रिव्यू: जानलेवा इश्क (OTT – स्टेज)
निर्माता: मालती फिल्म्स एंटरटेनमेंट
कहानी: प्रवेश राजपूत
पटकथा और संवाद -सचिन बाँगड़
कहानी-
हरियाणा में यदि फ़िल्म उद्योग को पेशेवर तरीके से विकसित करना है, तो लेखकों को अपनी लेखनी को और भी निखारना होगा। अच्छी लेखनी ही सिनेमा की असली आत्मा होती है। हरियाणा के एक ऐसे ही प्रतिभाशाली लेखक हैं- सचिन बांगड़, जिनकी कलम ने हमेशा दमदार और सटीक लेखन प्रस्तुत किया है। उनके कुछ प्रोजेक्ट जैसे ‘पुनर्जन्म’ और ‘दुजवर’ इस बात का प्रमाण हैं, जहाँ उनके लेखन की ताक़त ख़ुद-ब-ख़ुद बोलती है। विशेष रूप से ”दुजवर” में उनका लेखन क़ाबिल-ए-तारीफ़ रहा। सचिन बांगड़ रहस्य और संस्पेंस जैसे विषयों पर बहुत गहराई से लिखते हैं। इसी शैली में उन्होंने हाल ही में मंच ‘स्टेज’ पर प्रदर्शित हुई फ़िल्म ‘जानलेवा इश्क़’ में भी शानदार काम किया है। इस फ़िल्म में उन्होंने बेहतरीन पटकथा और संवादों के माध्यम से दर्शकों को बाँधे रखा।
इसके पहले लेखक प्रवेश राजपूत हरियाणवी फ़िल्म उद्योग को ‘कॉलेज कांड’ और ‘फौजा’ जैसे कई बेहतरीन प्रोजेक्ट्स दे चुके हैं। ‘जानलेवा इश्क़’ की कहानी भी उन्होंने ही लिखी है। इस फ़िल्म की कहानी एक सामान्य से लगने वाले प्रेम अध्याय को इतने गहरे और रहस्यमय तरीके से प्रस्तुत करती है कि दर्शक चौंक जाते हैं। कहानी में संस्पेंस इस क़दर बुना गया है कि आख़िर तक दर्शक अनुमान नहीं लगा सकते कि आगे क्या होगा।
कहानी की मुख्य किरदार निरीक्षक कविता राठी हरियाणा पुलिस में तैनात एक तेज़तर्रार और होशियार महिला है, जो अपराधियों को पकड़ने में माहिर है। जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ती है, पता चलता है कि अमित की पत्नी पूजा और संजू एक ही गाँव के हैं। बचपन से साथ पढ़ते-पढ़ते दोनों को एक-दूसरे से प्यार हो गया था लेकिन जाति और सामाजिक हैसियत की दीवार ने उनके रिश्ते को मंज़िल तक नहीं पहुँचने दिया। संजू एक ग़रीब और नीची जात का लड़का जबकि पूजा एक बड़े नेता की बेटी। दोनों डॉक्टर बनने का सपना देखते थे। लेकिन समय और हालात ने उन्हें अलग कर दिया। इसी बीच अमित एक डीलर और अपराधी बन गया।
समीक्षा-
‘जानलेवा इश्क़’ की कहानी एक बेहतरीन अपराध-रहस्य कथा के रूप में सामने आती है। इसमें भावनाएँ, प्रेम, जातिवाद, अपराध और पुलिस की पड़ताल सभी को बहुत अच्छे से पिरोया गया है। सचिन बांगड़ की लेखनी और प्रवेश राजपूत की कहानी मिलकर इस फ़िल्म को हरियाणवी सिनेमा के लिए एक मज़बूत विषयवस्तु बनाते हैं।
पटकथा-
सचिन बांगड़ ने ‘जानलेवा इश्क़’ की पटकथा बेहद प्रभावशाली ढंग से लिखी है। हर दृश्य को उसकी ज़रूरत के अनुसार पूरा समय और स्थान दिया गया है। फ़िल्म की शुरुआत के पहले 24 मिनट तक सब कुछ सामान्य लगता है लेकिन इसके बाद पटकथा ऐसा मोड़ लेती है कि दर्शक सीट से चिपक जाता है और हर अगले पल का इंतज़ार करता है कि अब क्या होगा?
