मलाल

सीमित बजट में बनी एक साहसी हरियाणवी फिल्म की प्रेरणादायक कहानी

1 अक्टूबर 2021 को Chaupal TV पर रिलीज़ हुई “मलाल” हरियाणवी सिनेमा की उन चुनिंदा फिल्मों में शामिल है, जिन्होंने मनोरंजन के साथ-साथ एक गंभीर सामाजिक विषय को प्रभावशाली ढंग से दर्शकों के सामने रखा। फिल्म का निर्देशन रणजीत चौहान ने किया, जबकि इसकी कहानी उन्होंने  शमशेर सिंह सैम के साथ मिलकर लिखी। फिल्म में यशपाल शर्मा, मनोज बख्शी, सिद्धार्थ भारद्वाज, सूर्या नारायण सिंह, ज्योति चौहान, अभिमन्यु यादव, टीना भाटिया, पद्म शाह और अन्य कलाकारों ने महत्वपूर्ण भूमिकाएँ निभाईं।

कहानी

मलाल उन प्रवासी परिवारों की कहानी है, जो बेहतर जीवन और रोजगार की तलाश में हरियाणा के एक गाँव में आकर बसते हैं। लेकिन वहाँ पहुँचने के बाद उनका सामना एक भयावह सच्चाई से होता है। गाँव का दबंग मुखिया महिलाओं को देह व्यापार के लिए मजबूर करता है और पुरुषों को नशे के कारोबार में धकेल देता है। शोषण, सत्ता के दुरुपयोग और सामाजिक अन्याय जैसे विषयों को फिल्म बेहद संवेदनशीलता और यथार्थवादी शैली में प्रस्तुत करती है।

कैसे जन्मी "मलाल" की कहानी

निर्देशक रणजीत चौहान के अनुसार, “मलाल” बनाने की प्रेरणा उन्हें निर्देशक कुंदन शाह की चर्चित फिल्म “मिर्च मसाला” से मिली। उस फिल्म की सामाजिक संवेदनशीलता ने उन्हें गहराई से प्रभावित किया। इसके बाद उन्होंने लेखक शमशेर सिंह सैम के साथ मिलकर वास्तविक जीवन की घटनाओं और सामाजिक अनुभवों पर आधारित पटकथा लिखनी शुरू की।

वर्ष 2015 में फिल्म की पटकथा तैयार हुई। शुरुआत में यह कहानी एक अन्य निर्माता के लिए लिखी गई थी, लेकिन बजट की कमी के कारण वह परियोजना आगे नहीं बढ़ सकी। उस समय रणजीत चौहान अपनी दूसरी फिल्म “डिग्री” की तैयारियों में व्यस्त थे, फिर भी उन्होंने “मलाल” बनाने का सपना नहीं छोड़ा।

कलाकारों की तलाश और सबसे बड़ी चुनौती

फिल्म की सबसे बड़ी चुनौती बिहार से आए प्रवासी परिवारों के पात्रों के लिए उपयुक्त कलाकारों का चयन था। टीम चाहती थी कि सभी किरदार पूरी तरह वास्तविक और विश्वसनीय दिखाई दें। इसी दौरान अपने शिक्षक दुष्यंत के माध्यम से राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (NSD) से प्रशिक्षित अभिनेत्री टीना भाटिया तक बात पहुँची। लेकिन उस समय फिल्म के पास कलाकारों को बुलाने तक का पर्याप्त बजट नहीं था। इसलिए टीम ने पहले एक अनुमानित बजट तैयार किया और संभावित सहयोगियों के सामने फिल्म का प्रस्ताव रखा।

जब लोगों ने भरोसा दिखाया

सबसे पहले मदन भारती ने फिल्म के साथ जुड़ने का निर्णय लिया और पूरी शूटिंग के दौरान यूनिट के भोजन की व्यवस्था अपने जिम्मे ली।

इसके बाद सुशील वशिष्ठ, जो इससे पहले हरियाणवी फिल्म “लख्मीचंद” के कैमरा विभाग से जुड़े थे, इस परियोजना का हिस्सा बने। उन्होंने कैमरा, लाइट और अन्य तकनीकी संसाधन उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी ली। उनकी एक शर्त थी कि यदि भविष्य में फिल्म सफल होकर बिकती है, तो उन्हें उसके लाभ में 25 प्रतिशत हिस्सेदारी दी जाएगी।

सुशील वशिष्ठ ने अपने एक परिचित के माध्यम से लगभग 70 हजार रुपये की आर्थिक सहायता भी उपलब्ध करवाई। बाद में सतीश नांदल निर्माता के रूप में जुड़े, जिनके सहयोग से अभिनेत्री टीना भाटिया और पद्म शाह की हवाई यात्रा की व्यवस्था संभव हो सकी।

