प्रो. महासिंह

"हरियाणा की लोक संस्कृति के सशक्त संरक्षक प्रो. महासिंह पूनिया।

हरियाणा की लोक संस्कृति, सांस्कृतिक विरासत,  हिंदी भाषा और संग्रहालय आंदोलन के संरक्षण एवं संवर्धन की समकालीन यात्रा में प्रो. महासिंह पूनिया का नाम अत्यंत सम्मान और विश्वसनीयता के साथ लिया जाता है। एक शिक्षक, शोधकर्ता, प्रशासक, सांस्कृतिक चिंतक तथा धरोहर-संरक्षक के रूप में उन्होंने शिक्षा, शोध, जनसंचार, लोक साहित्य और सांस्कृतिक संरक्षण के विविध क्षेत्रों में उल्लेखनीय एवं स्थायी योगदान दिया है अपने दूरदर्शी नेतृत्व, शोधपरक दृष्टि और सतत सांस्कृतिक साधना के माध्यम से उन्होंने न केवल हरियाणा की लोक परंपराओं के संरक्षण का महत्वपूर्ण कार्य किया, बल्कि उन्हें राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान भी दिलाई। संग्रहालयों की स्थापना, लोक साहित्य के प्रलेखन, सांस्कृतिक धरोहरों के संरक्षण तथा हिंदी भाषा के संवर्धन में उनका योगदान उन्हें समकालीन हिंदी जगत और सांस्कृतिक विमर्श के अग्रणी विद्वानों की पंक्ति में स्थापित करता है। प्रो. महासिंह पूनिया का व्यक्तित्व शिक्षा, संस्कृति और समाज के बीच एक सशक्त सेतु के रूप में प्रतिष्ठित है। उनकी शैक्षणिक उपलब्धियाँ, प्रशासनिक दक्षता, शोधपरक दृष्टि और सांस्कृतिक प्रतिबद्धता उन्हें बहुआयामी व्यक्तित्व के रूप में विशिष्ट पहचान प्रदान करती हैं। प्रस्तुत परिचय उनके शैक्षणिक, प्रशासनिक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक अवदानों का समग्र परिचय प्रस्तुत करता है।

वर्तमान पद एवं दायित्व

प्रो. महासिंह पूनिया वर्तमान में कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, कुरुक्षेत्र के हिंदी विभाग के अध्यक्ष हैं। वे इंस्टीट्यूट ऑफ इंटीग्रेटिड एंड ऑनर्स स्टडीज में हिंदी के प्रोफेसर के रूप में कार्यरत हैं। इसके अतिरिक्त वे जनसंचार एवं प्रौद्योगिकी संस्थान तथा लोक संपर्क विभाग, कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के निदेशक का दायित्व भी निभा रहे हैं वे राष्ट्रीय एवं राज्य स्तर की अनेक महत्वपूर्ण संस्थाओं से सक्रिय रूप से जुड़े हुए हैं  वे हिंदी अकादमी, राष्ट्रीय साहित्य संस्थान, नई दिल्ली की कार्यकारिणी के सदस्य तथा साहित्य अकादमी, राष्ट्रीय साहित्य संस्थान, नई दिल्ली के हिंदी परामर्श मंडल के सदस्य हैं। साथ ही वे हरियाणा पर्यटन विभाग के ज्योतिसर संग्रहालय हेतु कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के नोडल अधिकारी हैं। इसके अतिरिक्त वे हरियाणवी भाषा एवं संस्कृति संवर्धन संस्थान, महर्षि वाल्मीकि संस्कृत विश्वविद्यालय, कैथल; महर्षि दयानन्द विश्वविद्यालय, रोहतक के हेरिटेज विलेज स्थापना प्रकल्प; अवधारणा समिति स्मारक-1857, अम्बाला तथा विरासत-दि हेरिटेज विलेज, कुरुक्षेत्र के सदस्य भी हैं। 

शैक्षणिक योग्यता

प्रो. पूनिया का शैक्षणिक जीवन अत्यंत उत्कृष्ट एवं बहुआयामी रहा है। उन्होंने वर्ष 1997 में कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय से हिंदी विषय में पीएच.डी. की उपाधि प्राप्त की। इससे पूर्व वर्ष 1994–95 में प्रथम श्रेणी से हिंदी में एम.ए. किया। जनसंचार एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में भी उन्होंने उच्च शिक्षा प्राप्त करते हुए वर्ष 2001 में स्नातकोत्तर डिप्लोमा तथा वर्ष 2002 में प्रथम श्रेणी से एम.ए. की उपाधि अर्जित  की संस्कृति एवं धरोहर संरक्षण के क्षेत्र में रुचि के कारण उन्होंने वर्ष 2007 में भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय से चित्रकला संरक्षण में ‘ए’ ग्रेड के साथ डिप्लोमा प्राप्त किया। इसके पश्चात वर्ष 2011 में कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय से प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्व विषय में प्रथम श्रेणी से एम.ए. किया। नेतृत्व क्षमता के विकास हेतु उन्होंने ब्रिटिश काउंसिल, लंदन (यू.के.) से एडवांस लीडरशिप डिप्लोमा भी प्राप्त किया।