संवाद-
कविता राठी (अर्चना राव) का संवाद “थोड़ा कहा, घणा समझा” एकदम देसी और लोकल टच लिए हुए है, जो हरियाणवी माहौल में सटीक बैठता है। इसी तरह का संवाद “तीतर का भी मोर बना दे थाने में”- ऐसे संवाद दर्शकों के मन में बस जाते हैं। सचिन बांगड़ ने बहुत ही स्वाभाविक और ज़मीन से जुड़े संवाद लिखे हैं, जो किरदारों को और विश्वसनीय बनाते हैं।
निर्देशन-
फ़िल्म का निर्देशन हेमंत आर. प्रदीप ने किया है और इसे मालती फ़िल्म एंटरटेनमेंट ने प्रस्तुत किया है। हेमंत आर. प्रदीप का यह हरियाणा में पहला प्रोजेक्ट है लेकिन वे बॉलिवुड में कई नामी निर्माण संस्थानों के साथ काम कर चुके हैं। फ़िल्म का पहला दृश्य ही दर्शकों को संकेत दे देता है कि कुछ बड़ा और गहरा होने वाला है। निर्देशक को बख़ूबी पता है कि दर्शक की नब्ज़ कैसे पकड़ी जाती है।
नहर पर संजू की लाश फेंकने वाला दृश्य- यह दृश्य फ़िल्म का चरमबिंदु है, जहाँ निर्देशन, छायांकन और अभिनय तीनों एक साथ चमकते हैं। हेमंत ने हर किरदार को उसका पूरा स्थान दिया है। किसी को जबरन नहीं घुसाया गया, हर किरदार कहानी के लिए ज़रूरी लगता है। अगर इस साल हरियाणा की शीर्ष 3 वेब श्रंखलाओं या फ़िल्मों की बात करें, तो जानलेवा इश्क़ को उसमें रखा जा सकता है। हेमंत आर. प्रदीप का यह काम देखकर यही कहा जा सकता है कि स्टेज और चौपाल जैसे मंचों को अपनी लाइब्रेरी को सिर्फ़ भरने के लिए विषयवस्तु नहीं, बल्कि ऐसे ही पेशेवर स्तर के प्रोजेक्ट्स पर ध्यान देना चाहिए।
पात्र चयन (पात्र-चयन)-
जानलेवा इश्क़ का पात्र-चयन बेहद मज़बूत रहा। सभी कलाकारों ने अपने-अपने किरदारों को बख़ूबी निभाया और कहानी को विश्वसनीयता प्रदान की। पूजा- अश्वार्या आर्य, संजू- विक्रम मलिक, अमित- मनीष बलराज, कविता राठी (निरीक्षक) (अर्चना राव) हवलदार दीपक (अजय शर्मा) पूजा के पिता (रमेश कुंडू) पूजा के चाचा (श्याम वशिष्ठ) संजू के पिता (कौशल भारद्वाज)। अर्चना राव (निरीक्षक कविता राठी) का अभिनय विशेष रूप से सराहनीय रहा। उन्होंने अपने किरदार को सशक्त और प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया है।
छायांकन (शुभम सैनी)-
शुभम सैनी ने फ़िल्म के छायांकन को बेहतरीन तरीके से अंजाम दिया है। विशेष रूप से नहर वाले दृश्य, जहाँ अमित संजू की लाश फेंकने जाता है- वह दृश्य तकनीकी रूप से कमाल का है। प्रकाश व्यवस्था, कैमरा फ़्रेमिंग और वातावरण निर्माण सब कुछ सटीक और संतुलित है। हर दृश्य को दृश्य-दर-दृश्य और फ़्रेम-दर-फ़्रेम सोच-समझकर शूट किया गया है। रात्रिकालीन दृश्यों में शुभम सैनी का काम ख़ास तौर पर निखरकर सामने आता है। यह साफ़ दिखता है कि छायांकन निर्देशक ने सिर्फ़ शूट नहीं किया, बल्कि कहानी को दृश्यात्मक रूप से बताया है।
संगीत और गीत-
