गजेंद्र फोगाट
गजेंद्र फोगाट — गायक, अभिनेता एवं सांस्कृतिक व्यक्तित्व परिचय
गजेंद्र फोगाट हरियाणवी लोकसंगीत, मंच प्रस्तुतियों, अभिनय और सांस्कृतिक संरक्षण के क्षेत्र में अपनी विशिष्ट पहचान रखने वाले एक मूर्धन्य कलाकार हैं। उनका जन्म 28 फरवरी 1977 को हरियाणा में हुआ। उनके जन्मस्थान के संदर्भ में झज्जर जिले के मलिकपुर गांव तथा रोहतक का उल्लेख मिलता है। उनका परिवार एक सामान्य ग्रामीण परिवेश से जुड़ा हुआ था और उनके पिता पेशे से एक इंजीनियर थे। परिवार में संगीत की कोई पूर्व पृष्ठभूमि न होने के बावजूद उन्होंने अपनी कलात्मक प्रतिभा और अदम्य लगन के दम पर संगीत जगत में अपना मुकाम बनाया।
गजेंद्र फोगाट की प्रारंभिक स्कूली शिक्षा मलिकपुर के विद्यालय से संपन्न हुई। विद्यालयी जीवन में वे अध्ययन के साथ-साथ खेलों, विशेष रूप से बास्केटबॉल में अत्यधिक सक्रिय रहे और उन्होंने नौवीं कक्षा के दौरान राज्य स्तर पर पदक भी प्राप्त किया। उच्च शिक्षा के लिए उन्होंने झज्जर स्थित सीआरए कॉलेज में प्रवेश लिया, जहाँ उन्होंने विज्ञान वर्ग की पढ़ाई के साथ कॉलेज के हरियाणवी ऑर्केस्ट्रा समूह में सक्रिय भागीदारी निभाई। इस परिवेश ने उन्हें वाद्ययंत्रों, सामूहिकता और मंच प्रस्तुति की गहरी समझ प्रदान की।
अपनी संगीत यात्रा के आरंभिक दौर में वे प्रसिद्ध पंजाबी लोकगायक गुरदास मान की गायकी और सादगीपूर्ण मंचीय शैली से अत्यधिक प्रभावित हुए। उन्होंने गुरदास मान को अपना गुरु एवं मार्गदर्शक माना और अपनी शुरुआती मंचीय प्रस्तुतियों में उनके गीतों को गाया। वर्ष 1994 में विधिवत रूप से रंगमंच और गायन के क्षेत्र में प्रवेश करने के बाद, उन्होंने वर्ष 1996 में अपना पहला संगीत एल्बम 'हैलो अंगूरी' जारी किया। इसके उपरांत मेट्रो चैनल की एक गायन प्रतियोगिता में प्रसिद्ध संगीतकार बप्पी लाहिड़ी द्वारा उनके हुनर की सराहना ने उनके आत्मविश्वास को नई दिशा दी।
रागनी और मंचीय सफर
गजेंद्र फोगाट के कलात्मक जीवन की सुदृढ़ नींव रंगमंच और जीवंत मंचीय आयोजनों पर टिकी रही है। वर्ष 1994 से आरंभ हुए उनके मंचीय सफर ने उन्हें सीधे तौर पर जनसाधारण की नब्ज से जोड़ा। उन्होंने पारंपरिक लोकधुनों, किस्सागोई और रागनी शैली के स्वाभाविक आकर्षण को समकालीन ऊर्जा के साथ मंचों पर प्रस्तुत किया, जिससे हरियाणवी मंचीय गायकी को एक नया विस्तार मिला।
हरियाणा के ग्रामीण अंचलों और पारंपरिक लोकमंचों से शुरू हुआ उनका यह सफर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय फलक तक पहुंचा। उन्होंने भारत के विभिन्न राज्यों के अलावा विदेशों में बसे भारतीय समुदायों के बीच भी अपनी प्रस्तुतियों का जादू बिखेरा। उनके सांस्कृतिक कार्यक्रमों की गूंज ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी, दुबई और थाईलैंड जैसे देशों के प्रतिष्ठित मंचों तक पहुंची, जिससे वैश्विक स्तर पर हरियाणवी लोकसंस्कृति को प्रतिष्ठा प्राप्त हुई।
मंचीय प्रस्तुति के साथ-साथ उन्होंने सामाजिक चेतना और सांस्कृतिक अभियानों में भी अपनी सक्रिय भूमिका निभाई है। हरियाणा सरकार के सूचना, जनसंपर्क एवं भाषा विभाग के विशेष प्रचार प्रकोष्ठ के अंतर्गत विभिन्न जिम्मेदारियों और हरियाणा कला परिषद में अतिरिक्त निदेशक के रूप में उन्होंने राज्य की लुप्तप्राय लोककलाओं, सांग परंपरा और पारंपरिक रागनी मंचों को संस्थागत संबल प्रदान करने का महत्वपूर्ण कार्य किया।
