रिव्यू- गंभीर और संवेदनशील ‘नचार’
राज्य प्रदर्शन एवं दृश्य कला विश्वविद्यालय (SUPVA) के विद्यार्थियों जब भी कोई परियोजना बनाते हैं, तो उन्हें देखना एक अलग ही अनुभव होता है। इन छात्रों के अंदर जो जुनून और मेहनत होती है, वो उनकी फ़िल्मों में साफ़ नज़र आता है। तकनीकी दृष्टि से उनकी फ़िल्में बेहद मज़बूत होती हैं। मलाल और 1600 मीटर जैसे सफल प्रोजेक्ट इसके उदाहरण हैं। इसी क्रम में हरियाणा फ़िल्म महोत्सव में एक हरियाणवी लघु फ़िल्म नचार देखने का मौक़ा मिला। चेतन शर्मा और नेना द्वारा निर्देशित यह फ़िल्म तकनीकी रूप से महोत्सव की श्रेष्ठ फ़िल्मों में गिनी जा सकती है।
कहानी और विषयवस्तु :-
फ़िल्म की कहानी हरियाणा की लोक विधा सांग-रागनी (सांगी) के एक कलाकार के जीवन पर आधारित है। इन कलाकारों का जीवन कई प्रकार की परेशानियों और संघर्षों से भरा होता है। हरियाणा की इस परंपरागत कला को जीवित रखने में इन कलाकारों की अहम भूमिका है। सांग में एक पुरुष कलाकार महिला का किरदार निभाता है। लोग इस पर ताने कसते हैं “औरत बनता है सांग में” पर कोई उनकी पीड़ा नहीं समझता। फ़िल्म इस आंतरिक संघर्ष और समाज की आलोचना को बहुत मार्मिक तरीके से दर्शाती है। चेतन शर्मा ने इस गंभीर और संवेदनशील विषय को गहराई से उठाया है। सांग-रागनी विधा हरियाणा की एक लोकनाट्य और लोकसंगीत परंपरा है, जो इस राज्य की सांस्कृतिक पहचान का एक अहम हिस्सा मानी जाती है।
निर्देशन और पटकथा -
फ़िल्म का पहला दृश्य ही गाँव की एक जबरदस्त अनुभूति देता है। कुएँ पर पानी भरती आरती (नेना शर्मा) और आसपास का वातावरण। आरती का टोकनी में पानी डालना, हर बारीकी को ध्यान में रखकर फ़िल्माया गया है।
एक दृश्य में भारत (चेतन शर्मा) का अंधे कमरे में साथी कलाकार के साथ कुछ अजीब हरकतें करना और आरती का उसे देखकर अपनी सोच में उलझना, यह सब भावनात्मक रूप से बहुत सशक्त था। आरती का अपने पति के हाथ से लिपस्टिक लेकर उसे अपने होठों पर लगाना, उसके मन में उपजी हुई शंका और संघर्ष को बख़ूबी दर्शाता है।
फ़िल्म का पटकथा बहुत सधा हुआ और मज़बूत है। कहीं कोई कमी नज़र नहीं आती। सहायक निर्देशक के रूप में तरुण गोड (Tarun GOD) ने अपने कार्य को बख़ूबी अंजाम दिया है। फ़िल्म के हर दृश्य में समय-निर्धारण, सामंजस्य और तकनीकी सहयोग इतना सटीक है कि साफ़ महसूस होता है कि पृष्ठभूमि में एक मज़बूत टीम काम कर रही है, और उसमें तरुण गोड की भूमिका महत्वपूर्ण रही है। उन्होंने निर्देशन की जिम्मेदारियों को बख़ूबी निभाया है और मुख्य निर्देशक का दृष्टिकोण सही तरीके से परदे तक पहुँचाया है।
फ़िल्म नचार की शुरुआत जिस तरह से होती है, वहीं से छायांकन निर्देशक मुनीश पराशर के काम का स्तर समझ में आ जाता है। पहला दृश्य कुएँ पर पानी भरती आरती (नेना) से शुरू होता है, जहाँ पास बैठी औरतें उस पर टिप्पणी कर रही हैं। इस दृश्य की मिड वाइड, क्लोज़ शॉट्स और औरतों के स्थिर शॉट्स, सभी को कैमरा कोणों के ज़रिए बेहद वास्तविक और स्वाभाविक ढंग से दिखाया गया है। यहाँ से साफ़ झलकता है कि मुनीश पराशर ने अपने कैमरे से कहानी कहने का काम किया है, न कि सिर्फ़ शॉट रिकॉर्ड करने का। कोई भी शॉट ऐसा नहीं लगता जिसमें गुणवत्ता या दृश्य भाषा के स्तर पर कोई कमी छोड़ी गई हो।
