभूतपूर्व सफलता हासिल की। लगभग 5 लाख रुपये की लागत से बनी इस फिल्म ने रिकॉर्ड कमाई की। कहा जाता है कि इसकी पूरी लागत केवल फरीदाबाद के गगन सिनेमा से ही वसूल हो गई थी। devi shankar prabhakar haryanvi kalakar

फिल्म ने हरियाणा के साथ-साथ—

पंजाब राजस्थान उत्तर प्रदेश

में भी शानदार प्रदर्शन किया।उत्तर प्रदेश के शामली शहर में यह फिल्म लगभग 30 सप्ताह तक प्रदर्शित हुई थी। पहली हरियाणवी फिल्म जिसे मिला टैक्स फ्री दर्जा “चंद्रावल” हरियाणा की पहली फिल्म मानी जाती है जिसे लगभग छह महीने के लिए मनोरंजन कर (Entertainment Tax) से मुक्त किया गया था। इस निर्णय ने फिल्म की लोकप्रियता को और बढ़ाया तथा हरियाणवी सिनेमा को नई दिशा दी। हरियाणवी सिनेमा की पहली 16mm. फिल्म तकनीकी दृष्टि से भी “चंद्रावल” ऐतिहासिक थी। फिल्म की सिनेमैटोग्राफी चतर सिंह और विलास कुरालकर ने किया। ने की, जिन्होंने हरियाणा की ग्रामीण संस्कृति और प्राकृतिक सौंदर्य को शानदार ढंग से कैमरे में कैद किया। सफलता के बाद भी समाज को समर्पित रहा सफर

“चंद्रावल” से मिली आर्थिक सफलता को देवी शंकर प्रभाकर और ऊषा शर्मा ने व्यक्तिगत संपत्ति बनाने में नहीं लगाया। उन्होंने उसी धन को पुनः हरियाणवी सिनेमा और समाज को समर्पित करते हुए आगे चलकर—

फूल बदन ,जाटनी ,लाडो बसंती जैसी फिल्मों का निर्माण किया। चंद्रावल की विरासत आज चार दशक से अधिक समय बीत जाने के बाद भी “चंद्रावल” केवल एक फिल्म नहीं, बल्कि हरियाणवी संस्कृति की पहचान बन चुकी है।इस फिल्म ने यह सिद्ध किया कि यदि स्थानीय संस्कृति, लोकभाषा और जनभावनाओं को ईमानदारी से प्रस्तुत किया जाए तो क्षेत्रीय सिनेमा भी राष्ट्रीय स्तर पर सफलता प्राप्त कर सकता है। “चंद्रावल” ने हरियाणवी सिनेमा को वह पहचान दी, जिसकी नींव पर आज पूरी इंडस्ट्री खड़ी है। यही कारण है कि इसे आज भी हरियाणवी सिनेमा की सबसे प्रभावशाली और ऐतिहासिक फिल्मों में गिना जाता है। हरियाणवी सिनेमा की ऐतिहासिक फिल्म चंद्रावल को हरियाणा सरकार को सांस्कृतिक धरोहर के रूप में संरक्षित करने की दिशा में गंभीर पहल करनी चाहिए। यदि सरकार इस फिल्म के अधिकार खरीदकर इसे राज्य की फिल्म विरासत (Film Heritage) का हिस्सा बनाए, तो आने वाली पीढ़ियाँ हरियाणवी सिनेमा के स्वर्णिम इतिहास को समझ और देख सकेंगी। यह केवल एक फिल्म नहीं, बल्कि हरियाणा की भाषा, संस्कृति, लोककला और सिनेमाई पहचान का अमूल्य दस्तावेज़ है, जिसे सुरक्षित रखना हमारी सांस्कृतिक जिम्मेदारी भी है।