फ़िल्म में एक गीत है- “यारा ओ यारा रे”- गायक और संगीत निर्देशक: परवीन चौहान। इस गीत में परवीन चौहान ने सिर्फ़ अपनी गायकी का जलवा ही नहीं दिखाया, बल्कि संगीत संयोजन में भी ख़ास ध्यान दिया है। भारी वाद्ययंत्रों के साथ बाँसुरी का इस्तेमाल बहुत प्रभावी रहा। गीत स्वर और सुर के परिपूर्ण तालमेल के साथ गाया गया है। इससे पहले भी परवीन चौहान हरियाणवी संगीत उद्योग में उच्च स्तर के गीतों में अपनी आवाज़ दे चुके हैं। उनकी आवाज़ में एक गहराई है जो सीधे दिल तक जाती है।
संपादन और रंग-सुधार समीक्षा-
हरियाणा में 2025 में कई प्रोजेक्ट्स देखने को मिले लेकिन अक्सर देखा गया कि संपादन और रंग-सुधार (डिजिटल इमेजिंग) के मामले में गुणवत्ता से समझौता किया जाता है। मगर जब “जानलेवा इश्क़” फ़िल्म देखी, तो यक़ीन मानिए, संपादन और रंग-सुधार इतनी शानदार तरीके से किया गया है कि हर एक सेकेंड और हर फ़्रेम में मेहनत साफ़ नज़र आती है। फ़िल्म का फ़्रेम-दर-फ़्रेम संपादन कमाल का है। हालाँकि एक-दो दृश्य जैसे जब स्कूल से वैन आती है, वहाँ पर रंग-सुधार थोड़ा और बेहतर किया जा सकता था लेकिन ये बेहद मामूली बात है। हिम्मत सिसोदिया और सालिक ने संपादन और रंग-सुधार में कमाल का काम किया है। ख़ास तौर पर 1:07 मिनट पर जब पूजा और अमित बिस्तर पर लेटे हुए रात में बात कर रहे होते हैं उस दृश्य में रंग-सुधार इतनी बेहतरीन है कि दृश्य जीवंत लगने लगता है।
पृष्ठभूमि संगीत-
मैं हमेशा अपनी फ़िल्म समीक्षा में पृष्ठभूमि संगीत की बात ज़रूर करता हूँ, क्योंकि पृष्ठभूमि संगीत ही फ़िल्म की जान होता है। “जानलेवा इश्क़” में संस्पेंस के साथ-साथ जो टकाटक पृष्ठभूमि संगीत तैयार किया गया है, वह दर्शकों को दृश्यों से जोड़े रखता है। इस फ़िल्म का पृष्ठभूमि संगीत सहज रंधावा ने दिया है और पूरे फ़िल्म में संगीत बहुत उम्दा रहा है। हरियाणा में अक्सर देखा गया है कि पृष्ठभूमि संगीत यूट्यूब से उठाकर जोड़ दिया जाता है लेकिन इस फ़िल्म में पृष्ठभूमि संगीत को दृश्य-दर-दृश्य तैयार किया गया है, जो सराहनीय है।
ध्वनि रिकॉर्डिंग-
हम अनिरुद्ध के उत्कृष्ट कार्य की सराहना करते हैं, जिन्होंने एक ध्वनि रिकॉर्डिस्ट के रूप में अत्यंत कुशलता और समर्पण के साथ अपना योगदान दिया। ध्वनि रिकॉर्डिस्ट का काम भी लगभग ठीक रहा है। कुछ छोटी-मोटी बातें अगर थीं भी, तो वो नज़रअंदाज़ की जा सकती हैं।
कला एवं प्रकाश व्यवस्था समीक्षा-
जानलेवा इश्क़ फ़िल्म की सबसे बड़ी ताक़त अगर कोई तकनीकी पक्ष रहा है, तो वह है- प्रकाश व्यवस्था। हर दृश्य में यह स्पष्ट दिखाई देता है कि प्रकाश व्यवस्था टीम को यह पूरी समझ थी कि किस दृश्य में कितनी रोशनी देनी है और कहाँ छाया छोड़नी है।