समय 05:32 पर भारत (चेतन शर्मा) और आरती के अलग-अलग बैठे हुए दृश्य में एक जलती हुई मोमबत्ती दिखाई देती है, जो कुछ सेकंड में बुझ जाती है। यह दृश्य बेहद भावुक और प्रतीकात्मक है, और इसे जिस भावनात्मक गहराई से शूट किया गया है, वह इस बात का प्रमाण है कि मुनीश पराशर सिर्फ़ तकनीकी रूप से नहीं बल्कि संवेदनशीलता के स्तर पर भी माहिर हैं। समय 07:14 पर रागनी गेट टाइम मंच पर जो दृश्य है, वह फ़िल्म की पूरी शूटिंग को एक नई ऊँचाई देता है। यह दृश्य ख़ास तौर पर दर्शाता है कि कैमरा मूवमेंट और फ़्रेमिंग के ज़रिए दृश्य को कैसे अधिक प्रभावशाली बनाया जा सकता है। 04:29 पर फ़र्श पर पड़े घुंघरू का क्लोज़ शॉट लिया गया है जो दर्शकों के मन में तुरंत एक भावनात्मक संबंध बना देता है।
यह एक छोटा लेकिन बेहद ध्यान देने वाला विवरण है, जिसे पूरी परिपूर्णता के साथ शूट किया गया है।
कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि नचार में हर दृश्य, हर फ़्रेम और हर कोण को बहुत सोच-समझकर शूट किया गया है। छायांकन निर्देशक मुनीश पराशर का काम न केवल तकनीकी रूप से मज़बूत है बल्कि फ़िल्म की भावनात्मक परतों को भी बख़ूबी उजागर करता है। किसी भी दृश्य में कैमरा कार्य के स्तर पर कोई ख़ास कमी नज़र नहीं आती। इस पूरी प्रक्रिया में उनके साथ काम कर रही टीम राहुल राजपूत, रोहित और प्रवेश शर्मा ने भी अपनी जिम्मेदारियाँ बहुत अच्छे से निभाईं।
निर्देशन और पटकथा -
नचार की एक और मज़बूत कड़ी है इसकी कास्टिंग। जिस तरह हर किरदार को उनके व्यक्तित्व के अनुसार चुना गया है, वह दर्शाता है कि कास्टिंग टीम ने सिर्फ़ चेहरे नहीं चुने, बल्कि कहानी के लिए सही आत्मा वाले कलाकारों को चुना है। नेना (आरती), भारत (चेतन शर्मा) और अन्य सह-कलाकारों की कास्टिंग बेहद सटीक और स्वाभाविक है। नेना का सौम्य, गहराई भरा अभिनय और भारत का संवेदनशील, जुझारू किरदार दोनों ही अपने रोल में इस तरह ढल जाते हैं कि लगता ही नहीं कि वे कैमरे के सामने अभिनय कर रहे हैं। यह सटीक कास्टिंग का सबसे बड़ा प्रमाण है। सांग-रागनी मंडली के कलाकार भी ऐसे लगे जैसे सच में किसी हरियाणवी लोकमंच से उठाकर फ़िल्म में रख दिए गए हों। उनकी बोली, हाव-भाव और पहनावा इतना वास्तविक लगा कि दर्शक खुद को पूरी तरह उस परिवेश में महसूस करता है। यह भी ख़ास बात है कि फ़िल्म में कहीं भी अतिनाटकीयता या अनुपयुक्त चयन देखने को नहीं मिलता। हर किरदार अपनी जगह पर सही बैठता है, और वह कहानी को आगे बढ़ाने में मदद करता है, रुकावट नहीं बनता। इसका श्रेय सीधे तौर पर जाता है कास्टिंग निर्देशक को, जिनका चयन बहुत सोच-समझकर किया गया लगता है।
प्रकाश व्यवस्था और ध्वनि सामंजस्य-
