इंदर सिंह लांबा

हरियाणवी लोक संस्कृति के सशक्त हस्ताक्षर

इंदर सिंह लांबा हरियाणा की लोक संस्कृति, लोकनाट्य, रागनी, अभिनय और गायन की समृद्ध परंपरा के ऐसे समर्पित कलाकार हैं, जिन्होंने “पाँच ” दशकों से अधिक समय तक अपनी प्रतिभा, मेहनत और सांस्कृतिक प्रतिबद्धता के बल पर हरियाणवी कला जगत में विशिष्ट पहचान बनाई है। उनका जन्म 06 अगस्त 1961 को हरियाणा के भिवानी जिले की तोशाम तहसील के गांव बजीणा  में श्री हरीचंद के परिवार में हुआ। उनकी लंबाई 5 फीट 7 इंच है तथा उनकी स्क्रीन एज 45 से 55 वर्ष के बीच मानी जाती है। वे हिंदी, हरियाणवी, पंजाबी, राजस्थानी और अंग्रेज़ी भाषाओं पर समान अधिकार रखते हैं।

इंदर सिंह लांबा का परिवार पीढ़ियों से लोककला और लोकसंगीत से जुड़ा रहा है। उनके पिता आकाशवाणी रोहतक से मान्यता प्राप्त लोक कलाकार थे, जबकि उनके दादा, पड़दादा, ताऊ और चाचा भी अपने समय के प्रसिद्ध लोकगायक रहे।  इस पारिवारिक वातावरण ने बचपन से ही उनके भीतर रागनी, सांग और लोकसंगीत के प्रति गहरा लगाव पैदा कर दिया। गायन की प्रारंभिक शिक्षा उन्होंने अपने चाचा धर्मनाथ से प्राप्त की,  जो स्वयं लेखक, प्रचारक और रामलीला कलाकार थे। घर में कला का माहौल होने के कारण अभिनय और संगीत उनके जीवन का स्वाभाविक हिस्सा बन गए। उनकी कलात्मक यात्रा की शुरुआत बचपन में ही हो गई थी। जब वे मात्र आठ वर्ष की आयु में तीसरी कक्षा में पढ़ते थे, तब विद्यालय के सांस्कृतिक कार्यक्रम में उन्होंने राजा हरिश्चंद्र पर आधारित एक रागनी प्रस्तुत की। उनकी प्रस्तुति से शिक्षक और विद्यार्थी इतने प्रभावित हुए कि उन्हें पुरस्कार स्वरूप मिठाई दी गई। यही वह क्षण था जिसने उनके भीतर कलाकार बनने का आत्मविश्वास जगाया। विद्यालय के दिनों में वे प्रतिदिन प्रार्थना का संचालन करते थे और प्रत्येक सांस्कृतिक कार्यक्रम में सक्रिय भागीदारी निभाते थे। वर्ष  1976  में मैट्रिक उत्तीर्ण करने के बाद उन्होंने अपने चाचा धर्मनाथ और फूफा मांगेराम के साथ सांग मंडली में लगभग चार वर्षों तक मुख्य कलाकार ( राणी  ) के रूप में अभिनय, गायन और नृत्य किया।

वर्ष 1980 में उन्हें जनसंपर्क एवं सांस्कृतिक कार्य विभाग, हरियाणा में कलाकार के पद पर नियुक्ति मिली। पिछले पाँच दशकों से इंदर सिंह लांबा हरियाणवी लोक संस्कृति, लोकनाट्य, रागनी, लोकगीत और सांस्कृतिक परंपराओं के संरक्षण, संवर्धन तथा प्रचार-प्रसार में निरंतर सक्रिय हैं।  गांव-गांव और शहर-शहर जाकर उन्होंने हरियाणा की सांस्कृतिक धरोहर को जन-जन तक पहुँचाया। वर्ष 2019 में वे इसी विभाग से कलाकार के पद से सेवानिवृत्त हुए। अपने पूरे सेवाकाल में उन्होंने केवल अभिनेता के रूप में ही नहीं, बल्कि लोकगायक, गीतकार, लोकनर्तक और मंच कलाकार के रूप में भी उल्लेखनीय योगदान दिया।

इंदर सिंह लांबा हिसार आकाशवाणी  & दूरदर्शन से बी हाई ग्रेड आर्टिस्ट मान्यता प्राप्त लोक कलाकार हैं। उनके लिखे और गाए गए अनेक लोकगीत तथा भजन आकाशवाणी रोहतक से प्रसारित हो चुके हैं। उनका पहला चर्चित भजन ” हेजी हेजी जगत में बड़ा बताया प्यार  , प्यार बिना इस दुनिया के म्हा जीणा है बेकार ।   वर्ष 1982 में पहली बार आकाशवाणी रोहतक से प्रसारित हुआ, जिसे श्रोताओं ने खूब सराहा और बाद में कई बार पुनः प्रसारित किया गया।