वेब सीरीज और डिजिटल प्लेटफॉर्म
बदलते दौर के साथ गजेंद्र फोगाट ने डिजिटल मनोरंजन और मुख्यधारा के सिनेमाई माध्यमों में भी अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज कराई। उनके करियर का एक अत्यंत प्रभावशाली मोड़ तब आया जब वर्ष 2015 में प्रदर्शित बॉलीवुड फिल्म 'गुड्डू रंगीला' के चर्चित गीत 'माता का ईमेल' ('कल रात माता का ईमेल') को उन्होंने अपनी अनूठी आवाज़ दी। इस गीत ने राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक लोकप्रियता हासिल की और हरियाणवी बोली की मिठास को हिंदी सिनेमा के दर्शकों तक पहुंचाया।
गायन के समानांतर उन्होंने अभिनय जगत में भी अपनी बहुआयामी प्रतिभा का परिचय दिया। वे राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता हरियाणवी फीचर फिल्म 'छोरियां छोरों से कम नहीं होती' और 'गुड्डू रंगीला' जैसी सिनेमाई परियोजनाओं के साथ-साथ 'रुक जा दिल दीवाने' जैसे रचनात्मक प्रोजेक्ट्स से अभिनेता व कलाकार के रूप में जुड़े रहे हैं।
विभिन्न डिजिटल प्लेटफॉर्म्स, यूट्यूब और म्यूजिक स्ट्रीमिंग सेवाओं के दौर में उनके क्लासिक एवं नए गीतों ने करोड़ों श्रोताओं तक पहुंच बनाई है। आधुनिक ऑडियो-विजुअल माध्यमों को अपनाते हुए उन्होंने अपनी प्रस्तुतियों की गुणवत्ता और सांस्कृतिक प्रामाणिकता को हमेशा बनाए रखा, जिसने उन्हें डिजिटल पीढ़ी के बीच भी समान रूप से प्रासंगिक बनाए रखा है।
हरियाणवी रागनी और संगीत
गजेंद्र फोगाट के संपूर्ण संगीत सफर का सर्वाधिक युगांतरकारी पड़ाव उनका सुप्रसिद्ध हरियाणवी गीत 'पानी आंख्या का' ('यो पानी आंख्या का') रहा। इस गीत ने न केवल हरियाणा और समूचे उत्तर भारत में लोकप्रियता के ऐतिहासिक कीर्तिमान स्थापित किए, बल्कि उनके पिता के हृदय में भी उनके संगीत के प्रति सम्मान और स्वीकृति को स्थापित किया।
उनके संगीत कैटलॉग में विविध भावों और विषयों को समेटे अनेक सदाबहार गीत शामिल हैं। उनके प्रमुख और बहुचर्चित गीतों में 'बहू काले की', 'बलमा बम लहरी', 'लटके-झटके', 'लैश नहर में' और 'सेक्टर आली कोठी' जैसे संगीत ट्रैक उल्लेखनीय हैं। इन गीतों में ठेठ ग्रामीण शब्दावली, हास्य, सामाजिक व्यंग्य और लोक-उमंग का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है।
पारंपरिक रागनी और लोकगीतों के मर्म को आधुनिक वाद्ययंत्रों और नवीन संगीत संयोजन के साथ प्रस्तुत करने की उनकी शैली ने हरियाणवी संगीत उद्योग के पुनरुद्धार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनकी आवाज़ का भारीपन और लोकधुनों का सटीक ज्ञान हरियाणवी संगीत को फूहड़ता से दूर एक गरिमापूर्ण पहचान दिलाने में निरंतर सहायक रहा है।
वर्तमान में
वर्तमान समय में गजेंद्र फोगाट एक वरिष्ठ कलाकार, सांस्कृतिक संरक्षक और शिक्षक के रूप में अपनी सेवाएं दे रहे हैं। जुलाई 2025 से वे श्री विश्वकर्मा कौशल विश्वविद्यालय (SVSU) में प्रोफेसर ऑफ प्रैक्टिस के रूप में नई पीढ़ी को लोककला, व्यावहारिक संगीत और सांस्कृतिक प्रबंधन का प्रशिक्षण दे रहे हैं।
एक ग्रामीण पृष्ठभूमि से निकलकर पारिवारिक असहमतियों और संघर्षों को पार करते हुए अंतरराष्ट्रीय मंचों, बॉलीवुड और अकादमिक संस्थानों तक पहुंचना गजेंद्र फोगाट की साधना और सांस्कृतिक निष्ठा का प्रत्यक्ष प्रमाण है। वे आज भी अपनी मिट्टी की खुशबू और हरियाणवी लोकसंस्कृति की गरिमा को पूरे स्वाभिमान के साथ विश्व पटल पर स्थापित करने के लिए निरंतर समर्पित हैं।