इस अनुभव को जीवंत बनाने में प्रकाश व्यवस्था और ध्वनि सामंजस्य की भूमिका बेहद अहम है। फ़िल्म की तकनीकी टीम ने हर दृश्य को इतना सटीक और भावनात्मक रूप से संतुलित ढंग से प्रस्तुत किया है कि हर फ़्रेम बोलता हुआ नज़र आता है। समय 06:08 पर जब नेना सुई से घुंघरू को कपड़े पर सिल रही होती है, उस दृश्य में पृष्ठभूमि में जो प्रकाश और ध्वनि प्रभावों का तालमेल रखा गया है, वो वाक़ई पेशेवर टीम की सोच और अनुभव को दर्शाता है। न सिर्फ़ सूक्ष्म ध्वनि की व्यवस्था बल्कि उस पर प्रकाश का सौम्य प्रभाव भी उस पल की भावनाओं को और गहरा कर देता है। समय 08:26 पर भारत और उसकी सहकर्मी सांगी (रागिनी) के बीच बहस वाला दृश्य प्रकाश व्यवस्था की उत्कृष्टता का एक और बेहतरीन उदाहरण है। उस दृश्य में रोशनी की छाया, तीव्रता और मूड के अनुसार उसका बदलाव यह सब दृश्य के भावनात्मक स्वर को पूरी तरह से उभार देता है। इस पूरी प्रक्रिया में प्रकाश व्यवस्था टीम सोनी, नरेंद्र, सुरिंदर और सुमित राजकुमार ने एकजुट होकर बेहतरीन काम किया है। इनका टीमवर्क साफ़ तौर पर परदे पर झलकता है, जहाँ हर दृश्य में रोशनी और ध्वनि का ऐसा तालमेल है जो दर्शक को कहानी के भीतर तक ले जाता है।
प्रकाश व्यवस्था और ध्वनि सामंजस्य-
फ़िल्म में हर किरदार का पहनावा न सिर्फ़ उसकी पृष्ठभूमि और चरित्र को उभारता है, बल्कि पूरी फ़िल्म के माहौल को भी गहराई देता है। सांग-रागनी मंडली की पोशाकें ख़ास तौर पर ध्यान खींचती हैं। उनके रंग-बिरंगे और पारंपरिक परिधान न केवल हर किरदार को अलग पहचान देते हैं, बल्कि हर प्रस्तुति में लोकसंस्कृति की झलक भी बख़ूबी दिखाते हैं। इससे साफ़ झलकता है कि परिधान टीम ने लोक जीवन और सांस्कृतिक संदर्भ को बारीकी से समझा है। फ़िल्म में सिर्फ़ मंडली ही नहीं, बल्कि हर एक किरदार की वेशभूषा चाहे वह नेना का सादा लेकिन प्रभावशाली लिबास हो, या भारत की ग्रामीण पृष्ठभूमि के अनुसार चुने गए कपड़े, सब कुछ बेहद स्वाभाविक और किरदार के अनुसार सटीक है। हर दृश्य में परिधान इस तरह से मेल खाता है कि वो न तो अधिक लगता है, और न ही कम। इससे यह भी समझ आता है कि परिधान डिज़ाइन सिर्फ़ दिखावे के लिए नहीं, बल्कि किरदारों की कहानी कहने का हिस्सा है।
अन्य पक्ष -
निर्देशक ने हर फ़्रेम में संवेदना और सच्चाई को इस तरह पिरोया कि कहानी दिल तक उतर जाती है। मुनीश पराशर की सिनेमैटोग्राफ़ी ने हर दृश्य को एक कविता की तरह कैमरे में कैद किया है।
प्रकाश और ध्वनि के मामले में प्रत्येक फ़्रेम में रोशनी और ध्वनि का तालमेल इतना सटीक है कि तकनीक ख़ुद में एक किरदार बन जाती है। परिधान के मामले में हर किरदार की पोशाक उसकी आत्मा की आवाज़ लगती है लोक-संस्कृति की खूबसूरत झलक। कला निर्देशन के मामले में सेट, रंग और उपकरणों की बारीकी इतनी सजीव है कि हर फ़्रेम दृश्य नहीं, अनुभव लगता है। कास्टिंग के मामले में हर कलाकार ऐसा चुना गया है जैसे किरदार ने ख़ुद अपना चेहरा तलाश लिया हो। पृष्ठभूमि संगीत तमन्या भुटानी का पृष्ठभूमि संगीत कहानी की धड़कनों में ऐसा घुलता है कि हर भावना और गहरा महसूस होता है। ध्वनि संयोजन के मामले में ध्वनि प्रभाव इतने सटीक और प्रभावशाली हैं कि दृश्य सिर्फ़ दिखते नहीं, गूंजते हैं।