पूर्व प्रशासनिक दायित्व

प्रो. महासिंह पूनिया ने विश्वविद्यालय में अनेक महत्वपूर्ण प्रशासनिक दायित्वों का सफलतापूर्वक निर्वहन किया है। वे वर्ष 2025–2026 में जनसंचार एवं मीडिया प्रौद्योगिकी संस्थान के निदेशक रहे। इससे पूर्व वे वर्ष 2009–2010, 2014–2016 तथा 2020–2024 तक युवा एवं सांस्कृतिक विभाग के निदेशक रहे। वर्ष 2014 में उन्होंने ‘1857 : हरियाणा संग्रहालय’ के क्यूरेटर के रूप में कार्य किया तथा वर्ष 2013–14 में गुलज़ारीलाल नंदा स्मारक, कुरुक्षेत्र के क्यूरेटर का दायित्व भी संभाला।

लोक साहित्य एवं संस्कृति संबंधी शोध परियोजनाएँ

लोक साहित्य, लोक संस्कृति तथा सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण एवं प्रलेखन के क्षेत्र में प्रो. पूनिया का उल्लेखनीय योगदान रहा है। उन्होंने वर्ष 2013 में हरियाणा साहित्य अकादमी, पंचकूला के सहयोग से हरियाणा की लोक  व्यावसायिक शब्दावली शोध परियोजना पूर्ण की  इसी वर्ष हिंदी साहित्य अकादमी, नई दिल्ली के सहयोग से ‘1800 से 1947 :स्वतंत्रता संग्राम का हिंदी  साहित्य – एक संकलन परियोजना का संपादन एवं संचालन किया। वर्ष 2014 से 2026 तक वे केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा की महत्त्वपूर्ण परियोजना  विश्व हिंदी कोष : हरियाणा की सांस्कृतिक  धरोहर से जुड़े रहे। वर्ष 2015–16 में उन्होंने लोककला सांझी : एक मूल्यांकन परियोजना का सफल संचालन किया तथा वर्ष 2016–17 में ललित कला अकादमी, नई दिल्ली के सहयोग से हरियाणवी लोक कला की डॉक्यूमेंटेशनपरियोजना का नेतृत्व किया। शिक्षण, शोध, प्रशासन,जनसंचार, लोक साहित्य, संस्कृति एवं सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण के क्षेत्रों में प्रो. महासिंह पूनिया का योगदान उल्लेखनीय एवं बहुआयामी है। उनके कार्यों ने हिंदी भाषा, हरियाणवी लोक संस्कृति तथा भारतीय सांस्कृतिक परंपरा के संरक्षण, संवर्धन और प्रसार को नई दिशा प्रदान की है।

संस्कृति के विकास में योगदान

1. धरोहर हरियाणा संग्रहालय की स्थापना

धरोहर हरियाणा संग्रहालय की  अवधारणा, परामर्श एवं स्थापना में प्रो. महासिंह पूनिया का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। संग्रहालय के लिए आवश्यक विषय-वस्तुओं के संकलन हेतु उन्होंने हरियाणा के प्रत्येक गाँव का भ्रमण किया और धरोहर हरियाणा संग्रहालय को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वर्ष 2005 से 2016 तक उन्होंने लगभग 6 लाख किलोमीटर की यात्रा कर 20 हजार से अधिक सांस्कृतिक विषय-वस्तुओं का संकलन किया तथा एक अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत किया। उन्होंने लगभग एक हजार पांडुलिपियों का संकलन कर उन्हें धरोहर हरियाणा संग्रहालय में प्रदर्शित कराया। धरोहर हरियाणा संग्रहालय अपनी विशिष्टता के कारण पूरे भारत में अद्वितीय है। अब तक इस संग्रहालय का अवलोकन 20 लाख से अधिक देशी पर्यटकों तथा 102 देशों के प्रतिनिधियों द्वारा किया जा चुका है, जो अपने आप में एक उल्लेखनीय उपलब्धि है। इसके अतिरिक्त संग्रहालय में राज्य स्तरीय पुस्तकालय की स्थापना में भी उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा, जहाँ हरियाणवी संस्कृति एवं साहित्य से संबंधित दो हजार से अधिक पुस्तकें दानस्वरूप प्राप्त कर संग्रहित की गईं। वर्तमान में धरोहर हरियाणा संग्रहालय पूरे राष्ट्र के लिए एक अनुकरणीय संस्थान के रूप में स्थापित है।

