"सतरंगी" - समाज को आइना दिखाती एक बेटी की कहानी: निर्देशक संदीप शर्मा की ज़ुबानी

फिल्म सतरंगी एक पिता और बेटी के रिश्ते पर आधारित एक बेहद भावनात्मक कहानी है। इस फिल्म में एक ऐसा विषय उठाया गया है, जो समाज में बहुत कम दिखाया जाता है – एक बेटी का अपने पिता के लिए त्याग और ज़िम्मेदारी। फिल्म में दिखाया गया है कि कैसे एक बेटी, अपनी शादी से पहले इस बात को लेकर चिंतित होती है कि उसके जाने के बाद उसका पिता अकेला न रह जाए। उसे पता चल जाता है कि उसका भाई अपने पिता को धोखा दे चुका है। ऐसे में वह खुद अपनी शादी को टाल देती है और कुछ समय अपने पिता के साथ बिताने का निर्णय लेती है। वह अपने पिता को मनाकर उनकी शादी करवाने की ठान लेती है ताकि जब वह घर से विदा हो, तो उसका पिता अकेला न रह जाए। इस कहानी का विचार मुझे समाज में देखे गए कुछ सच्चे मामलों से आया। मैंने देखा कि जब किसी पुरुष की पत्नी की मृत्यु हो जाती है, या फिर तलाक हो जाता है, तो समाज उसे किस नज़र से देखता है। कई बार बहुएँ अपने ससुर पर झूठे आरोप भी लगाती हैं। इन सभी घटनाओं को देखकर मुझे लगा कि इस विषय पर एक फिल्म बननी चाहिए, जो लोगों को सोचने पर मजबूर कर दे। इस फिल्म की कहानी मैंने खुद लिखी है। स्क्रीनप्ले और संवाद के लिए मैंने महिपाल सैनी को साथ लिया। उन्होंने भी कहानी में कुछ बेहद भावनात्मक और प्रभावशाली दृश्य जोड़े। यह एक सामाजिक विषय है, और मेरा उद्देश्य बेटियों को समाज के लिए एक मिसाल बनते दिखाना था। यह फिल्म दिखाती है कि एक बेटी भी अपने पिता की ज़िंदगी को संवार सकती है। फिल्म का बजट….., इसे मैं ‘काउंटलेस’ कहूंगा। इसमें मेरे दोस्तों और परिवार का भरपूर साथ रहा। सभी ने निःस्वार्थ भाव से इस फिल्म के लिए मेहनत की। सभी कलाकार मेरे साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े थे। मैंने किसी भी स्तर पर क्वालिटी से समझौता नहीं किया – न लोकेशन में, न तकनीक में और न ही कलाकारों की मेहनत में।
सतरंगी की शूटिंग हमने 16 दिनों में पूरी की। लोकेशन के तौर पर जींद, कालवा गांव और करनाल को चुना। इन जगहों पर बहुत ही शांतिपूर्ण तरीके से शूटिंग हुई, लेकिन एक किस्सा ऐसा रहा जिसे मैं कभी नहीं भूल सकता। कालवा गांव में जब हम एक शादी का सीन शूट कर रहे थे, तो गांव वालों ने अचानक सेट को तोड़ दिया। गांव के अंदर मेरे दोस्त का घर था। स्क्रिप्ट के अनुसार मुझे एक घर चाहिए था। मेरा दोस्त एक अमीर परिवार से था, उसका घर रिच लुक में था। उसे मैंने फिल्म में लड़के का घर दिखाया और वहीं उसी गांव में लड़की का घर भी दिखाना था। उस घर को मुझे बहुत सिंपल दिखाना था, क्योंकि यशपाल शर्मा (जो ‘परम’ – पिता का किरदार निभा रहे थे) का घर था, और दिखाना था कि एक अकेला इंसान घर कैसे मेंटेन कर सकता है।

sandeep sharma haryyanvi kalakar

जब मैं लड़के-लड़की की शादी का सीन शूट कर रहा था, उस सीन की तैयारी में पूरा दिन लग गया था। पूरा दिन हमने डेकोरेशन की थी (आर्ट डिपार्टमेंट में)। लेकिन जैसे ही हम रात को शूट करने गए, पूरा गांव इकट्ठा हो गया और फिल्म का पूरा सेट तोड़ दिया।