यह स्तर का काम हरियाणा की फ़िल्मों में कम ही देखने को मिलता है। मेजर, राम, श्याम और मोहन की प्रकाश व्यवस्था टीम ने कमाल कर दिया है। एक ख़ास दृश्य का ज़िक्र करना चाहूँगा- जब अमित, रात के क़रीब 1:30 बजे, ई-रिक्शा में शव लेकर जा रहा होता है। जैसे ही कैमरा अंदर से बाहर आता है, सड़क की प्रकाश व्यवस्था और सेट लाइटिंग का जो तालमेल बनता है, वह तकनीकी रूप से बहुत ही मज़बूत है। ख़ासकर जब अमित रिक्शा चला रहा होता है, उसके चेहरे पर जो हल्की-हल्की रोशनी गिरती है- वहदृश्य बहुत प्रभावशाली बन जाता है। हरियाणा के हर रचनाकार को इस फ़िल्म की प्रकाश व्यवस्था ज़रूर देखनी चाहिए- इससे यह समझ आएगा कि सिनेमा को उजाले और अंधेरे से कैसे बयान किया जाता है। पिछले महीने स्टेज मंच पर प्रदर्शित हुई एक फ़िल्म में तो लाइट्स कैमरे के फ़्रेम में ही आ रही थीं- जो पूर्णतः ग़ैर-पेशेवर कार्य था। इसके विपरीत जानलेवा इश्क़ में प्रकाश व्यवस्था टीम ने सटीक और संतुलित काम किया है।
कला निर्देशन-
कला निर्देशन भी फ़िल्म का एक मज़बूत पक्ष रहा है। पूजा के घर में रखे गए सफ़ेद सोफ़े, दीवारों का रंग, और बाक़ी सेट विवरण यह साफ़ दिखाते हैं कि कला निर्देशक ने कहीं कोई समझौता नहीं किया। संजू के घर का माहौल भी बड़े प्यार से डिज़ाइन किया गया है- हर सेट में एक कहानी है।
परिधान सज्जा-
हरियाणा में अक्सर फ़िल्मों में देखा जाता है कि किसी के भी कपड़े किसी को पहना दिए जाते हैं, चाहे वे उस किरदार की देहभाषा या शख़्सियत के अनुकूल हों या नहीं। ये एक बड़ा प्रश्न है- और इसे निर्देशक को गंभीरता से लेना चाहिए। लेकिन जानलेवा इश्क़ में यह समस्या नज़र नहीं आई। रज़िया सुल्तान द्वारा डिज़ाइन किए गए परिधानों में हर किरदार को उसकी व्यक्तित्व और दृश्य की माँग के अनुसार वस्त्र पहनाए गए हैं सही आकार और सही शैली में।
तकनीकी उत्कृष्टता-
यह फ़िल्म स्टेज मंच की 2025 की सबसे मज़बूत तकनीकी फ़िल्म मानी जा सकती है। कहानी भले ही सामान्य लगे, लेकिन 24वें मिनट के बाद फ़िल्म आपको पूरी तरह से पकड़ लेती है। सचिन बांगड़ और तकनीकी रूप से हरियाणा की फ़िल्मों में एक नया मापदंड स्थापित करते हैं। रणजीत चौहाल को तकनीकी रूप से अब तक एक सशक्त निर्देशक माना जाता था लेकिन जब हिम्मत आर. प्रदीप की यह फ़िल्म देखी तो महसूस हुआ कि हरियाणा को इस स्तर के सिनेमा की ज़रूरत है। छायांकन की बात करें तो, हर दृश्य में जान डाल दी गई है। अर्चना राव की अदाकारी भी ज़बरदस्त रही है ऐसा लगता है जैसे हरियाणा में उन्हें शुरुआत से ही शीतला माता का आशीर्वाद प्राप्त है। उनका अभिनय हर बार दर्शकों को प्रभावित करता है।
भविष्य की अपेक्षा-
फ़िल्म में संस्पेंस की परतें हैं, जो अंत तक दर्शकों को बाँधे रखती हैं। उम्मीद है कि निर्देशक हिम्मत आर. प्रदीप दूसरे भाग में इससे भी बड़ा और दमदार विषयवस्तु लेकर आएँगे। यह उनका हरियाणा में पहला प्रयोग था और यह सफल रहा। हम आशा करते हैं कि भविष्य में वह और भी बेहतरीन प्रोजेक्ट्स लेकर आएँगे।