अभिनय के क्षेत्र में भी उन्होंने उल्लेखनीय सफलता प्राप्त की। उन्होंने हरियाणवी फिल्मों, वेब फिल्मों, टेलीफिल्मों और ओटीटी प्लेटफॉर्म पर अनेक प्रभावशाली भूमिकाएँ निभाई हैं। उनकी प्रमुख हरियाणवी फिल्मों में गौरव की स्वीटी, दादा लख्मी, मैं भी सरपंच, पुनर्जन्म, कांड 2010, धावक, वनवास और डरावा शामिल हैं। इसके अतिरिक्त उन्होंने सोनोटेक की हिंदी फिल्म गंगा में भी अभिनय किया।

ओटीटी प्लेटफॉर्म पर भी उनकी उपस्थिति लगातार मजबूत रही है। Stage App पर उनकी प्रमुख प्रस्तुतियों में गौरव की स्वीटी, दादा लख्मी, पुनर्जन्म, कांड 2010, धावक, वनवास, डरावा, सांगी तथा हुक्का और हथियार शामिल हैं। वहीं Chaupal App पर उन्होंने स्कैम और कच्छा धारी जैसी चर्चित वेब परियोजनाओं में अभिनय किया है। उनके आगामी प्रोजेक्ट्स कॉलेज डेज और धीमा ज़हर दर्शकों के बीच उत्सुकता का विषय बने हुए हैं।

हरियाणा कला परिषद की पूर्व निदेशक उषा शर्मा के निर्देशन में उन्होंने अनेक सांस्कृतिक टेलीफिल्मों में अभिनय, लेखन और गायन किया। इनमें करवा चौथ, तीज, जलवा पूजन, भात, अहोई माता, रक्षाबंधन, कुआँ पूजन सहित अनेक पारंपरिक और सांस्कृतिक विषयों पर आधारित प्रस्तुतियाँ विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। इंदर सिंह लांबा अभिनय के साथ-साथ गीत लेखन और लोकगायन में भी समान रूप से दक्ष हैं। उन्होंने हरियाणवी संगीत जगत की प्रसिद्ध कलाकार सपना चौधरी, अंजली राघव और सोनाली सहित अनेक कलाकारों के साथ मंच साझा किया है। प्रसिद्ध अभिनेता एवं निर्देशक यशपाल शर्मा के निर्देशन में बनी फिल्म दादा लख्मी में उन्होंने अभिनय के साथ-साथ गायन भी किया, जिसे दर्शकों और समीक्षकों ने विशेष रूप से सराहा। उनकी जीवन यात्रा संघर्षों से भी भरी रही। सांग प्रस्तुतियों के दौरान एक बार मंच का तख्त टूट जाने से उन्हें गंभीर चोटें आईं और लंबे समय तक शारीरिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। लेकिन उन्होंने कभी भी कला का साथ नहीं छोड़ा। उनका मानना है कि “ज़िंदगी से जो न हारे, वही ज़िंदगी सँवारते हैं।” इसी विश्वास और समर्पण ने उन्हें हरियाणवी लोककला का सम्मानित कलाकार बनाया। लोक संस्कृति के संरक्षण को लेकर इंदर सिंह लांबा स्पष्ट विचार रखते हैं। उनका मानना है कि आधुनिक समय में पश्चिमी संस्कृति के बढ़ते प्रभाव के कारण रागनी, सांग और लोकगीत जैसी पारंपरिक विधाएँ चुनौती का सामना कर रही हैं। वे कलाकारों से आग्रह करते हैं कि वे द्विअर्थी और अश्लील गीतों से दूर रहकर ऐसी रचनाएँ प्रस्तुत करें जिन्हें पूरा परिवार एक साथ बैठकर सुन और देख सके। वे गुरु-शिष्य परंपरा, संस्कारयुक्त लेखन, शुद्ध लोकगायन और सांस्कृतिक मूल्यों के संरक्षण के प्रबल समर्थक हैं। उनका विश्वास है कि यदि कलाकार सकारात्मक सोच और सामाजिक जिम्मेदारी के साथ अपनी लोक संस्कृति को आगे बढ़ाएँ, तो हरियाणा की यह अमूल्य सांस्कृतिक विरासत आने वाली पीढ़ियों तक सुरक्षित रह सकती है। आज इंदर सिंह लांबा केवल एक अभिनेता या लोकगायक नहीं, बल्कि हरियाणवी लोक संस्कृति के ऐसे समर्पित साधक हैं जिन्होंने अपने जीवन के चार दशक कला, संस्कृति और समाज की सेवा को समर्पित किए हैं। अभिनय, रागनी, लोकनृत्य, गीत लेखन, गायन और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के माध्यम से उन्होंने हरियाणवी संस्कृति को नई पहचान दिलाई है। आज भी वे अपनी कला, अनुभव और सांस्कृतिक प्रतिबद्धता के साथ नई पीढ़ी के कलाकारों को प्रेरित करते हुए हरियाणा की लोक परंपराओं को सहेजने और आगे बढ़ाने में निरंतर सक्रिय हैं।

Scroll to Top