एक डमी चेक से जन्मी हरियाणवी व्यंग्य कथा

कहानी एक हरियाणवी लोकगायक के इर्द-गिर्द घूमती है, जिसे सरकार द्वारा सम्मान स्वरूप 50 हजार रुपये का असली चेक मिलता है। लेकिन एक भ्रम के चलते उसका असली चेक कहीं खो जाता है और वह गांव में डमी चेक लेकर घूमता रहता है।

तकनीकी जानकारी

  • शूटिंग अवधि: 15 दिन
  • कैमरा: ब्लैक मैजिक 06

      निर्देशक: रंजीत चौहान

फिल्म का विचार — एक डमी चेक से शुरू हुई कहानी

छप्पर फाड़के” का विचार निर्देशक रंजीत चौहान के मन में एक बेहद साधारण लेकिन दिलचस्प घटना से आया। एक बार वे जगबीर राठी जी के कॉलेज कार्यक्रम में शामिल हुए थे। कार्यक्रम के दौरान मंच पर किसी व्यक्ति को एक बड़े आकार का डमी चेक भेंट किया गया। कार्यक्रम समाप्त होने के बाद वह चेक मंच के एक कोने में यूँ ही पड़ा रह गया।

उसी पल रंजीत चौहान के मन में एक सवाल— उठा

अगर यह चेक किसी गरीब आदमी के हाथ लग जाए… और फिर कहीं खो जाए… तो क्या होगा?”

उन्होंने कल्पना की कि गांव का एक आम इंसान शायद उस चेक को बैंक से ज्यादा अपने घर की छत या खिड़की पर सजाकर रखेगा।
यहीं से इस फिल्म की कहानी की जड़ें निकलनी शुरू हुईं।

कहानी से फिल्म बनने तक का सफर

कुछ महीनों बाद अभिनेता रामकेश जीवनपुरवाला का फोन रंजीत चौहान के पास आया। उन्हें एक नई कहानी की तलाश थी।

रंजीत ने उसी विचार को आधार बनाकर एक लोकगायक के इर्द-गिर्द घूमती कहानी तैयार की और रामकेश को सुनाई।
कहानी सुनने के बाद जब बजट की चर्चा हुई, तो लगभग 15 लाख रुपये का अनुमान सामने रखा गया।

इसके बाद रामकेश जीवनपुरवाला ने निर्माता तरुण मोर के साथ बैठक करवाई और प्रोजेक्ट को आगे बढ़ाया गया।

लोकेशन चयन — फिर बना जमाल गांव फिल्म का केंद्र

लॉकडाउन के दौरान रंजीत चौहान और उनकी टीम अपने गांव लौट आए थे। टीम के अधिकांश सदस्य SUPVA रोहतक से पढ़ाई कर चुके थे।

इससे पहले रंजीत अपनी चर्चित फिल्म दादा लख्मी” की शूटिंग जमाल गांव में कर चुके थे। उसी अनुभव और गांव के सहयोग को देखते हुए “चापड़ फाड़” की शूटिंग के लिए भी जमाल गांव को चुना गया।

हालांकि इस बार संघर्ष पहले की तुलना में थोड़ा कम था, क्योंकि टीम अब अनुभव के साथ ज्यादा तैयार थी।

निर्माण प्रक्रिया और तकनीकी चुनौतियां

फिल्म की शूटिंग के दौरान डीओपी विकास सिंगरोहा टीम से जुड़े।
हालांकि उन्होंने इससे पहले मुख्य रूप से गानों की शूटिंग की थी, इसलिए फिल्म के विजुअल ट्रीटमेंट और कैमरा एंगल को लेकर सेट पर कई बार तालमेल की चुनौतियां सामने आईं।

लेकिन टीमवर्क और लगातार चर्चा के जरिए इन कठिनाइयों को संभाला गया और फिल्म को उसकी वास्तविक लोकल टोन के साथ पूरा किया गया।

गीत-संगीत और कलाकारों की प्रतिबद्धता

फिल्म के अधिकांश गीत रामकेश जीवनपुरवाला ने लिखे, जबकि दो गीत आकाश चावरिया द्वारा लिखे गए।

रामकेश के साथ काम करने का अनुभव निर्देशक के लिए बेहद खास रहा। उन्होंने शूटिंग शुरू होने से पहले साफ शब्दों में कहा

आप जैसा कहेंगे, वैसा ही अभिनय करूंगा… बस काम अच्छा बनना चाहिए।”फिल्म की निरंतरता और यथार्थ बनाए रखने के लिए रामकेश जीवनपुरवाला ने पूरे 15 दिनों की शूटिंग में लगभग एक ही प्रकार की धोती-कुर्ता वेशभूषा पहनी।अभिमन्यु यादव का किरदार — दो सरपंच, लेकिन अलग पहचान ! चापड़ फाड़” के निर्माण के दौरान निर्देशक रंजीत चौहान के सामने एक दिलचस्प चुनौती भी आई।इससे पहले उनकी फिल्म मलाल” में अभिनेता अभिमन्यु यादव गांव के सरपंच की भूमिका निभा चुके थे।
संयोग से “चापड़ फाड़” में भी उन्हें सरपंच का किरदार निभाना था।निर्देशक को डर था कि कहीं दर्शकों को दोनों किरदार एक जैसे लगें और दोहराव महसूस हो।इसी समस्या को हल करने के लिए किरदार में कई बदलाव किए गए।

मलाल” में अभिमन्यु यादव का सरपंच गंभीर, ठोस और प्रभावशाली छवि वाला था, जबकि “चापड़ फाड़” में उनके किरदार को हल्के-फुल्के हास्य रंग में प्रस्तुत किया गया।
इसके लिए उनका बॉडी वेट भी बढ़वाया गया ताकि स्क्रीन पर उनकी उपस्थिति और व्यक्तित्व पहले वाले किरदार से बिल्कुल अलग दिखाई दे।

इस छोटे लेकिन महत्वपूर्ण बदलाव ने किरदार को नई पहचान दी और दर्शकों को एक नया अभिमन्यु यादव देखने को मिला।

निष्कर्ष

छप्पर फाड़के” सिर्फ एक हास्य फिल्म नहीं थी, बल्कि गांव के भीतर मौजूद सामाजिक दिखावे, लालच और मानसिकता पर एक व्यंग्यात्मक टिप्पणी थी।
रंजीत चौहान ने इस फिल्म में हास्य के माध्यम से समाज की उन परतों को दिखाने की कोशिश की, जिन्हें लोग अक्सर हंसते-हंसते नजरअंदाज कर देते हैं।हरियाणवी सिनेमा में यह फिल्म अपने लोकल टोन, यथार्थवादी पात्रों और सामाजिक व्यंग्य के कारण एक अलग पहचान बनाती है।

Scroll to Top