2. केंद्रीय हिंदी संस्थान (हिंदी विश्वकोश परियोजना)

केंद्रीय हिंदी संस्थान की लघु हिंदी विश्वकोश परियोजना के अंतर्गत भारतीय गाँव की प्रविष्टियों के  लेखन से संबंधित परियोजना में सहभागिता करते हुए  प्रो. महासिंह पूनिया ने भारतीय गाँव के सांस्कृतिक इतिहास का विस्तृत लेखन किया। इसके अंतर्गत ग्रामीण सांस्कृतिक परंपरा से जुड़े कुआँ, पनघट, पगड़ी, चरखा, चक्की, छाज, चूल्हा, पालकी, डोली, रथ, बैलगाड़ी, तेली, कोल्हू, गुड़, गन्ना, ऊँट, चौपाल, पंचायत, सांझी, हल, हुक्का आदि सहित 108 से अधिक विषयों पर शोधपरक लेख लिखकर इस महत्त्वपूर्ण परियोजना में योगदान दिया।

3. लोककला सांझी का सांस्कृतिक अध्ययन (परियोजना)

कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय द्वारा संचालित लोककला सांझी का  सांस्कृतिक अध्ययन परियोजना के अंतर्गत प्रो. महासिंह पूनिया ने हरियाणा के  गाँव-गाँव का भ्रमण कर लोककला सांझी से संबंधित लोकगीतों एवं चित्रों का व्यापक संकलन किया। इस परियोजना के दौरान उन्होंने 15 हजार से अधिक सांझी चित्रों का संग्रह किया तथा हरियाणा ही नहीं, बल्कि पूरे उत्तर भारत की  लोककला सांझी का समीक्षात्मक एवं सांस्कृतिक मूल्यांकन करते हुए परियोजना रिपोर्ट कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय को प्रस्तुत की। इसके अतिरिक्त विरासत के माध्यम से पाँच राज्य स्तरीय सांझी उत्सवों का सफल आयोजन भी किया।

लोककला चित्रण (परियोजना)

हरियाणा की लोककला चित्रण  परंपरा के संरक्षण के उद्देश्य से हरियाणा कला परिषद ने धरोहर हरियाणा संग्रहालय के निदेशक डॉ. महासिंह पूनिया को इस परियोजना का प्रभारी नियुक्त किया। इस परियोजना के अंतर्गत हरियाणा के विभिन्न क्षेत्रों का व्यापक भ्रमण कर वहाँ की लोक चित्रकला का संरक्षण किया गया। साथ ही दस दिवसीय कार्यशाला का आयोजन किया गया, जिसमें हरियाणा के अहीरवाल, मेवात, ब्रज, खादर, बांगर, बागड़ एवं कौरवी क्षेत्रों की 400 से अधिक लोक चित्रकलाओं का संरक्षण एवं प्रलेखन किया गया।

5. हरियाणा की सांस्कृतिक धरोहर : भाग-एक (पुस्तक)

यह पुस्तक हरियाणा की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का सजीव  दस्तावेज़ है। इसमें हरियाणवी लोक संस्कृति से संबंधित 200 से अधिक दुर्लभ चित्र प्रकाशित किए गए हैं। साथ ही हरियाणवी संस्कृति पर आधारित 26 ऐसे शोधपत्र सम्मिलित हैं, जिन विषयों पर इससे पूर्व गंभीर शोध एवं लेखन नहीं हुआ था।

6. हरियाणवी मुहावरा कोश (पुस्तक)

यह हरियाणा का पहला ऐसा कोश है, जिसमें हरियाणवी भाषा के 5000 से अधिक मुहावरों का वर्णानुक्रमानुसार संकलन किया गया है। इसके साथ ही हरियाणवी भाषा के पाँच हजार वर्षों से अधिक के इतिहास का भी विस्तृत परिचय प्रस्तुत किया गया है।

7. लोक साहित्यिक धरोहर (पुस्तक)

