वेब रिव्यू-  खून, रंग और पानी ‘बैड बॉयज़ भिवानी’

सिनेमैटिक हरियाणा के पिछली बार एक फ़िल्म के रिव्यू में मैंने कहा था कि स्टेज को हरियाणा में नये लोगों को मौका देना चाहिए। एकदम पैसा वसूल सिनेमा बनाकर कर देंगे वे लोग। और काफ़ी हद तक हुआ भी वही यही वजह है कि ओटीटी स्टेज पर 14 फ़रवरी को रिलीज़ हुई वेब सीरीज़ बैड बॉयज़ भिवानी अच्छी सिरिज़ बनकर सामने आई है साथ ही एक प्रोफ़ेशनल टीम की तरह इन्होंने काम किया है।

विपन मलावत एक प्रोफ़ेशनल डायरेक्टर तो है ही और ये बात उन्होंने एक राजस्थानी वेब सीरीज़ “परीक्षा” बनाकर साबित भी कर दिया था। बावजूद इसके उस सीरीज़ में कुछ कमियां रह गई थी जिन्हें उन्होंने बैड बॉयज़ भिवानी बनाकर पूरा कर दिया है। साथ ही हरी ओम कौशिक फ़िल्म कास्टिंग ने भी यह साबित किया कि ये लोग हरियाणा की एक प्रोफ़ेशनल कास्टिंग एजेंसी है।

सीरीज़ की कहानी और पटकथा लिखा है सोनू रोंझिया और अंकित स्टार्क ने। वेब सीरीज़
की कहानी अच्छी है, कह सकते है कि दर्शक इसे देखते हुए बोर फ़ील नहीं करते। पटकथा भी पूरा का पूरा दर्शकों को जोड़े रखता है अपने साथ। सीरीज़ के डायरेक्टर विपन मलावत ने बतौर डायरेक्टर पटकथा को और मज़बूत बनाया है। उन्होंने इस सीरीज़ को प्रोफ़ेशनल बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। हर चीज़ को बहुत अच्छे से परिभाषित किया गया है।

और अंत में मीनू का एनकाउंटर होने के बाद मृत देह चार पहिया गाड़ी में जा रही होती है और ठीक बग़ल में से सुमन की (विदाई) शादी के बाद कार का गुज़रना….वाह! क्या उम्दा शॉट था… आँख भर आई।

ये एक ड्रोन शूट था – डायरेक्टर विपन ने बड़े उम्दा तरीक़े से इसको शूट करवाया, जो वास्तव में देखते ही बनता है।
इस बात में कोई दो राय नहीं है कि विपन एक प्रोफ़ेशनल डायरेक्टर है।

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संवाद -

सीरीज़ के हर एक संवाद में दम है। मीनू का लास्ट में सुमन के घर पर शादी में मिलना – “आपनी हथेली पर मेहंदी का ज़ोर ना गेडअ भागवान, दबके मर जागी लकीर मेरे हाथा की“ क्या कमाल का संवाद है। और भी बहुत सारे संवाद है जो दृश्य के हिसाब से कमाल के लिखे गये हैं।

कास्टिंग -

ओम फ़िल्म कास्टिंग हरिओम कौशिक को एक सलाम तो बनता है जो कास्टिंग उन्होंने इस सीरीज़ में की है शायद ही हरियाणा की किसी और सीरीज़ में देखने को मिले। एक-एक पात्र बिल्कुल तोड़ बिठा कर गया। सभी ने अपने किरदार के साथ न्याय किया। एक दृश्य में जब मीनू अपने अड्डे पर नेता के पीए को सामने से गोली तानते है – पीए के माथे के पसीने साफ़ बता रहे है की मौत से सबको डर लगता है। मतलब इतने छोटे से दृश्य में वे किसी को भी बिठा सकते थे लेकिन नहीं ओम कास्टिंग ने वहाँ पर भी एक प्रोफ़ेशनल कास्टिंग की।

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कलाकार -

नवीन, हरीओम कौशिक, पलक सैनी, अमित ओम मलिक, मनीष बिश्ला, वीरू चौधरी, सपना लाठर, नवरत्न पांडे, अर्चना राव, अनुप रंगा, अजय सारवा, विष्णु सैनी, राजकुमार धनखड़, राहुल सरोहा, रमन संडिल्ये, अजय कुंडू, सोनू सिलान, स्टार्क, विनोद शर्मा, आदित्य सानी, सोनू परजापति, दिविज कौशिक, सूरज, साहिल, रचना, पूजा, कोमल।

