LICENSE

तकनीकी उतार-चढ़ाव के बावजूद License दर्शकों को अंत तक बांधे रखने में सफल रहती है।

रणजीत चौहान के निर्देशन में बनी फिल्म License एक ऐसी कोशिश है जो हरियाणवी सिनेमा को थिएटर कल्चर की तरफ वापस ले जाने का साहस दिखाती है। लगभग 3 साल बाद किसी हरियाणवी फिल्म का बड़े पर्दे पर रिलीज़ होना अपने आप में एक सकारात्मक संकेत है।Lorem ipsum dolor sit amet, consectetur adipiscing elit. Ut elit tellus, luctus nec ullamcorper mattis, pulvinar dapibus leo. फिल्म तकनीकी रूप से कहीं मजबूत दिखती है तो कहीं कमजोर, लेकिन इसके बावजूद यह दर्शकों को अपने साथ जोड़ने में सफल रहती है। एक बात स्पष्ट है—रणजीत चौहान एक ऐसे निर्देशक हैं जो अपने प्रोड्यूसर का पैसा “डूबने” नहीं देते, और हरियाणवी इंडस्ट्री में यह अपने आप में बड़ी बात है। 

निर्देशन

फिल्म का निर्देशन संतुलित है, लेकिन इसकी असली ताकत इसका स्क्रीनप्ले है।
रणजीत चौहान इससे पहले Malal और Chapar Faad Ke जैसे प्रोजेक्ट्स में भी अपनी पकड़ दिखा चुके हैं, और License में उनकी वही समझ और परिपक्वता नजर आती है।
शुरुआती एक घंटे में फिल्म अपनी पकड़ बनाने में थोड़ा समय लेती है, जहां दर्शकों को कहानी को समझने के लिए धैर्य रखना पड़ता है। हालांकि, लगभग 1 घंटा 20 मिनट के बाद कहानी पूरी तरह से रफ्तार पकड़ लेती है और दर्शकों को अपने साथ जोड़ने में सफल हो जाती है।
आखिरी 25 मिनट का स्क्रीनप्ले खास तौर पर काबिले-तारीफ है—टाइट, प्रभावशाली और पूरी तरह engaging।
सबसे बड़ी बात यह है कि फिल्म में कोई भी सीन अनावश्यक या खींचा हुआ महसूस नहीं होता, जो इसकी writing की मजबूती को दर्शाता है।

'छायांकन निर्देशक'

विकास के. शर्मा का जब License में काम देखा तो लगा कि उन्होंने Director of Photography के तौर पर काफी अच्छा काम किया है। वहीं Malal में भी उन्होंने अपनी सिनेमैटोग्राफी से दर्शकों का ध्यान मजबूती से बांधे रखा था—फ्रेमिंग और विजुअल ट्रीटमेंट में उनकी पकड़ साफ नजर आती है। फिल्म का क्लाइमेक्स सीन जींद की मेधा मिल में शूट हुआ, जहां बिना क्रेन के कई शॉट्स फिल्माए गए, लेकिन कहीं भी ऐसा महसूस नहीं होता कि भारी-भरकम तकनीकी उपकरणों की कमी रही हो—यह उनके काम की सबसे बड़ी खासियत है। हां, कुछ सीन जैसे मासूम शर्मा के घर वाले शॉट्स में थोड़ी और बारीकी और ध्यान दिया जा सकता था, जिससे विजुअल और बेहतर बन सकते थे। लेकिन फिर भी, SUPVA से पासआउट विकास के. शर्मा ने अपनी सिनेमैटोग्राफी से फिल्म को मजबूत विजुअल सपोर्ट दिया है और कुल मिलाकर अच्छा काम किया है। Rakhi Lochab द्वारा निभाया गया किरदार (मासूम शर्मा की पत्नी) जब आत्महत्या करती है, तो DOP इस पूरे मोमेंट को सीधे दिखाने के बजाय उसे layered तरीके से प्रस्तुत करता है , सीन की शुरुआत एक controlled mid-wide shot से होती है, जो न सिर्फ spatial context स्थापित करता है, बल्कि फ्रेम में मौजूद सन्नाटे और खालीपन को भी उभारता है। इसके बाद कैमरा जिस तरह close-up की तरफ शिफ्ट होता है—खासतौर पर फांसी पर लटके पैरों (legs) पर—वह एक conscious visual choice है। यह approach explicit depiction से बचते हुए, suggestive imagery के जरिए emotion को ज्यादा गहराई से convey करती है।