मैं खड़ा-खड़ा देख रहा था कि ये क्या हो रहा है। मेरे दोस्त गांव वालों से झगड़ने जा रहे थे। मैंने उन्हें रोका और कहा, “भाई, ये आपका गांव है, आपको यहीं रहना है। मैं तो दो-चार दिन में चला जाऊंगा। आपको अपने गांव वालों के साथ ही रहना है, लड़ाई मत करो।”

जब माहौल थोड़ा शांत हुआ, तो मैं खुद गांव वालों के पास गया और पूछा, “क्या दिक्कत हो गई? मैं तो 14 दिन से आपके गांव में शूटिंग कर रहा हूँ।”

interview

मैंने ये भी कहा, “अगर मेरी टीम की तरफ से कोई गलती हुई हो, तो बताइए।” तब उन्होंने एक ही सवाल किया, “आप एक ही गांव के लड़के और लड़की की शादी कैसे दिखा सकते हो?”

मैंने समझाया, “ऐसा नहीं है, कहानी में लड़का रोहतक का है, लड़की जींद की है। ये सिर्फ शूटिंग की सुविधा के लिए एक ही गांव में लोकेशन मिल गई थी, इसलिए यहां शूट कर रहे हैं। फिल्म में ऐसा नहीं दिखाया गया है।”

फिर उन्हें अपनी गलती का एहसास हुआ, और उन्होंने खुद ही कहा कि जो चीजें टूट गईं, उन्हें कैसे सही करें? इस तरह मुझे गांव के लोगों का भोलापन देखने को मिला।दरअसल, उन्होंने यह समझ लिया था कि हम एक ही गांव के लड़के और लड़की की शादी दिखा रहे हैं। उन्हें यह गलतफहमी हो गई थी, जबकि स्क्रिप्ट में लड़का रोहतक का और लड़की जींद की थी। यह सिर्फ शूटिंग की सुविधा के लिए हमने एक ही गांव में लोकेशन रखी थी।
इस घटना ने मुझे हरियाणा के लोगों का भोला-पन और संवेदनशीलता दिखा दी। यह मेरे लिए एक बेहद यादगार अनुभव था। कास्टिंग का अनुभव
जब मैंने स्क्रिप्ट लिखी थी, तो कुछ किरदार पहले से मेरे दिमाग में थे। लेकिन जब मैं जींद गया तो मुझे ‘माँ’ के किरदार के लिए कलाकार नहीं मिल रही थी। फिर मेरे एक दोस्त ने गीता अग्रवाल जी का सुझाव दिया, और उनकी मुलाकात के बाद मुझे लगा कि वही इस रोल के लिए उपयुक्त हैं।
यशपाल शर्मा जी ने ‘पिता’ का किरदार निभाया है। उनके बेटे के रोल के लिए यशपाल ने बताया अमित का नाम। 84 साल की एक महिला को दादी के रोल में मैने अपनी नानी को लिया, जो अपने आप में खास था। फिल्म में 90% कलाकार फ्रेशर थे — इन नए कलाकारों ने भी पहली बार कैमरे का सामना किया, और बेहद अच्छा काम किया। सतरंगी फिल्म का अनुभव बहुत शानदार रहा, जिसे मैं कभी नहीं भूल सकता।

फिल्म को सिनेमा में रिलीज किया गया। कुल 19 स्क्रीन मिलीं। शुरू में कहा गया था कि फिल्म को 36 स्क्रीन मिलेंगी, लेकिन बाद में 19 ही मिल सकीं।

फिल्म की रिलीज को लेकर हमारा प्लान यही था कि इसे अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाया जाए। इसकी अच्छी मार्केटिंग की गई। स्कूल, कॉलेज में जाकर प्रचार किया गया। फिल्म जिस महीने में रिलीज की गई, वह समय भी ठीक था।

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