विकास बेरवाल

विकास बेरवाल: सृजन, शोध, शिक्षा और संस्कृति का संतुलित सफर

पृष्ठभूमि और वैचारिक निर्माण

विकास बेरवाल का जन्म हरियाणा के गांव सोरखी, तहसील हांसी, जिला हिसार में हुआ। उनका व्यक्तित्व सैन्य अनुशासन, खेल भावना और हरियाणा के ग्रामीण परिवेश की लोकसंस्कृति से आकार लेता है। उनके पिता भारतीय सेना में रहे, उत्कृष्ट एथलीट रहे, और बाद में हरियाणा पुलिस से जुड़े। परिवार परंपरागत रूप से खेती-बाड़ी से जुड़ा रहा। ऐसे माहौल में सिनेमा का सपना बिना किसी मार्गदर्शन या पारिवारिक पृष्ठभूमि के देखना चुनौतीपूर्ण था।
सिनेमा तक पहुँचने का रास्ता उन्हें पत्रकारिता में दिखाई दिया। पढ़ते-समझते, अभ्यास करते और अवलोकन करते हुए उन्होंने धीरे-धीरे अपने लिए वह मार्ग बनाया, जहाँ ‘चकाचौंध’ से अधिक ‘सच्चाई का चित्रण’ महत्वपूर्ण रहा। इसलिए मुंबई जाने की कभी सोची ही नहीं—विचार था कि जो करेंगे हरियाणा में ही करेंगे।

शिक्षा, शोध और अकादमिक आधार

उन्होंने अपनी प्रारंभिक उच्च शिक्षा डिस्टेंस माध्यम से प्राप्त की। अध्ययन में गहराई की कमी लगी—यही आत्मबोध आगे चलकर शोध की प्रेरणा बना। उन्होंने यूजीसी-नेट (मास कम्युनिकेशन) उत्तीर्ण किया और वर्तमान में गुरु जंभेश्वर यूनिवर्सिटी ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी से उनका शोध हरियाणा के चित्रण पर केंद्रित है।
उन्होंने एशियन एकेडमी ऑफ फिल्म एंड टेलीविजन से फिल्म मेकिंग की बारीकियां सीखी। उनके कई शोध-पत्र प्रकाशित हुए और राष्ट्रीय/अंतर्राष्ट्रीय कॉन्फ्रेंसेज़ में प्रस्तुत हुए।

सिनेमाई यात्रा और प्रोडक्शन दायित्व

उनकी सिनेमाई यात्रा बिफोर आई डाई से शुरू हुई। इसके बाद हरिओम कौशिक से हुई मित्रता ने उन्हें ओम कौशिक फिल्म्स के अधिकांश प्रोजेक्ट्स का कार्यभार संभालने का अवसर दिया, जिसे वे आज भी निभा रहे हैं।
वे प्रोडक्शन हेड के रूप में 1600 मीटर और तोता से जुड़े। आगे चलकर बहु काले की, रंगीली, बैड बॉयज़ भिवानी और ढाणी जैसी फिल्मों में कार्य किया।
हरियाणा की फिल्म फौजा में वे एक्ज़ीक्यूटिव प्रोड्यूसर रहे। इस फिल्म के 3 नेशनल अवॉर्ड्स ने हरियाणवी सिनेमा को व्यापक पहचान दिलाई।

फिल्म महोत्सव, वर्कशॉप और सांस्कृतिक सक्रियता

2020 से 2025 के बीच हरियाणा में आयोजित फिल्म फेस्टिवल्स के आयोजन में प्रमुख भूमिका में रहे। ये आयोजन सिने फाउंडेशन हरियाणा और चित्र भारती साधना के तत्वावधान में हुए।
वे विभिन्न यूनिवर्सिटीज़ में फिल्म मेकिंग और फिल्म एप्रीसिएशन वर्कशॉप्स के रिसोर्स पर्सन भी रहे, जहाँ सिनेमा की भाषा और ग्रामर को व्यवहारिक उदाहरणों के साथ समझाया।

शिक्षण अनुभव और हिंदी में ‘सिनेमा का ग्रामर’

दिल्ली स्कूल ऑफ जर्नलिज्म, यूनिवर्सिटी ऑफ दिल्ली में पढ़ाते हुए उन्होंने महसूस किया कि हिंदी माध्यम के विद्यार्थियों के लिए सिनेमा के तकनीकी और ग्रामर संबंधी पक्ष पर सरल, सुव्यवस्थित साहित्य का अभाव है।
इसी अनुभव ने उन्हें हिंदी में फिल्म मेकिंग पुस्तक लिखने के लिए प्रेरित किया, जो विद्यार्थियों को बेसिक से एडवांस स्तर तक मार्गदर्शन देती है।

हरियाणवी मान्ने : भाषा और लोकसंस्कृति का दस्तावेज़

मातृभाषाओं के प्रति लोगों के प्रेम ने उन्हें हरियाणवी बोली के लिए कार्य करने की प्रेरणा दी। हरियाणवी माने त्रिभाषी डिक्शनरी के माध्यम से उन्होंने गाँव-देहात की लाइफस्टाइल, फूड, पहनावा, बोलचाल, मुहावरे और भाव-अभिव्यक्ति को शब्दों में सहेजने का प्रयास किया।

धर्म वीर फिल्म्स: उद्देश्यपूर्ण पहल

अपने पिता की स्मृति से प्रेरित होकर उन्होंने धर्म वीर फिल्म्स की स्थापना की। यह नई जिम्मेदारी कैसा परिणाम लेकर आएगी—यह भविष्य के गर्भ में है।
समापन विचार
“विकास बेरवाल की कार्यशैली में रिसर्च, क्रिएटिविटी, कल्चर, ऑर्गनाइजेशन स्किल और एजुकेशन—इन सभी का अद्भुत संतुलन दिखाई देता है। वे मानते हैं कि सिनेमा केवल एंटरटेनमेंट का माध्यम नहीं, बल्कि समाज, भाषा, संस्कृति और विचारों को जोड़ने का एक सशक्त माध्यम है—और इसी विचारधारा के साथ वे निरंतर सक्रिय हैं।”

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