झनकार कंगना

हरियाणवी फिल्म इंडस्ट्री और अहीरवाल बोली

झनकार कंगना” — अहीरवाल बोली की पहली फिल्म

हरियाणवी सिनेमा की शुरुआत संघर्षों और सीमित संसाधनों के बीच हुई थी। सन 2000 से पहले हरियाणा में बड़े फिल्म सेट, आधुनिक स्टूडियो या भारी बजट जैसी सुविधाएं मौजूद नहीं थीं। ऐसे समय में फिल्म निर्माताओं के सामने सबसे बड़ी चुनौती थी — फिल्मों को वास्तविक और खूबसूरत कैसे बनाया जाए। इसी वजह से उस दौर में बनने वाली लगभग 10 फिल्मों में से 7 फिल्मों की शूटिंग नारनौल और आसपास के क्षेत्रों में की जाती थी। महेंद्रगढ़ और नारनौल के पहाड़, खुले मैदान, गांवों की सादगी और प्राकृतिक लोकेशन फिल्मों को एक अलग ही दृश्यात्मक सुंदरता देते थे। सीमित संसाधनों के बावजूद फिल्म मेकर्स इन लोकेशनों का उपयोग करके अपनी फिल्मों को बड़े पर्दे के लायक बनाने की कोशिश करते थे। जहां मिट्टी की खुशबू, पहाड़ों की सादगी और लोकभाषा की आत्मा मिलती है — वहीं जन्म लेती है अहीरवाल की पहचान। हरियाणवी सिनेमा की शुरुआत संघर्षों और सीमित संसाधनों के बीच हुई थी। सन 2000 से पहले हरियाणा में बड़े फिल्म सेट, आधुनिक स्टूडियो या भारी बजट जैसी सुविधाएं मौजूद नहीं थीं। ऐसे समय में फिल्म निर्माताओं के सामने सबसे बड़ी चुनौती थी — फिल्मों को वास्तविक और खूबसूरत कैसे बनाया जाए।

लेकिन उस समय तक हरियाणवी सिनेमा में अहीरवाल बोली को लेकर कोई बड़ा प्रयोग नहीं हुआ था। फिर आया एक ऐतिहासिक मोड़।

सन 1987 में रिलीज़ हुई फिल्म  झनकार कंगना अहीरवाल भाषा की पहली हरियाणवी फिल्म मानी जाती है। यह फिल्म केवल एक फिल्म नहीं थी, बल्कि अहीरवाल क्षेत्र की संस्कृति, बोली और लोकभावनाओं को बड़े पर्दे तक पहुंचाने का एक साहसिक प्रयास था।

इस फिल्म का निर्देशन किया था  Sangi Santlaal ने।

फिल्म का स्क्रीनप्ले  B. S. Rao और संतलाल जी ने लिखा था, जबकि इसका बैकग्राउंड म्यूजिक  Raju Nayak ने तैयार किया था।

उस दौर में जब क्षेत्रीय बोलियों पर काम करना जोखिम माना जाता था, तब “झनकार कंगना  जैसी फिल्म बनाना अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि थी।

 

अहीरवाल की मिट्टी से निकले कलाकार

झनकार कंगना” के बाद अहीरवाल बोली में बहुत कम फिल्में देखने को मिलीं, लेकिन इस मिट्टी ने हमेशा प्रतिभाशाली कलाकार और फिल्मकार दिए हैं।

मनीष सैनी — राष्ट्रीय स्तर तक पहुँचा अहीरवाल का नाम

निर्देशक मनीष सैनी अहीरवाल क्षेत्र से निकलकर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुँचे। उन्होंने ‘ढ’ (2017), ‘गिद्ध: द स्कैवेंजर्स’ (2022) और ‘शुभ यात्रा’ (2023) जैसी फिल्मों का निर्देशन किया। उनकी फिल्मों को कई पुरस्कार और राष्ट्रीय पहचान मिली है।

उनकी फिल्मों में ग्रामीण जीवन, मानवीय संवेदनाओं और जमीन से जुड़ी कहानियों की झलक साफ दिखाई देती है।


मनीष सैनी जैसे निर्देशकों का काम यह दर्शाता है कि क्षेत्रीय सिनेमा में केवल मनोरंजन ही नहीं, बल्कि वैश्विक स्तर की कलात्मक गहराई भी हो सकती है। अहीरवाल की इस विरासत को आगे बढ़ाने के लिए आज के युवा फिल्मकारों को तकनीक और कहानी कहने की कला (Storytelling) के बीच कैसा संतुलन बनाना चाहिए?

