वेब सीरीज़ समीक्षा: ज़िला महेन्द्रगढ़
ज़िला महेन्द्रगढ़ एक हरियाणवी वेब सीरीज़ है, जो राजनीति, दोस्ती, और अप्रत्याशित मोड़ों से भरपूर है। यह सीरीज़ चौपाल ऐप पर स्ट्रीमिंग के लिए उपलब्ध है और 30 मई 2025 से रिलीज़ हुई है।फिल्म की कहानी हरिओम कौशिक ने लिखी है। हरिओम कौशिक आज हरियाणवी फिल्म इंडस्ट्री का एक प्रमुख नाम बन चुके हैं। वे स्वयं ज़िला महेंद्रगढ़ से संबंध रखते हैं।महेंद्रगढ़, हरियाणा राज्य का एक ऐतिहासिक और सांस्कृतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण जिला है।जब इस प्रोजेक्ट का नाम सामने आया — “ज़िला महेंद्रगढ़”, तो इससे ऐसा आभास हुआ कि कुछ बड़ा और प्रभावशाली देखने को मिलेगा। हालांकि, फिल्म में कई खामियाँ नज़र आईं। शीर्षक से उम्मीदें बड़ी थीं, और लगा कि हरिओम कौशिक कुछ अलग और उल्लेखनीय लेकर आएंगे, लेकिन पूरी फिल्म गुणवत्ता के साथ समझौता करती नज़र आई।कहानी रुद्र नामक एक युवक के इर्द-गिर्द घूमती है, जो अपने पुराने घर को बेचने के लिए अपने गाँव लौटता है। शुरुआत में उसका उद्देश्य केवल संपत्ति निपटाना होता है, लेकिन गाँव की राजनीति, पुराने दोस्तों से मुलाकात, और एक अप्रत्याशित चुनावी प्रस्ताव उसे एक नई दिशा में ले जाते हैं। रुद्र को सरपंच बनने का प्रस्ताव मिलता है, जो उसके पुराने दोस्त के साथ प्रतिद्वंद्विता में बदल जाता है। कहानी में प्यार, दोस्ती, और सत्ता की लड़ाई की जटिलताएँ दिखाई जाती हैं।
निर्देशन एवं पटकथा
निर्देशन की ज़िम्मेदारी मनीष जांगू और मोहित मोर ने निभाई है, जबकि लेखन का कार्य आर.जे. भारद्वाज और मनीषा जांगू ने किया है।जब फिल्म का पहला दृश्य खुलता है और महेन्द्रगढ़ की पहाड़ियों का ड्रोन शॉट दिखाई देता है, तो एक क्षण के लिए लगता है कि फिल्म उत्कृष्ट अनुभव देने वाली है।
लेकिन लगभग छह मिनट के बाद ही फिल्म का प्रवाह टूटने लगता है।
कई दृश्य अनावश्यक रूप से लंबे खींचे गए हैं, जिससे दर्शक की रुचि धीरे-धीरे कम होने लगती है। जहाँ दृश्यों में विविधता और गहराई लाने की आवश्यकता थी, वहाँ लेखन स्तर पर अपेक्षित कार्य नहीं किया गया।मनीषा, जो SUPVA रोहतक की छात्रा हैं और जिन्हें फिल्म निर्माण का अच्छा ज्ञान है, उनके बावजूद निर्देशन और पटकथा में कई महत्वपूर्ण कमियाँ साफ़ तौर पर दिखाई देती हैं।
DOP Work
सीरीज़ में लिए गए ड्रोन शॉट्स सही सीन को प्रभावशाली बनाने में उपयोगी रहे हैं। DOP शानू वत्स रहे हैं। नाइट शॉट्स में कई कमियाँ रही हैं, जिन्हें नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। इनडोर शॉट्स अच्छी तरह से शूट किए गए हैं, लेकिन जैसे ही कैमरा आउटडोर सीन में जाता है, वहाँ पर शानू वत्स का काम बिल्कुल संतोषजनक नहीं रहा। हर सीन में सुधार की गुंजाइश थी, लेकिन DOP के काम में खामियाँ साफ़ नज़र आती हैं।
**कास्टिंग पर समीक्षा
फिल्म की कास्टिंग इसकी सबसे कमज़ोर कड़ी साबित होती है। प्रमुख कलाकार *मनुज यादव* (रूद्र) और *निकिता सिंगला* दर्शकों पर कोई प्रभाव छोड़ने में असफल रहे हैं। मनुज यादव का किरदार पूरे प्रोजेक्ट में थका-थका और ऊर्जा-रहित प्रतीत होता है। उनके सह-कलाकार भी उसी तरह भावशून्य नजर आते हैं, जिससे दृश्यों में गहराई की कमी साफ झलकती है।
*निकिता सिंगला* की अभिनय क्षमता इस प्रोजेक्ट में पूरी तरह से उभरकर सामने नहीं आई। उनका अभिनय औसत स्तर का रहा और कई दृश्यों में भावाभिव्यक्ति की स्पष्ट कमी रही।
* *अजय कुंडू* और *गीतू परी* ने अपेक्षाकृत बेहतर प्रदर्शन किया, लेकिन निर्देशक इनसे और अधिक सशक्त अभिनय ले सकते थे, जो संभव नहीं हो पाया।
* *गीतू परी*, जो हरियाणा की एक जानी-मानी अभिनेत्री हैं, इस सीरीज़ में प्रभाव छोड़ने में सफल नहीं हो सकीं। कई दृश्यों में उनका अभिनय ज़रूरत से अधिक (overacted) महसूस हुआ, जिससे उनके किरदार की विश्वसनीयता प्रभावित हुई।
* *दुष्यंत यादव, **गोविंद चौहान, **अर्जुन सिंह, **कृष्ण मलिक* और अन्य सहायक कलाकारों की कास्टिंग भी प्रभावशाली नहीं रही।
कुल मिलाकर, ऐसा प्रतीत होता है कि कास्टिंग प्रक्रिया में गंभीरता और सूझबूझ का अभाव रहा है। पात्रों के चयन में उपयुक्तता और अभिनय कौशल को प्राथमिकता नहीं दी गई .
