मिट्टी की गंध से उठती एक रचनात्मक यात्रा
कुछ व्यक्तित्व अपनी उपलब्धियों से नहीं, बल्कि अपनी यात्रा से पहचाने जाते हैं। नवरत्न पांडे ऐसे ही सृजनधर्मी व्यक्तित्व हैं, जिनका जीवन भारतीय ग्रामीण समाज, लोकसंस्कृति, शिक्षा, रंगमंच, साहित्य और जनसंचार की अनेक धाराओं को एक साथ जोड़ता है। वे उन विरल रचनाकारों में हैं जिन्होंने मंच को केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि समाज से संवाद का सशक्त उपकरण माना; साहित्य को केवल अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि लोकजीवन का दस्तावेज़ बनाया; और शिक्षा को मात्र पेशा नहीं, बल्कि संवेदनशील, रचनात्मक और संस्कारित मनुष्य के निर्माण का माध्यम समझा।
15 अगस्त 1969 को हरियाणा के ग्रामीण परिवेश में जन्मे नवरत्न पांडे के पिता श्री मनीराम भारतीय सेना में सेवारत थे। अनुशासन, कर्मनिष्ठा और राष्ट्रभाव उनके व्यक्तित्व की आधारशिला थे। उनकी माता श्रीमती गिंदौड़ी औपचारिक रूप से शिक्षित नहीं थीं, किंतु लोकगीतों की सहज समझ, जीवन के प्रति अद्भुत सकारात्मक दृष्टि, करुणा और प्रेम से परिपूर्ण थीं। बच्चों, पशु-पक्षियों और प्रकृति के प्रति उनका सहज अनुराग नवरत्न पांडे के व्यक्तित्व का पहला संस्कार बना। यही कारण है कि उनके साहित्य, रंगकर्म और शिक्षण-दर्शन में लोकजीवन, मानवीय संवेदना और सांस्कृतिक जड़ों की गहरी छाप दिखाई देती है।
उनकी प्रारंभिक शिक्षा गाँव के राजकीय माध्यमिक विद्यालय, रावलधी में हुई, जहाँ से उन्होंने वर्ष 1983 में मिडिल परीक्षा उत्तीर्ण की। इसके बाद वैश्य हाई स्कूल, चरखी दादरी से वर्ष 1985 में मैट्रिक की शिक्षा प्राप्त की। उच्च माध्यमिक शिक्षा राजकीय महाविद्यालय, भिवानी से तथा स्नातक की पढ़ाई जनता कॉलेज, चरखी दादरी से पूरी की। ज्ञान-पिपासा ने उन्हें निरंतर आगे बढ़ाया। उन्होंने महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय, रोहतक से पत्रकारिता एवं जनसंचार में स्नातकोत्तर (एम.ए. मास कम्युनिकेशन), उस्मानिया विश्वविद्यालय, हैदराबाद से हिन्दी साहित्य में एम.ए., कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय से हिन्दी में एम.फिल. तथा भगवान वर्धमान महावीर खुला विश्वविद्यालय, कोटा से एम.ए. (शिक्षा) की उपाधियाँ प्राप्त कीं। उनके लिए शिक्षा केवल डिग्रियाँ अर्जित करने का माध्यम नहीं, बल्कि आजीवन सीखते रहने का संकल्प रही है।
उनकी जीवनयात्रा का सबसे प्रेरक पक्ष उनका संघर्ष है। आठवीं कक्षा के बाद उन्होंने अपनी लगभग पूरी शिक्षा स्वयं अर्जित किए गए संसाधनों से पूरी की। मंचीय प्रस्तुतियों, सांस्कृतिक कार्यक्रमों और छोटे-बड़े कार्यों से प्राप्त पारिश्रमिक से उन्होंने अपनी फीस भरी और अपनी पढ़ाई जारी रखी। कॉलेज के दिनों में उन्होंने अनेक पार्ट-टाइम कार्य किए। स्नातक के दौरान निजी विद्यालयों में अध्यापन किया, दूरसंचार क्षेत्र में एक ठेकेदार की कंपनी के साथ लैंडलाइन नेटवर्क स्थापित करने के कार्य में सहयोग दिया और एक निजी एजेंसी के माध्यम से लक्स अंडरवियर एवं बनियान के प्रचार अभियानों में मंचीय कलाकार के रूप में भी कार्य किया। यह संघर्ष उनके लिए अभाव की कहानी नहीं, बल्कि आत्मनिर्भरता, आत्मविश्वास और कर्मशीलता की पाठशाला था।