कास्टिंग

Masoom Sharma फिल्म की रीढ़ साबित होते हैं। उनकी dialogue delivery और natural Haryanvi tone दर्शकों को बार-बार कहानी से जोड़ती है। स्क्रीन पर उनकी मौजूदगी authenticity लेकर आती है, जो फिल्म के ग्रामीण परिवेश और किरदार की सच्चाई को मजबूत करती है।
फिल्म की कास्टिंग में Sunil Chitkara के किरदार को और ज्यादा प्रभावशाली (दमदार) बनाया जा सकता था, लेकिन ऐसा नहीं किया गया—हालांकि यह पूरी तरह निर्देशक Ranjeet Chauhan के विज़न का हिस्सा भी हो सकता है। संभव है कि सेकंड पार्ट में इस किरदार को और विस्तार और मजबूती के साथ पेश किया जाए। Yashpal Sharma का अभिनय एकदम लाजवाब है। उनके चरित्र को देखने के बाद साफ महसूस होता है कि वे थिएटर के कितने मजबूत और अनुभवी कलाकार हैं। उन्होंने फ़िल्म License में बेहद संतुलित और प्रभावशाली ढंग से अपने किरदार को निभाया है—पूरी तरह सधा हुआ और लगभग परिपूर्ण प्रदर्शन। साथ ही, उन्होंने हरियाणवी भाषा को भी बहुत स्वाभाविक और प्रभावी तरीके से बोला है, जो उनके किरदार को और अधिक विश्वसनीय बनाता है।
Manish Kumar, जिन्हें रंजीत चौहान अक्सर अपने प्रोजेक्ट्स में कास्ट करते हैं और जो हर बार अच्छा प्रदर्शन देते हैं, इस बार भी प्रभाव छोड़ते हैं। लेकिन उनसे फिल्म में पंजाबी भाषा बुलवाना उतना स्वाभाविक नहीं लगता। उनकी डायलॉग डिलीवरी में वह सहजता नहीं दिखती, जिससे यह महसूस होता है कि भाषा पर पकड़ पूरी तरह नैचुरल नहीं बन पाई। अगर उनके किरदार के लिए बागपत या बड़ौत (UP) की लोकभाषा का इस्तेमाल किया जाता, तो फिल्म का टच और ज्यादा प्रामाणिक हो सकता था। Abhimanyu Yadav (धर्मा) अपने किरदार में प्रभावी नजर आते हैं और स्क्रीन पर उनकी मौजूदगी ध्यान खींचती है। Malal में Ranjeet Chauhan ने उनसे जिस गहराई और intensity का काम लिया था, उसी स्तर की संभावनाएं License में भी दिखाई देती हैं, !!
किरदार की परतों को और विस्तार दिया जाता, तो धर्मा एक ज्यादा मजबूत और यादगार उपस्थिति बन सकता था। इसके बावजूद, Abhimanyu Yadav अपने हिस्से को ईमानदारी से निभाते हैं और सीमित scope में भी प्रभाव छोड़ने में सफल रहते हैं। फिर भी, उनकी स्क्रीन प्रेज़ेंस प्रभावी रहती है।
Raman Nassa की अभिनय क्षमता एकदम लाजवाब है, और पंजाबी भाषा पर उनकी पकड़ काफी मजबूत नजर आती है। Manvi Bhardwaj की अभिनय भी प्रभावशाली है, कहीं भी निरंतरता में कोई कमी महसूस नहीं होती। वहीं Satish Kashyap हर बार की तरह इस फ़िल्म License में भी पूरी फ़िल्म के दौरान दर्शकों पर अपनी पकड़ बनाए रखते हैं।

