हरियाणवी सिनेमा का असली इतिहास: जब गुलाम भारत में हरियाणवी बोली पहली बार बड़े पर्दे पर पहुँची एक सपना, जिसने इतिहास रच दिया
जब गुलाम भारत में हरियाणवी बोली पहली बार बड़े पर्दे पर पहुँचीएक सपना, जिसने इतिहास रच दियासाल 1936। भारत अभी अंग्रेज़ी हुकूमत के अधीन था। देश आज़ाद नहीं था, लेकिन कुछ लोग ऐसे थे जो अपनी मिट्टी, अपनी संस्कृति और अपनी बोली के प्रति पूरी तरह सजग थे। वे जानते थे कि किसी समाज की पहचान उसकी भाषा और संस्कृति से होती है।ऐसे ही दूरदर्शी व्यक्तित्वों में एक नाम था अभय राम चौधरी का।रोहतक जिले के सुनारिया गाँव में जन्मे अभय राम चौधरी केवल एक सफल वकील ही नहीं थे, बल्कि अपनी मातृभाषा और संस्कृति के सच्चे संरक्षक भी थे। वे रोहतक बार एसोसिएशन में अधिवक्ता थे और उस समय रोहतक के एकमात्र सिनेमा हॉल यूनिवर्सल टॉकीज़ के साझेदारों में भी शामिल थे। उनके व्यावसायिक साझेदार दीन मोहम्मद थे।उन्हें शायद स्वयं भी अंदाज़ा नहीं था कि उनका एक विचार आगे चलकर हरियाणवी सिनेमा के इतिहास का पहला अध्याय लिख देगा।29 मार्च 1936 को यूनिवर्सल टॉकीज़, रोहतक में एक पंजाबी भाषा की फिल्म “इश्क पंजाब” प्रदर्शित हुई।फिल्म को मिले दर्शकों के प्रेम और अपनी क्षेत्रीय भाषा के प्रभाव को देखकर अभय राम चौधरी के मन में एक विचार जन्मा।
उन्होंने सोचा—जब पंजाबी भाषा बड़े पर्दे पर आ सकती है, तो हमारी हरियाणवी बोली क्यों नहीं?”यही वह क्षण था जिसने हरियाणवी सिनेमा की नींव रखी।नाटक से सिनेमा तक का सफरउस समय रोहतक में एक प्रसिद्ध नाटककार पंडित हरबंसलाल हुआ करते थे। उनके नाटक और सांस्कृतिक प्रस्तुतियाँ अक्सर सिनेमा हॉल के आसपास आयोजित होती थीं और लोगों में बेहद लोकप्रिय थीं।अभय राम चौधरी ने उनके साथ मिलकर हरियाणवी संस्कृति को फिल्म के माध्यम से प्रस्तुत करने का विचार बनाया।यह केवल एक फिल्म बनाने की योजना नहीं थी, बल्कि हरियाणवी बोली को इतिहास में दर्ज कराने का संकल्प था।”देहाती लड़की” – हरियाणवी बोली की पहली फिल्मइस सपने का परिणाम थी फिल्म —”देहाती लड़की”
जिसे 1 सितम्बर 1936 को रिलीज़ किया गया। यह फिल्म भारतीय सिनेमा के इतिहास में विशेष स्थान रखती है क्योंकि इसे हरियाणवी बोली को प्रमुखता देने वाली पहली ज्ञात फिल्म माना जाता है।फिल्म का सेंसर प्रमाणन कलकत्ता में हुआ था और इसका सेंसर प्रमाणपत्र संख्या 16447 दर्ज है।
फिल्म का निर्माण और निर्देशन
फिल्म का निर्माण अभय राम चौधरी ने किया, जबकि निर्देशन भारतीय सिनेमा के प्रसिद्ध अग्रदूत धीरेंद्रनाथ गांगुली (Dhiren Ganguly) ने किया।
धीरेंद्रनाथ गांगुली उस दौर के प्रतिष्ठित फिल्मकारों में गिने जाते थे और भारतीय सिनेमा के शुरुआती विकास में उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा है।
हरियाणा और कलकत्ता में हुई शूटिंग