मीनू की माँ का रोल करने वाली अर्चना राव एक लाचार माँ के किरदार में नज़र आई। जिसका बेटा मीनू एक गुंडा बदमाश है और वह कुछ नहीं कर पा रही है लास्ट के दृश्य में- “मैं आपने छोरे का ब्याह करवाऊँगी बहू लायूँगी“ रुला देता है अर्चना का संवाद के साथ चेहरे के हाव भाव भी। वीरू चौधरी और मनीष बिश्ला का इस सीरीज़ में कास्ट होना भी बहुत अच्छा था। दोनों की पहली हरियाणवी वेब सीरीज़ थी, दोनों पुलिस वाले एसपी और एसएचओ सच में बॉडी लैंग्वेज एक दम परफ़ेक्ट।

वीरू के चेहरे के हाव भाव बहुत बेहतरीन रहे हैं- मनीष बिश्ला और वीरु चौधरी दोनों के पात्र को बहुत अच्छे से दिखाया गया, दोनों ने अपना काम भी बख़ूबी तरीक़े से निभाया है। हरिओम कौशिक (घोड़ा) कती तोड़ करण आला रोल प्ले किया आपने। नवीन, अनुप, अजय सब का काम बढ़िया। मतलब पूरी टीम का काम बढ़िया। इसके साथ ही हरी ओम कौशिक के दूसरी तरफ़ विलेन के रोल में राहुल सरोहा बहुत ही बेहतर चुनाव था कास्टिंग के तौर पर। इस लड़के को देखकर लगा सचमुच यह सीरीज़ के दूसरे सीज़न में भी रहा तो ऐसे ही अपना उम्दा प्रदर्शन करेगा।

रामफल ब्रदर -

आज तक आपको जब भी देखा एक कॉमेडियन पात्र में देखा, लेकिन इस बार आप को उससे हटकर करना था वो आप कर भी पाये और उसमें सफल भी रहे। अजय सरोहा ने भी बढ़िया काम किया। कास्टिंग के मामले में हरियाणा की सबसे अच्छी सीरीज़ है ये।

छायांकन निर्देशक- राशिक किलानिया

छायांकन निर्देशक का काम एकदम परफ़ेक्ट। सच कहूँ तो यू मान लो एक-एक दृश्य को अच्छे से फ़िल्माया गया। छायांकन निर्देशक भी अच्छे रहे हैं।

संपादन -

मोहित मोर नाम सुना होगा। इन्होंने मेवात को भी संपादित किया था। सीरीज़ कुल मिलाकर ठीक संपादित की गई है। बल्कि यूँ कहूँ कि संपादन का काम कई जगह बहुत ही उम्दा रहा। रंग संयोजन अभिषेक सैनी ने किया है, जो सही है, उन्होंने अपना काम भी बख़ूबी किया। सीरीज़ में गोली चलना ये सब वास्तविक दिखाना होता है जो वी.

एफ. एक्स से योगेश भारद्वाज ने किया। जो वास्तव में कमाल का है।

ध्वनि डिज़ाइन और ध्वनि रिकॉर्डिस्ट -

ये काम बहुत ही कठिन होता है, बड़ा समय लगता है इसमें और अगर फ़िल्म में इस हिस्से पर ठीक से ध्यान ना दिया जाये तो फ़िल्म का एक प्रकार से प्रोजेक्ट का गला बैठ जाता है।

इस सीरीज़ में ध्वनि रिकॉर्डिंग (हीमांग पाली) और ध्वनि डिज़ाइन किया है नीरज रोहिला ने। बॉलीवुड फ़िल्म फौजा का ध्वनि डिज़ाइन नीरज ने ही किया था। नीरज रोहिला ने अपना काम बहुत प्रोफ़ेशनल और अच्छा किया। हिमांग पाली ने फ़िल्म का सारा ध्वनि रिकॉर्ड करके दिखा दिया कि एक अच्छे काम को करने में मेहनत और समय लगता है, जिसमें वो सफल रहे।