कलाकारों का समर्पण

जब फिल्म के लिए यशपाल शर्मा से संपर्क किया गया, तो उन्होंने बिना किसी पारिश्रमिक के काम करने का निर्णय लिया। मनोज बख्शी ने केवल 11 हजार रुपये सम्मान राशि के रूप में स्वीकार किए, जबकि पुलिस अधिकारी की भूमिका निभाने वाले सिद्धार्थ भारद्वाज ने चार दिनों की शूटिंग के लिए मात्र 11 हजार रुपये में काम किया। फिल्म का एक महत्वपूर्ण किरदार “हरकू” निर्देशक रणजीत चौहान ने प्रारंभिक रूप से स्वयं निभाने के उद्देश्य से लिखा था। लेकिन बाद में रचनात्मक और प्रोडक्शन संबंधी निर्णयों के चलते यह भूमिका अभिनेता योगेश को दी गई। योगेश ने अपने प्रभावशाली अभिनय से इस चुनौतीपूर्ण किरदार को जीवंत बनाया और दर्शकों पर गहरी छाप छोड़ी।

शूटिंग के दौरान संघर्ष

मलाल की शूटिंग कुल 25 दिनों में पूरी हुई। शूटिंग के दौरान उपयोग किए गए कैमरे की पूरी व्यवस्था हरिओम कौशिक ने संभाली। उन्होंने कैमरे का दैनिक खर्च उठाने के साथ-साथ फिल्म निर्माण के लिए लगभग 1 लाख 46 हजार रुपये का आर्थिक सहयोग भी दिया। उनके इस सहयोग के बाद पूरी टीम ने तय कर लिया कि अब किसी भी परिस्थिति में शूटिंग नहीं रुकेगी। भीषण गर्मी, तपती धूप और सीमित संसाधनों के बीच कलाकार और तकनीकी टीम लगातार कई-कई दिनों तक ईंट-भट्टों पर ही रहती, वहीं विश्राम करती और अगली सुबह फिर शूटिंग शुरू कर देती।

फिल्म की शूटिंग हरियाणा के विभिन्न वास्तविक स्थानों पर की गई, जिससे फिल्म को स्वाभाविक और यथार्थपरक वातावरण मिला। इसके प्रमुख दृश्य बसाना (रोहतक), पालड़ी (चरखी दादरी), महेंद्रगढ़ बस अड्डा तथा महेंद्रगढ़ सब्जी मंडी में फिल्माए गए। वहीं बिहार के ग्रामीण परिवेश को दर्शाने के लिए महेंद्रगढ़ की एक लोकेशन का उपयोग किया गया, जिसे उत्कृष्ट सिनेमैटोग्राफी और आर्ट डायरेक्शन के माध्यम से बिहार के गाँव का रूप दिया गया।

पोस्ट-प्रोडक्शन की लंबी लड़ाई

शूटिंग पूरी होने के बाद फिल्म की सबसे बड़ी चुनौती पोस्ट-प्रोडक्शन रही। सीमित बजट और तकनीकी संसाधनों की कमी के कारण एडिटिंग तथा अन्य पोस्ट-प्रोडक्शन कार्यों में काफी समय लगा। परिणामस्वरूप फिल्म को पूरी तरह तैयार होने में लगभग चार वर्ष का समय लगा।

फिल्म का संगीत आदित्य रोहिल्ला ने तैयार किया। उल्लेखनीय बात यह है कि तमाम कठिनाइयों के बावजूद पूरी फिल्म का कुल बजट केवल 6 लाख 21 हजार रुपये रहा, जो हरियाणवी सिनेमा के लिए एक प्रेरणादायक उदाहरण है।

एक निर्देशक की पहली जीत

“मलाल” निर्देशक रणजीत चौहान की पहली फीचर फिल्म थी। निर्माण के दौरान कई लोगों ने उनसे कहा—“फिल्म तो बना लोगे, लेकिन रिलीज़ कैसे करोगे? थिएटर कौन देगा?” लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। अंततः 1 अक्टूबर 2021 को “मलाल” का प्रीमियर Chaupal TV पर हुआ और फिल्म दर्शकों तक पहुँची। यह फिल्म इस बात का प्रमाण बनी कि मजबूत विषय, ईमानदार कहानी और समर्पित टीम किसी भी बड़े बजट से अधिक महत्वपूर्ण होती है।

निष्कर्ष

“मलाल” केवल एक फिल्म नहीं, बल्कि संघर्ष, विश्वास, सहयोग और जुनून की प्रेरक कहानी है। बेहद सीमित बजट, आर्थिक चुनौतियों और कठिन परिस्थितियों के बावजूद पूरी टीम ने धैर्य और समर्पण के साथ काम किया। चार वर्षों की लंबी यात्रा के बाद जब फिल्म दर्शकों के सामने पहुँची, तो उसने यह साबित कर दिया कि सच्चे इरादे, सशक्त कहानी और ईमानदार प्रयास किसी भी संसाधन की कमी पर भारी पड़ सकते हैं।

हरियाणवी सिनेमा के इतिहास में “मलाल” एक ऐसी फिल्म के रूप में याद की जाएगी, जिसने यह सिद्ध किया कि बड़े सपनों को साकार करने के लिए बड़े बजट की नहीं, बल्कि बड़े हौसलों, मजबूत टीम और अटूट विश्वास की आवश्यकता होती है।

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