कास्टिंग डायरेक्टर

Samsher Singh ने License की कास्टिंग को जिस बारीकी से संभाला है, वह फिल्म की बड़ी ताकत बनकर सामने आती है। खास बात यह है कि उन्होंने न सिर्फ कास्टिंग डायरेक्टर के तौर पर काम किया, बल्कि खुद स्क्रीन पर अभिनय भी किया—और दोनों भूमिकाओं में संतुलन बनाए रखना वाकई तारीफ के काबिल है। Ranjeet K Chauhan और Samsher Singh का रिश्ता केवल प्रोफेशनल नहीं, बल्कि स्ट्रगल के शुरुआती दिनों से जुड़ा हुआ है। यही वजह है कि इस फिल्म में दिखाई देने वाला trust और understanding कास्टिंग में साफ झलकता है। Samsher, Ranjeet के भरोसे पर पूरी तरह खरे उतरते हैं और फिल्म के लिए एक believable और rooted ensemble तैयार करते हैं। License की कास्टिंग की सबसे बड़ी खूबी इसकी precision है। Arpit Lucha जैसे किरदार को भले ही स्क्रीन पर महज 10 सेकंड के लिए इस्तेमाल किया गया हो, लेकिन उसकी मौजूदगी impactful बनती है। यह दिखाता है कि casting director की पकड़ सिर्फ बड़े रोल्स तक सीमित नहीं, बल्कि छोटे से छोटे appearance को भी narrative में वजन देने की क्षमता रखती है। कुल मिलाकर, License की casting फिल्म के narrative को मजबूती देती है और इसे एक authentic, grounded cinematic experience बनाने में अहम भूमिका निभाती है।
Editing – एडिटिंग का काम Hittarath Sardana ने संभाला है, और उनका काम भी फिल्म को मजबूती देता है। खासकर नाइट सीन्स और ट्रांज़िशन बहुत अच्छे तरीके से हैंडल किए गए हैं, जिससे फिल्म का फ्लो बना रहता है और कहीं भी कट या जंप महसूस नहीं होता। कुल मिलाकर एडिटिंग फिल्म के टेक्निकल पक्ष को और बेहतर बनाती है।

साउंड डिजाइन​

Neeraj Rohila जैसे अनुभवी साउंड डिज़ाइनर की मौजूदगी फिल्म License के तकनीकी पक्ष को एक मजबूत आधार देती है। खास बात यह है कि Ranjeet K Chauhan की पिछली फिल्मों—Malal, Chapar Faad Ke और Opri Hawa—की तरह इस फिल्म में भी Rohila ने साउंड डिज़ाइन की जिम्मेदारी संभाली है, जिससे उनके काम में एक साफ़ consistency और समझ दिखाई देती है। इस बार भी उन्होंने अपने अनुभव का सही इस्तेमाल करते हुए फिल्म के माहौल को प्रभावी बनाने की कोशिश की है। सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि Haryanvi Film Industry में पहली बार Dolby 7.1 जैसे एडवांस साउंड सेटअप के साथ प्रयोग किया गया है, जो अपने आप में एक सराहनीय कदम है। यह तकनीकी पहल फिल्म को एक नया आयाम देती है और कई दृश्यों में immersive अनुभव पैदा करती है। इस तरह के प्रयोग इंडस्ट्री के विकास की दिशा में सकारात्मक संकेत देते हैं। वहीं Dipon Das का BGM फिल्म के इमोशनल ग्राफ को मजबूती देता है। उनका बैकग्राउंड म्यूजिक कई अहम पलों में भावनाओं को उभारने में सफल रहता है और कहानी के flow को बनाए रखता है। खासकर “Gach Lagee” जैसे गानों की melody फिल्म को engaging बनाए रखती है और दर्शकों को कहानी से जोड़े रखती है।