पृष्ठभूमि संगीत -

हमने पहले भी ज़िक्र किया कि किसी भी फ़िल्म का पृष्ठभूमि संगीत मायने रखता है कि वह दृश्य के हिसाब से दर्शक को जोड़ पाएगा या नहीं। इस सीरीज़ में पृष्ठभूमि संगीत ए ग्रेड है जो अंकित ने किया। सीरीज़ का पृष्ठभूमि संगीत ही है जो पहले दृश्य से लास्ट तक हमें जो जोड़े रखता है सीरीज़ के साथ।

गीत-संगीत -

जब किसी फ़िल्म या सीरीज़ के लिए सोमवीर कथूरवार की गायकी का चयन होता है तो प्रोजेक्ट वहीं से सफल बनता चला जाता है। “मान जांगी“ गीत को जिस सुर और संगीत से सोमवीर ने गाया बहुत अच्छा गाया। शीर्षक गीत से लेकर सीरीज़ में चल रहा रेप गीत (हम हैं बैड बॉयज़ भिवानी) वाह क्या कमाल का गाया है।

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श्रृंगार एवं परिधान -

सीरीज़ का श्रृंगार और परिधान भी बहुत अच्छा है। जब हम मीनू की माँ के सिर के बाल और चेहरे को देखते हैं तो और उनके परिधान और गेटअप परफ़ेक्ट नज़र आते हैं। साथ में मीनू के बाप के परिधान से लेकर घोड़ा तक के परिधान पर विशेष ध्यान दिया गया है।

कला निर्देशक -

पवन कौशिक यो कमाल का छोरा है। मेवात, स्कैम, छापा और अब बैड बॉयज़ भिवानी में अपना काम एक सफल तरीक़े से करके दिखा दिया। घोड़ा के अड्डे को जिस तरीक़े से डिज़ाइन किया है क्या ही कहना। उस कमरे में दीवार पर एक फ़ोटो लगी है जिसमें दो बंदूक़ है उस फ़ोटो से आप अंदाज़ा लगा लेंगे कि कला निर्देशक ने दृश्य के हिसाब से सेट डिज़ाइन तैयार किया जो बहुत अच्छा लगा। स्कूल में मीनू का एनकाउंटर और फिर मोबाइल पर लगी धूल बता रही है आर्ट वर्क को पवन ने बहुत अच्छा किया है। कला कार्य में बस एक-दो जगह कमी लगी। बकरी कटने के बाद खून का बहना। खून का रंग थोड़ा गहरा होना चाहिए था, जो लग रहा है कि कोई रंग पानी में बहाया जा रहा है। बाक़ी कुल मिलाकर सब ठीक था।

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कमी -

फ़िल्म में भिवानी शहर को और तलाश करके दिखाना चाहिए था, जो डायरेक्टर नहीं कर पाये।

इस सीरीज़ से हमें क्या सीखने को मिलेगा? एक अपराधी गुंडा बदमाश की ज़िंदगी बहुत छोटी होती है। मौत उसके सिर पर मंडराये रहती है। मतलब अपराध की दुनिया में सब कुछ काला होता है।

सीरीज़ के डायरेक्टर विपन मलावत और ओम कौशिक फ़िल्म और रामफल ब्रदर ने साबित किया है कि हरियाणा में काम को किस तरीक़े से कर सकते हैं। किसी भी चीज़ में कमी नहीं लगी। इस फ़िल्म का पृष्ठभूमि संगीत और ध्वनि डिज़ाइन से लेकर परिधान तक सब अच्छा था। साथ ही तारीफ़ करूँगा पुलिस विभाग की कास्टिंग की – “वीरू चौधरी और मनीष बिश्ला। पूरी सीरीज़ में ये पात्र ऐसे हैं जो बार-बार आपका ध्यान अपनी ओर खींच लेते हैं। चाहे फिर इनकी बॉडी लैंग्वेज हो या फिर इनके मुँह से निकला हुआ एक-एक संवाद। इसे कहते हैं प्रोफ़ेशनल काम
छायांकन से लेकर श्रृंगार तक जो भी काम है सब एकदम अच्छा है। मतलब यूँ कह सकते हैं कुछ छोटी-मोटी चीज़ों को छोड़कर सब अच्छा रहा। ये है एक प्रोफ़ेशनल काम की परिभाषा।

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