देवी शंकर प्रभाकर हरियाणा के एस.एस.राजामौली
कुछ कहानियाँ वक्त की धूल में खो नहीं जातीं बल्कि वो समय की सीमाओं को लांघकर इतिहास बन जाती हैं। ये कहानी है एक ऐसे व्यक्ति की, जिसने हरियाणा की बोली को बड़े परदे पर दिखाया। उनका नाम है “देवी शंकर प्रभाकर” जिस प्रदेश की संस्कृति को कभी सिर्फ ‘एग्रीकल्चर’ के जुमले से जाना जाता था, उस अवधारणा को तोड़ने का कार्य देवी शंकर प्रभाकर जी ने किया। देवी शंकर प्रभाकर जी का जन्म 1 मई 1929 को हरियाणा के रोहतक जिले के मैना गांव में हुआ। उन्होंने हरियाणा प्रदेश की समृद्ध लोकसंस्कृति को कलमबद्ध करने का ऐतिहासिक कार्य किया।
एक साधारण गाँव, साधारण परिवेश लेकिन सपने असाधारण। देवी शंकर प्रभाकर का जन्म एक ऐसे परिवार में हुआ जहाँ न फिल्में थीं, न मंच पर शब्दों की ताकत। बावजूद इसके उनकी लेखनी जैसे मिट्टी से उपजी कविता हो। हरियाणा की लोकगाथाएं, कहावतें, लोकगीत सबकी रचना कर उन्होंने आने वाली पीढ़ियों के लिए धरोहर संजोई। हरियाणा में साहित्य, संस्कृति और सिनेमा के संदर्भ में जब भी कोई आलेख शुरू होता है, देवी शंकर प्रभाकर जी का नाम प्रथम श्रेणी में लिया जाता है।
जिस प्रकार पंजाब में देवेंद्र सत्यार्थी के बिना लोक-संस्कृति की चर्चा अधूरी है, उसी प्रकार हरियाणा में देवी शंकर प्रभाकर जी के बिना हरियाणवी संस्कृति और सिनेमा का उल्लेख अधूरा कहा जाएगा। देवी शंकर प्रभाकर हरियाणवी संस्कृति और सिनेमा को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने वाले प्रथम पुरुष थे। सन 1973 में उन्होंने चंद्रावल फिल्म फेम उषा शर्मा जी से विवाह किया और 1977 में चंडीगढ़ आकर बस गए। लोक सम्पर्क विभाग से संयुक्त निदेशक पद से सेवानिवृत्त होने के बाद उन्होंने दूरदर्शन के लिए लगभग 6 फ़िल्में बनाईं।
देवी शंकर प्रभाकर — चंद्रावल के निर्माता, हरियाणवी सिनेमा के मसीहा
देवी शंकर प्रभाकर जी केवल एक फिल्म निर्माता नहीं थे, वे हरियाणा की सांस्कृतिक आत्मा के संवाहक थे। उन्होंने हरियाणा की पहली सुपरहिट फिल्म चंद्रावल का निर्माण कर न केवल सिनेमा के क्षेत्र में इतिहास रचा, बल्कि हरियाणवी पहचान को भी नई ऊँचाइयाँ दीं।
इसके अलावा उनके बैनर तले बनी फिल्में- फूलबदन, लाड्डो-बसंती, जाटणी ने हरियाणवी सिनेमा को जन-जन तक पहुँचाया। उनकी प्रमुख फिल्मों में फूल बदन और लाडो बसंती का दूरदर्शन पर प्रसारण भी हो चुका है। 1960 के आसपास आकाशवाणी पर उनके निर्देशन में “सांग निहालदे” कार्यक्रम का 80 मिनट का प्रसारण हुआ, जिसे राष्ट्रीय स्तर पर 30 से अधिक बार प्रसारित किया गया।
उनकी लिखी नाट्य रचनाएं जैसे “ताई धनौ”, “चाचा लाखू”, “दादा हठी सिंह” और “पुर के प्रसार” ने भी नए कीर्तिमान स्थापित किए। अगर हमारे पास देवी शंकर प्रभाकर जी न होते, तो चंद्रावल और बहू रानी के रूप में पहली जोखिम भरी पहल कदमी नहीं हो पाती। बहू रानी को उनके प्रयास और निर्देशन में बनने वाली पहली फिल्म कहा जा सकता है, जबकि इसके निर्माण और निर्देशन से वे खुश नहीं थे। उनका कहना था कि सहयोगियों के हस्तक्षेप के कारण वे सब नहीं कर पाए, जो वे चाहते थे। यही कारण था कि उन्होंने 1984 में चंद्रावल फिल्म बनाई और हरियाणवी सिनेमा में एक नया इतिहास रचा।
हरियाणवी सिनेमा के इतिहास में एक मील का पत्थर साबित हुई !
1984 में प्रदर्शित हुई ‘चंद्रावल’ हरियाणवी सिनेमा की तीसरी फिल्म थी, लेकिन यह पहली व्यावसायिक दृष्टि से सफल फिल्म साबित हुई। चन्द्रावल ने केवल हरियाणा, बल्कि पंजाब, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और सम्पूर्ण उत्तर भारत में हरियाणवी संस्कृति का डंका बजाया। हरियाणा की धरा पर एक ऐसी कहानी रची गई, जिसने न केवल हरियाणवी सिनेमा को नया आयाम दिया, बल्कि समाज की सोच और संस्कृति को भी प्रभावित किया। फरीदाबाद के गगन सिनेमा में चंद्रावल का पहला शो और सिल्वर जुबली मनाई गई। फिल्म की कुल लागत लगभग 5 लाख रुपए थी, जो केवल इसी सिनेमा हॉल से वसूल हो गई। चंद्रावल के गीत आज भी नई पीढ़ी के द्वारा बड़े चाव से सुने जाते हैं।
चंद्रावल की सफलता से जो आर्थिक लाभ मिला, उसे देवी शंकर प्रभाकर जी ने व्यक्तिगत नहीं रखा, बल्कि ‘फूल बदन, जाटनी’ और ‘लाडो बसंती’ जैसी और फिल्में बनाकर वापिस समाज को समर्पित कर दिया। उनके करीबी मित्रों के अनुसार वे स्वभाव से जिद्दी थे, लेकिन यह जिद केवल हरियाणवी संस्कृति के सम्मान के लिए थी।
हरियाणवी फिल्म इंडस्ट्री के इस महान स्तम्भ का निधन 10-11 अक्टूबर 2005 की मध्यरात्रि को चंडीगढ़ के इंस्कॉल हॉस्पिटल में हुआ। आज भले ही देवी शंकर प्रभाकर जी हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनके द्वारा किए गए कार्य हमारी संस्कृति को आगे बढ़ाने में सदैव प्रेरणादायक रहेंगे। देवी शंकर प्रभाकर जी का योगदान हरियाणवी सिनेमा के इतिहास में हमेशा हमेशा अमर रहेगा। उनकी यादें, उनका काम और उनका योगदान हमसे हमेशा जुड़े रहेंगे।