  1. Costume Design & ART WORK

Ranjeet Chauhan अपने प्रोजेक्ट्स में आर्ट डायरेक्शन और कॉस्ट्यूम डिज़ाइन को लेकर एक स्पष्ट संवेदनशीलता दिखाते हैं, और License में भी यह निरंतरता बरकरार रहती है। फिल्म का आर्ट ट्रीटमेंट बनावटी नहीं लगता, बल्कि लोकल परिवेश के साथ स्वाभाविक रूप से घुलता-मिलता है। कॉस्ट्यूम्स किरदारों की सामाजिक पृष्ठभूमि और मानसिक स्थिति को सपोर्ट करते हैं, जिससे स्क्रीन पर एक विश्वसनीय ग्रामीण दुनिया निर्मित होती है। ह visual authenticity फिल्म के रूरल टोन को मजबूती देती है और नैरेटिव को जमीन से जुड़ा हुआ बनाए रखती है।

तकनीकी फिल्में

3 साल बाद किसी हरियाणवी फिल्म का थिएटर में रिलीज़ होना अपने आप में proud की बात है। Producer ने कुछ नया सोचने की कोशिश की है और इस तरह का experiment इंडस्ट्री के लिए बहुत जरूरी भी था। Masoom Sharma की acting और उनके मुंह से बोले गए हरियाणवी dialogues बार-बार audience को connect करते हैं। DOP Vikas K Sharma का काम सबसे बढ़िया लगता है—frames बहुत अच्छे तरीके से design किए गए हैं और visuals strong feel देते हैं। Film का screenplay काफी कसा हुआ है, एक-दो जगह छोड़कर बाकी पूरी फिल्म tight बनी रहती है। Sound थोड़ा सा निराश करता है, लेकिन dialogues और बाकी technical काम इसे संभाल लेते हैं। हरियाणवी फिल्म इंडस्ट्री में ये एक experiment है और ऐसा होना जरूरी भी है।

Chandrawal के बाद “License” दूसरी ऐसी फिल्म बन सकती है जो अपने पैसे recover कर पाए—क्योंकि अभी तक ऐसा बहुत कम हुआ है। Film को कमाना भी चाहिए, क्योंकि अगर Masoom Sharma जैसे face के साथ भी ये फिल्म नहीं चलती, तो एक बड़ा सवाल खड़ा होगा। SUPVA Rohtak ( Pass out ) के द्वारा बनाई गई इस फिल्म में रोहतक का एक filmmaking circle भी नजर आता है, जहां Ranjeet Chauhan जैसे लोगों को पता है कि फिल्म कैसे बनाई जाती है। उनकी पिछली फिल्मों के बाद ये काम अच्छा लगता है और फिल्म कहीं भी irritate नहीं करती। Director का अपना एक clear vision है और वो second part के लिए scope छोड़कर जाते हैं—मतलब अगर ये first part चलती है, तो sequel आना तय है।

फ़िल्म की शूटिंग Jind में हुई है और लोकेशनों का उपयोग बहुत प्रभावी तरीके से किया गया है। देखने या न देखने के अपने-अपने कारण हो सकते हैं—कोई Masoom Sharma को पसंद करे या न करे, लेकिन Ranjeet Chauhan का दृष्टिकोण पूरी तरह साफ नज़र आता है। एक समीक्षक के रूप में कहा जा सकता है कि यह फ़िल्म एक ईमानदार और मजबूत प्रयास है, और हरियाणवी सिनेमा को आगे बढ़ाने के लिए इसे सभी को एक बार अवश्य देखना चाहिए।

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