सफलता का सबसे बड़ा मंत्र है मेहनत
जन्म: 25 मई 1979
जन्मस्थान: सिवाहा गांव, जिला जींद, हरियाणा।
हरियाणवी रंगमंच और सिनेमा की दुनिया में रमेश मूर्ति एक ऐसा नाम हैं, जिन्होंने अपनी मेहनत, लगन और अभिनय के प्रति समर्पण के बल पर एक विशिष्ट पहचान बनाई है। लगभग 26 वर्षों से रंगमंच और अभिनय के क्षेत्र में सक्रिय रमेश मूर्ति ने मंच, सिनेमा और ओटीटी प्लेटफॉर्म—तीनों माध्यमों में अपनी सशक्त अभिनय क्षमता का परिचय दिया है। उनका मानना है कि “सफलता का सबसे बड़ा मंत्र है—मेहनत, मेहनत और लगातार मेहनत।” रमेश मूर्ति का अभिनय सफर बचपन से ही शुरू हो गया था। स्कूल के दिनों में एक स्किट में उन्होंने महात्मा गांधी की भूमिका निभाई, जिसे खूब सराहा गया। गांव में सांग और फिल्में देखने का उन्हें इतना शौक था कि कई बार वे स्कूल से छुट्टी लेकर भी सांग देखने चले जाते थे। दसवीं की परीक्षा के बाद उन्होंने अपना स्वयं का नाटक समूह बनाया और अनेक नाटकों का मंचन किया। परिवार और गांव के लोगों ने उनके अभिनय को सराहा, जिसने उनके भीतर एक अभिनेता बनने का आत्मविश्वास जगाया।रमेश बताते हैं कि रंगमंच ने उन्हें केवल अभिनय ही नहीं सिखाया, बल्कि जीवन को समझने और लोगों को पहचानने की दृष्टि भी दी। उनके अनुसार, “रंगमंच ही एक कलाकार का परिवार और उसकी दुनिया होता है।” वे मानते हैं कि थिएटर से जुड़ने के बाद इंसान का दुनिया को देखने का नजरिया बदल जाता है।
अपने अभिनय करियर में रमेश मूर्ति ने ‘अखाड़ा’, ‘सांगी’, ‘कांड 2010’, ‘अग्निवीर’, ‘लाइसेंस’, ‘पितरोष’, ‘ढाई दिन’ और ‘बारहवीं वाला प्यार’ जैसी फिल्मों एवं वेब सीरीज़ में प्रभावशाली भूमिकाएँ निभाईं। ‘सांगी’ में निभाया गया ‘नानू’ का किरदार तथा ‘अखाड़ा’ में ‘वीरभान’ का पात्र उनके सबसे प्रिय और चर्चित किरदारों में शामिल हैं। इन भूमिकाओं ने उन्हें हरियाणवी सिनेमा में एक सशक्त अभिनेता के रूप में स्थापित किया। रमेश मूर्ति किसी भी किरदार को निभाने से पहले निर्देशक के साथ विस्तार से चर्चा करते हैं। वे पात्र की उम्र, शारीरिक बनावट, सामाजिक परिवेश, आदतों, समय और मानसिक स्थिति को गहराई से समझने का प्रयास करते हैं। उनका मानना है कि किसी भी किरदार को जीवंत बनाने के लिए उसके मनोविज्ञान को समझना सबसे आवश्यक होता है। रंगमंच और कैमरे के सामने अभिनय के अंतर पर वे कहते हैं कि मंच पर कलाकार को दर्शकों की प्रतिक्रिया तुरंत मिल जाती है, जिससे उसका आत्मविश्वास बढ़ता है। वहीं कैमरे के सामने कलाकार पूरी तरह अपने अभिनय और निर्देशक के निर्देशन पर निर्भर होता है। इसलिए कैमरे के सामने अभिनय में अधिक एकाग्रता और धैर्य की आवश्यकता होती है। रमेश मूर्ति का मानना है कि समाज से जुड़े यथार्थवादी किरदार निभाना किसी भी अभिनेता के लिए सबसे बड़ा संतोष होता है। ऐसी फिल्में केवल मनोरंजन ही नहीं करतीं, बल्कि समाज को सकारात्मक संदेश भी देती हैं। इसी कारण वे हमेशा सामाजिक विषयों पर आधारित फिल्मों का हिस्सा बनने को प्राथमिकता देते हैं। उन्होंने स्टेज ऐप और सुपवा (SUPVA) के साथ भी कार्य किया है। इस दौरान उन्हें अनेक अनुभवी कलाकारों और निर्देशकों के साथ काम करने तथा नए अनुभव प्राप्त करने का अवसर मिला। उनका मानना है कि हरियाणवी सिनेमा अभी विकास के प्रारंभिक दौर में है और इसे राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने के लिए कलाकारों, निर्माताओं और निर्देशकों को मिलकर और अधिक मेहनत करनी होगी।
हरियाणवी सिनेमा के विकास में ‘दादा लखमी’ फिल्म को वे एक मील का पत्थर मानते हैं। उनके अनुसार, इस फिल्म ने हरियाणवी फिल्मों के प्रति लोगों की सोच बदली और क्षेत्रीय सिनेमा को नई दिशा प्रदान की। लगभग ढाई दशक के संघर्षपूर्ण सफर को याद करते हुए रमेश कहते हैं कि जीवन में अनेक उतार-चढ़ाव आए, लेकिन उन्होंने कभी मेहनत का साथ नहीं छोड़ा। रंगमंच ने उन्हें सम्मान, पहचान और जीवन को समझने की दृष्टि दी। उनका विश्वास है कि हरियाणा का रंगमंच और हरियाणवी सिनेमा आने वाले वर्षों में नई ऊँचाइयों को अवश्य छुएगा। रमेश मूर्ति के आगामी प्रोजेक्ट्स में ‘मिसिंग’ और ‘मितवा तोड़-फोड़ कंपनी’ शामिल हैं। उन्हें विश्वास है कि इन दोनों परियोजनाओं में दर्शकों को उनका एक नया और प्रभावशाली अभिनय देखने को मिलेगा। युवाओं के लिए उनका संदेश स्पष्ट है—अधिक से अधिक साहित्य पढ़ें, कविताएँ पढ़ें, नाटक पढ़ें, अच्छी फिल्में देखें और रंगमंच से अवश्य जुड़ें। उनका मानना है कि अभिनय सीखने का सबसे प्रभावी माध्यम थिएटर है। अंत में वे यही कहते हैं— “सफलता का सबसे बड़ा मंत्र है—मेहनत, मेहनत और लगातार मेहनत। हर युवा को जीवन में कम-से-कम एक बार रंगमंच से अवश्य जुड़ना चाहिए।”