नई पीढ़ी के प्रयास

लेखक Pravesh Rajput ने भी “फौजा” जैसी फिल्मों को लिखकर अपनी अलग पहचान बनाई।

वहीं  Hariom Kaushik, जो महेंद्रगढ़ डिस्ट्रिक्ट से संबंध रखते हैं, आज हरियाणवी सिनेमा का एक जाना-पहचाना नाम बन चुके हैं। उनकी अभिनय शैली में भी ग्रामीण हरियाणा की सादगी और मिट्टी की खुशबू दिखाई देती है।

छोरी छोरों से कम नहीं होती  — एक महत्वपूर्ण पड़ाव

सन 2016 में रिलीज़ हुई फिल्म छोरी छोरों से कम नहीं होती ने भी अहीरवाल क्षेत्र और हरियाणवी सिनेमा को नई पहचान दी। इस फिल्म को राष्ट्रीय पुरस्कार मिलने के बाद हरियाणवी सिनेमा की ओर देशभर का ध्यान गया।

यह फिल्म साबित करती है कि अच्छी कहानियां किसी बड़ी इंडस्ट्री की मोहताज नहीं हो

शॉर्ट फिल्मों में अहीरवाल बोली

अहीरवाल भाषा को फिर से जीवित करने का प्रयास कुछ शॉर्ट फिल्मों में भी देखने को मिला।

 बकरी- शॉर्ट फिल्म बकरी में अहीरवाल बोली का प्रभावी उपयोग किया गया। इस फिल्म ने कई फिल्म फेस्टिवल्स में सराहना और पुरस्कार प्राप्त किए। सीमित संसाधनों के बावजूद यह फिल्म अपनी भाषा और प्रस्तुति के कारण अलग पहचान बनाने में सफल रही।

गिंडीइसके बाद ओम कौशिक Production द्वारा बनाई गई शॉर्ट फिल्म  गिंडी भी चर्चा में रही। इस फिल्म की भाषा भी पूरी तरह अहीरवाल बोली पर आधारित थी। यह प्रयास दिखाता है कि नई पीढ़ी अपनी लोकभाषा को बचाने और आगे बढ़ाने की कोशिश कर रही है।

सतीश कौशिक — अहीरवाल की आवाज़

बॉलीवुड के दिग्गज अभिनेता और निर्देशक सतीश कौशिक भी महेंद्रगढ़ क्षेत्र से ही थे। उनकी बातचीत, हास्य शैली और लहजे में हमेशा अहीरवाल क्षेत्र की झलक महसूस होती थी।

उन्होंने भले ही बॉलीवुड में बड़ा नाम बनाया, लेकिन उनकी जड़ों में अहीरवाल की मिट्टी हमेशा मौजूद रही।

ज़िला महेंद्रगढ़— डिजिटल दौर की शुरुआत

डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के दौर में ज़िला महेंद्रगढ़ अहीरवाल भाषा की पहली वेबसीरीज़ के रूप में सामने आई। हालांकि तकनीकी रूप से यह सीरीज़ काफी कमजोर मानी गई, लेकिन इसके प्रयास को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

इस वेबसीरीज़ ने यह साबित किया कि अहीरवाल बोली अब केवल गांवों तक सीमित नहीं है, बल्कि डिजिटल स्क्रीन तक भी पहुंच चुकी है।

अहीरवाल बोली — केवल भाषा नहीं, पहचान है

अहीरवाल बोली में हरियाणवी सिनेमा में बहुत कम प्रयास हुए हैं, लेकिन जो भी हुए — पूरी ईमानदारी और दिल से हुए।

यह बोली केवल संवादों का माध्यम नहीं, बल्कि हरियाणा की संस्कृति, लोकगीतों, भावनाओं और मिट्टी की पहचान है। जरूरत है कि आने वाली पीढ़ी इस भाषा को फिल्मों, वेबसीरीज़ और संगीत के माध्यम से और आगे लेकर जाए।

दिलचस्प बात यह है कि आज भी B. S. Rao अहीरवाल क्षेत्र की संस्कृति और लोकभाषा से जुड़े हुए हैं। वर्तमान समय में वे नारनौल डिस्ट्रिक्ट में “Aravali Radio” नाम से एक रेडियो स्टेशन संचालित कर रहे हैं। यह प्लेटफॉर्म स्थानीय भाषा, लोकसंस्कृति, लोकगीतों और क्षेत्रीय प्रतिभाओं को आगे बढ़ाने का कार्य कर रहा है।

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