रंगमंच से उनका परिचय बचपन में ही हो गया था। प्राथमिक कक्षा में स्वागत-गीत और रागनी की प्रस्तुति के साथ उन्होंने पहली बार मंच पर कदम रखा। उसी दिन मंच से बना उनका रिश्ता जीवनभर का साथ बन गया। विद्यालय और महाविद्यालय के वर्षों में समूहगान, कव्वाली, स्किट और माइम जैसी विधाओं में उनकी सक्रिय भागीदारी रही। राजकीय महाविद्यालय, भिवानी के युवा महोत्सवों ने उनकी प्रतिभा को नई उड़ान दी। जोनल और अंतर-जोनल प्रतियोगिताओं में लगातार सफलता ने उन्हें विश्वविद्यालय स्तर तक पहुँचाया।
स्नातक के अंतिम वर्ष में महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय की राज्य स्तरीय स्किट प्रतियोगिता में उन्हें श्रेष्ठ अभिनेता (Best Actor) का सम्मान प्राप्त हुआ। यही उनके रंगजीवन का निर्णायक मोड़ सिद्ध हुआ। अभिनय के साथ-साथ उन्होंने नाटक-लेखन आरंभ किया। आर्थिक कठिनाइयों के बावजूद उन्होंने विभिन्न महाविद्यालयों में युवा महोत्सवों के निर्देशक के रूप में कार्य किया और लगातार तीन वर्षों तक उनके निर्देशित माइम विश्वविद्यालय स्तर पर अनुशंसित हुए। मूक अभिनय जैसी कठिन विधा में उन्होंने अपनी विशिष्ट पहचान स्थापित की।
रंगमंच के प्रति उनका समर्पण इतना गहरा था कि स्नातक के दिनों में वे चरखी दादरी से स्कूटर अथवा मोटरसाइकिल पर लंबी यात्राएँ कर राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (NSD), नई दिल्ली में नाटक देखने जाया करते थे। रंगमंच उनके लिए केवल कला नहीं, बल्कि जीवन का विश्वविद्यालय था। बाद में इसी साधना को उन्होंने औपचारिक रूप देते हुए राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से प्रतिष्ठित थिएटर एप्रीशिएशन कोर्स भी किया।
पत्रकारिता एवं जनसंचार की शिक्षा ने उनकी अभिव्यक्ति को नई दृष्टि दी, जबकि हिन्दी साहित्य के गंभीर अध्ययन ने उनके लेखन को वैचारिक गहराई प्रदान की। विश्वविद्यालय जीवन में उन्होंने हिन्दी नाटक, स्किट और माइम की राज्य एवं राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में अनेक पुरस्कार प्राप्त किए। राजस्थान विश्वविद्यालय में आयोजित प्रतिष्ठित घूमर–96 युवा महोत्सव में उन्हें पुनः श्रेष्ठ अभिनेता सहित अनेक सम्मान प्राप्त हुए। इसी दौर में उनकी साहित्यिक चेतना भी परिपक्व हुई और उन्होंने मंच के साथ-साथ लेखन को भी अपने जीवन का स्थायी माध्यम बना लिया।
रंगमंच के समानांतर उन्होंने हरियाणवी फिल्मों और डिजिटल माध्यमों में भी उल्लेखनीय कार्य किया। चाल्या तू प्रदेश, साजन मेरे जैसी फिल्मों से लेकर मेरे यार की शादी–2, ओटीटी मंच पर प्रदर्शित थारा फूफा ज़िंदा है, अग्निवीर तथा चर्चित वेब सीरीज़ Bad Boys Bhiwani (BBB) सहित अनेक परियोजनाओं में उन्होंने अभिनय किया। वर्तमान में भी वे विभिन्न फिल्म और डिजिटल प्रोजेक्ट्स से जुड़े हुए हैं।