हरियाणा की लोक साहित्यिक  धरोहर’ नामक इस पुस्तक में हरियाणवी साहित्य की अनेक ऐसी विधाओं पर पहली बार शोधपरक लेख प्रस्तुत किए गए हैं, जिन पर पूर्व में पर्याप्त कार्य नहीं हुआ था। पुस्तक में वैदिक सांस्कृतिक हरियाणा, लोकोक्तियों, पहेलियों, मुहावरों का सांस्कृतिक मूल्यांकन तथा जनवार्ता, नुक्ते, कहबत, नेवे, लोरी, बुझावल आदि लोक साहित्य की विविध एवं अपेक्षाकृत अपरिचित विधाओं का विस्तृत विवेचन किया गया है।

8. हरियाणा के हिन्दी प्रबंध काव्य (पुस्तक)

इस पुस्तक के लिए हरियाणा के गाँव-गाँव का भ्रमण कर महाकवियों  एवं प्रबंध कवियों द्वारा रचित 30 से अधिक महाकाव्यों, खंडकाव्यों एवं  चंपू काव्यों का दो वर्षों तक संकलन किया गया। इन कृतियों की संवेदना एवं शिल्प का शोधपरक अध्ययन कर इस पुस्तक का प्रकाशन किया गया।

  1. पत्रकारिताकाबदलता स्वरूप (पुस्तक)

हरियाणा साहित्य अकादमी द्वारा प्रकाशित यह पुस्तक पाँच  अध्यायों में विभाजित है। इसमें हिंदी पत्रकारिता के इतिहास, विकास, संपादन कला, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया एवं पत्रकारिता तथा भारतीय संविधान और प्रेस से संबंधित विषयों का शोधपरक एवं विश्लेषणात्मक विवेचन प्रस्तुत किया गया है।

  1. हरियाणवीहास्यलोक कथाएँ (पुस्तक)

अक्षरधाम द्वारा वर्ष 2017 में प्रकाशित यह पुस्तक चार अध्यायों में विभाजित है। इसके अंतिम अध्याय में हरियाणवी भाषा की 72 हास्य लोक कथाओं का संकलन  एवं प्रस्तुतीकरण किया गया है।

  1. लोकसाहित्यधरोहर (पुस्तक)

अक्षरधाम द्वारा वर्ष 2017 में प्रकाशित यह पुस्तक 11 अध्यायों में विभाजित है। इसमें हरियाणा के सांस्कृतिक  लोक साहित्य, गद्य लेखन परंपरा, लोक व्यवसाय एवं पारंपरिक व्यवसाय, तीज-उत्सव, संस्कार-परंपरा, शौर्य परंपरा, सांझी परंपरा, पनघट, चरखा, आयुर्वेद तथा लोक वेशभूषा जैसे विषयों का विस्तृत विवेचन किया गया है।

  1. हरियाणाकीसांस्कृतिक धरोहर : भागदो (पुस्तक)

फरवरी 2017 में प्रकाशित इस पुस्तक में  हरियाणवी लोक वेशभूषा, खेत-खलिहान की परंपरा, लोककला, विवाह परंपरा, महिलाओं का बदलता जीवन, पुरातात्त्विक धरोहर तथा ऐतिहासिक परंपराओं का विस्तृत मूल्यांकन प्रस्तुत किया गया है। पुस्तक में 200 से अधिक दुर्लभ चित्र भी सम्मिलित हैं।

  1. संस्कृतिएवंलोकसाहित्य (पुस्तक)

हरियाणा साहित्य अकादमी द्वारा वर्ष 2016–17 में प्रकाशित यह पुस्तक पाँच  अध्यायों में विभाजित है। इसमें हरियाणा के पौराणिक इतिहास, ऐतिहासिक परंपरा, शौर्य परंपरा, संस्कार परंपरा तथा स्वतंत्रता संग्राम से संबंधित विषयों का विस्तृत एवं शोधपरक विवेचन किया गया है।

  1. लोककलासांझी(पुस्तक)

आधार प्रकाशन द्वारा प्रकाशित  इस पुस्तक में सांझी के लोकगीतों का सांस्कृतिक मूल्यांकन, उत्तर भारत में सांझी परंपरा का विकास, हरियाणा में सांझी की महत्ता तथा सांझी में प्रयुक्त लोक प्रतीकों का विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है।

  1. विश्वमेंहिन्दी का विकास (पुस्तक)

इस पुस्तक में हिंदी भाषा के  वैश्विक स्वरूप एवं उसके विकास का व्यापक परिचय प्रस्तुत किया गया है। इसमें विश्व के 60 से अधिक देशों के विद्वानों के आलेख 60 से अधिक अध्यायों में संकलित किए गए हैं।