Dialogue
वेब सीरीज़ के डायलॉग्स आरजे भारद्वाज ने लिखे हैं। कई डायलॉग्स बहुत अच्छे हैं और समय व परिस्थिति के अनुसार बिल्कुल सटीक बैठते हैं। लेकिन अभिनेता डायलॉग डिलीवरी के दौरान चेहरे के हाव-भाव (फेशियल एक्सप्रेशन्स) पर काम नहीं कर पाए, जिसकी वजह से अच्छे डायलॉग्स भी प्रभावी नहीं लगे।
आरजे भारद्वाज ने डायलॉग्स अच्छी तरह से लिखे हैं।
बैकग्राउंड म्यूज़िक
बहुत बार Cinematic Haryana इस बात पर चर्चा कर चुका है कि बैकग्राउंड म्यूज़िक स्कोर अच्छा होना चाहिए। लेकिन ठीक 08 मिनट तक बैकग्राउंड म्यूज़िक स्कोर ठीक-ठाक रहा। उसके बाद कुछ ऐसा हुआ कि बैकग्राउंड म्यूज़िक स्कोर पूरी तरह से इधर-उधर भटकने लगा। और तो और, सीरीज़ के कई दृश्यों में तो बैकग्राउंड म्यूज़िक बिल्कुल ही नहीं था। मतलब कुछ सीन में म्यूज़िक था ही नहीं।
हरिओम कौशिक जो इस प्रोजेक्ट के क्रिएटर हैं, उनके इस प्रोजेक्ट में बैकग्राउंड म्यूज़िक पर बिल्कुल ध्यान नहीं दिया गया। किसी भी सीन को प्रभावशाली बनाने में बैकग्राउंड म्यूज़िक की बड़ी भूमिका होती है। लेकिन जब म्यूज़िक सीन के हिसाब से न हो या बिलकुल न हो, तो वह सीन का प्रभाव ही खत्म कर देता है।
एडिटिंग
मोहित मोर, जिन्होंने मेवात जैसी सीरीज का काम किया है, जिला महेंद्रगढ़ में भी उन्होंने अच्छा काम किया है। छोटी-मोटी जगहों पर कलर करेक्शन में कुछ दिक्कतें हैं, लेकिन बाकी मोहित मोर ने एडिटिंग ठीक-ठाक की है।
कॉस्ट्यूम
राजिंदर कौर ने कॉस्ट्यूम डिज़ाइन किया है।
स्पेशल अपीयरेंस में रहे हरिओम कौशिक के ड्रेसिंग सेंस पर ध्यान नहीं दिया गया।
Bad Boys भीवानी वाले का वही कॉस्ट्यूम उनके लिए भी रखा गया।
कॉट्यूम डिज़ाइनर को फेस वैल्यू और बॉडी लैंग्वेज के अनुसार कपड़े चुनने चाहिए थे।
साउंड डिज़ाइन
साउंड डिज़ाइन और SFX पर और बेहतर काम किया जा सकता था। कई जगहों पर साउंड डिज़ाइन बिल्कुल ठीक नहीं था और SFX पर भी अच्छे से काम नहीं किया गया, जिससे सीन काफी उबाऊ महसूस हो रहे थे।
Technical Series
Series की कहानी लगभग ठीक थी। एक सामान्य विषय पर पूरी कहानी घूमती है।
Screenplay पर ध्यान नहीं दिया गया है, Manisha Jangu ने। Scene development और scene duration पर भी ध्यान नहीं दिया गया।
Casting बहुत कमजोर रही इस प्रोजेक्ट की।
Geetu Pari, Ajay Kundu और Hariom Kaushik को छोड़कर प्रोजेक्ट की casting ठीक नहीं है।
Background music score लगभग न के बराबर है।
Series की कहानी ठीक है, कुछ कमियाँ कुछ जगह हैं, लेकिन आप फिर भी इस series को Chaupal Haryani OTT पर जाकर देखें।
Rating: 03/05