शिक्षण सेवा में आने के बाद उन्होंने विद्यालयी रंगमंच को सामाजिक परिवर्तन का माध्यम बनाया। हरियाणा शिक्षा विभाग में हिन्दी प्रवक्ता के रूप में नियुक्ति के बाद उन्होंने विद्यार्थियों के लिए अनेक नाटक लिखे, उनका निर्देशन किया और मंचन करवाया। उनका चर्चित हरियाणवी नाटक “चेत सकै तो चेत” लगभग 101 बार मंचित हुआ। यह केवल एक नाटक नहीं था, बल्कि सामाजिक चेतना का जन-अभियान बन गया।
साहित्य उनके व्यक्तित्व का दूसरा सशक्त आधार है। हरियाणवी लोकजीवन, बदलते ग्रामीण समाज, मानवीय संबंधों और सांस्कृतिक संक्रमण को उन्होंने अपनी कहानियों, नाटकों और लेखों में सजीव रूप दिया। उनके लेख, फीचर और रचनाएँ अनेक समाचार-पत्रों एवं प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रही हैं। हरियाणवी लोकसंस्कृति और लोकभाषा पर उनके कार्यक्रम आकाशवाणी तथा दूरदर्शन से प्रसारित हुए। वे दूरदर्शन हिसार के बी-हाई कलाकार के रूप में भी पंजीकृत रहे। राष्ट्रीय माइम महोत्सव, कोलकाता में निर्देशक के रूप में हरियाणा का प्रतिनिधित्व करना उनके रंगकर्म की एक और उल्लेखनीय उपलब्धि है।
अब तक उनकी सात पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें तीन कहानी-संग्रह, एक उपन्यास, एक नाटक-संग्रह, एक ग़ज़ल-गीत संग्रह तथा अन्य रचनात्मक कृतियाँ शामिल हैं। उनकी चर्चित हरियाणवी कहानी “भैत्तर हज़ार की भोड़िया” को व्यापक सराहना मिली और उसके फिल्म निर्माण अधिकार खरीदे गए। उनके नाटक-संग्रह “साइबर छोहरा और अन्य नाटक” को वर्ष 2023 का श्रेष्ठ कृति सम्मान प्राप्त हुआ।
वर्तमान में नवरत्न पांडे हरियाणा के जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान (डाइट), बिरही कलां, चरखी दादरी में सह-आचार्य (Associate Professor) के रूप में कार्यरत हैं। शिक्षक-प्रशिक्षण, भाषा-शिक्षण, शैक्षिक नवाचार, शिक्षा में रंगमंच के प्रयोग, रचनात्मक लेखन और हरियाणवी लोकसंस्कृति के संरक्षण एवं संवर्धन के क्षेत्र में उनका कार्य निरंतर जारी है। वे शिक्षा और संस्कृति के बीच एक सशक्त सेतु के रूप में नई पीढ़ी को संवेदनशील, सृजनशील और सामाजिक रूप से उत्तरदायी बनाने के लिए निरंतर कार्यरत हैं।
नवरत्न पांडे की जीवनयात्रा इस विश्वास को पुष्ट करती है कि महान रचनात्मकता किसी महानगर की देन नहीं होती; उसका जन्म अक्सर उन छोटे-से गाँवों में होता है, जहाँ मिट्टी की गंध, लोकगीतों की लय, माँ की संवेदना, पिता का अनुशासन, संघर्ष की तपिश और सपनों का साहस मिलकर एक व्यक्तित्व का निर्माण करते हैं। वे आज भी स्वयं को किसी उपलब्धि का अंतिम पड़ाव नहीं, बल्कि सीखने, सृजन करने और समाज से निरंतर संवाद बनाए रखने वाली एक सतत यात्रा मानते हैं। यही उनकी सबसे बड़ी पहचान है, और यही उनके समूचे रचनात्मक जीवन का सार भी।