  1. सांस्कृतिकहरियाणा(कॉफीटेबल बुक) (प्रकाशनाधीन)

इस कॉफी-टेबल बुक में हरियाणा के  पौराणिक इतिहास, वैदिक नदियों, पुरातात्त्विक स्थलों, 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में हरियाणा के योगदान, वेशभूषा, आभूषण, मेले-त्योहार तथा पिछले 50 वर्षों के सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक विकास को चित्रों एवं विवरणों के माध्यम से प्रस्तुत किया गया है।

  1. हरियाणवीलोकसाहित्य में हास्य (प्रकाशनाधीन)

यह पुस्तक हरियाणवी लोक  साहित्य में हास्य के उद्भव, विकास, परंपरा, स्वरूप एवं वर्गीकरण का विस्तृत अध्ययन प्रस्तुत करती है। इसके साथ ही लोकगीतों, लोककथाओं, लोकगाथाओं, लोकनाट्यों, पहेलियों, लोरियों तथा लोक विनोद की 30 से अधिक विधाओं में हास्य के विविध स्वरूपों का विश्लेषण किया गया है।

प्रमुख उपलब्धियाँ

प्रो. महासिंह पूनिया ने हरियाणा की लोक संस्कृति, सांस्कृतिक विरासत एवं  संग्रहालयों के संरक्षण, संवर्धन और विकास के क्षेत्र में अनेक उल्लेखनीय कार्य किए हैं। उनके प्रमुख योगदानों में कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय में धरोहर हरियाणा संग्रहालय की स्थापना तथा 1857 संग्रहालय की स्थापना विशेष  रूप से उल्लेखनीय है। इसके अतिरिक्त उन्होंने  गुलज़ारी लाल नंदा संग्रहालय, कुरुक्षेत्र तथा चौधरी छोटूराम  संग्रहालय, सांपला की पुनर्स्थापना में  महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

उन्होंने हरियाणा पुलिस  संग्रहालय, मधुबन तथा 1857 संग्रहालय, हरियाणा पुलिस, मधुबन की स्थापना में भी  महत्वपूर्ण योगदान दिया। साथ ही विरासत हेरिटेज  विलेज, जी.टी. रोड, मसाना की स्थापना के माध्यम से हरियाणा की सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित एवं लोकप्रिय बनाने का कार्य किया।

हरियाणा की लोक संस्कृति के  संरक्षण एवं संवर्धन के क्षेत्र में उन्होंने लूर नृत्य को संरक्षित कर युवा पीढ़ी से जोड़ा। हरियाणा की पारंपरिक गायन  शैलियों, हरियाणवी पगड़ी, हरियाणवी रीतिरिवाजों (रिचुअल्स) तथा  हरियाणवी ग़ज़ल को संरक्षित करते हुए उन्हें युवा उत्सवों में सम्मिलित कराने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

उन्होंने अंतरराष्ट्रीय गीता जयंती महोत्सव में हरियाणा पैवेलियन की स्थापना तथा अंतरराष्ट्रीय  सूरजकुंड क्राफ्ट मेले में  हरियाणवी ‘अपणा घर की स्थापना में उल्लेखनीय योगदान दिया।

हरियाणवी लोक संस्कृति के  वैश्विक प्रचार-प्रसार के उद्देश्य से उन्होंने ऑस्ट्रेलिया, बुल्गारिया, श्रीलंका, इंग्लैंड, हंगरी, उज्बेकिस्तान, ऑस्ट्रिया तथा चेकोस्लोवाकिया सहित अनेक देशों में हरियाणवी सांस्कृतिक प्रदर्शनी का सफल  आयोजन किया।

प्रो. महासिंह पूनिया का जीवन  शिक्षा, शोध, संस्कृति और सांस्कृतिक  विरासत के संरक्षण के प्रति  समर्पित एक सतत साधना का प्रेरक उदाहरण है। अपने बहुआयामी योगदान के माध्यम से उन्होंने हरियाणा की लोक संस्कृति, हिंदी भाषा तथा भारतीय  सांस्कृतिक परंपरा को राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई  पहचान प्रदान की है। उनकी शैक्षणिक उत्कृष्टता, प्रशासनिक दक्षता और  सांस्कृतिक प्रतिबद्धता उन्हें  समकालीन हिंदी जगत के  विशिष्ट विद्वानों में प्रतिष्ठित  करती है। उनका अवदान आने वाली  पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बना रहेगा तथा भारतीय  सांस्कृतिक विरासत के  संरक्षण और संवर्धन के इतिहास में सदैव स्मरणीय रहेगा।

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