उस समय फिल्म निर्माण की अधिकांश सुविधाएँ कलकत्ता और बंबई जैसे बड़े शहरों में उपलब्ध थीं।
इसी कारण “देहाती लड़की” की शूटिंग का एक हिस्सा हरियाणा में तथा दूसरा हिस्सा कलकत्ता में किया गया।
फिल्म में हरियाणा के ग्रामीण जीवन, लोक संस्कृति, पहनावे और सामाजिक परिवेश को यथासंभव वास्तविक रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया।
संगीत में बसी हरियाणा की आत्मा
फिल्म की सबसे बड़ी विशेषताओं में इसका लोकसंगीत था।
हरियाणा के महान लोककवि पंडित मांगेराम की दो प्रसिद्ध रागनियों को फिल्म में स्थान दिया गया। इससे पहली बार हरियाणवी लोककाव्य और रागनी परंपरा बड़े पर्दे तक पहुँची।
फिल्म के गीतों में हरियाणा की मिट्टी की खुशबू, ग्रामीण जीवन की सरलता और लोक संस्कृति की आत्मा स्पष्ट रूप से दिखाई देती थी।
फिल्म के गीतों के लेखन में अंबाला के गीतकार मास्टर ओमप्रकाश का भी महत्वपूर्ण योगदान माना जाता है।
फिल्म की नायिका: श्याम कुमारी
फिल्म की मुख्य अभिनेत्री श्याम कुमारी थीं।उपलब्ध ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार श्याम कुमारी का संबंध भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के परिवार से बताया जाता है और उन्हें नेहरू परिवार की रिश्तेदारी में माना जाता है।उनकी उपस्थिति ने फिल्म को उस दौर में विशेष पहचान दिलाई।केवल एक फिल्म नहीं, एक सांस्कृतिक आंदोलन
“देहाती लड़की” को केवल एक फिल्म कहना इसके महत्व को कम करके आंकना होगा।यह उस दौर का सांस्कृतिक आंदोलन था, जब क्षेत्रीय पहचान को संरक्षित करने के लिए कुछ लोग सीमित संसाधनों में भी बड़े सपने देख रहे थे।जब भारत स्वतंत्र नहीं था, तब हरियाणा की बोली को पर्दे पर लाने का साहसिक प्रयास वास्तव में अपने समय से बहुत आगे की सोच थी।इतिहास को उसका सम्मान मिलना चाहिए
आज जब हरियाणवी फिल्में, वेब सीरीज़, ओटीटी प्लेटफ़ॉर्म और डिजिटल कंटेंट नई ऊँचाइयों को छू रहे हैं, तब यह याद रखना आवश्यक है कि इस यात्रा की शुरुआत किसी बड़े स्टूडियो या सरकारी सहायता से नहीं हुई थी।यह शुरुआत एक ऐसे व्यक्ति के सपने से हुई थी, जिसने अपनी मातृभाषा को सम्मान दिलाने का संकल्प लिया था।अभय राम चौधरी, पंडित हरबंसलाल, पंडित मांगेराम, मास्टर ओमप्रकाश और धीरेंद्रनाथ गांगुली जैसे लोगों के प्रयासों ने हरियाणवी सिनेमा का वह पहला दीप जलाया, जिसकी रोशनी आज भी दिखाई देती है।
निष्कर्ष
तम्बर 1936 को रिलीज़ हुई “देहाती लड़की” केवल हरियाणवी बोली की पहली फिल्म नहीं थी, बल्कि यह हरियाणा की सांस्कृतिक चेतना का पहला सिनेमाई दस्तावेज़ थी।गुलाम भारत में कुछ जागरूक लोगों ने अपनी भाषा, अपनी संस्कृति और अपनी पहचान को बचाने के लिए जो कदम उठाया, वही आगे चलकर हरियाणवी सिनेमा की नींव बना।आज, लगभग 90 वर्ष बाद, समय आ गया है कि हरियाणवी सिनेमा के इस स्वर्णिम अध्याय को उसका उचित सम्मान दिया जाए और नई पीढ़ी तक पहुँचाया जाए।
